भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 625, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंसामीप्य होनेपर योगियोंको कतिपय गुण-विशिष्ट परमात्मा, सर्वथा सान्निध्य होनेपर अनन्त कल्याण- गुणगण-विशिष्ट भगवान्के रूपमें तत्त्वका उपलम्भ होता है। इन्हीं लोगोंमें ही मनमानी कल्पना करनेवाले कुछ लोग श्रीकृष्णको आदित्यस्थानीय और ब्रह्मको प्रकाशस्थानीय मानते हैं। कुछ श्रीवृषभानुकिशोरीके नख-मणि-प्रकाश या नूपुर-प्रकाशको ही औपनिषद परब्रह्म कहते हैं, परन्तु वैदिकोंकी दृष्टिमें तो वेदोंका महान् तात्पर्य ब्रह्महीमें है और वही सब तरहसे सर्वोत्कृष्ट है। ब्रह्म—अतिशयताकी कल्पनासे अतीत संकोचका कारण न होनेसे वृद्ध्यर्थक ‘बृहि’ धातुसे निष्पन्न ‘ब्रह्म’ शब्दका अर्थ निरतिशय बृहत्तम तत्त्व होता है। जो देश-काल-वस्तु-परिच्छेदवाला हो, वह तो परिच्छिन्न होनेके कारण क्षुद्र ही है, निरतिशय बृहत् नहीं। यदि जड़ हो तो भी दृश्य होनेसे अल्प और मर्त्य होगा। अतः अनन्त, स्वप्रकाश, सदानन्द तत्त्व ही ‘ब्रह्म’ पदका अर्थ होता है और वही भूमा अमृत है। उससे भिन्न सभीको अल्प और मर्त्य ही समझना चाहिये। फिर अनन्त पदके साथ पठित ‘ब्रह्म’ शब्दका सुतरां यही अर्थ है। उसमें अतिशयताकी कल्पना निर्मूल है। किसी राजाने ऐसी कहानी सुननी चाही कि जिसका अन्त ही न हो। एक चतुरने सुनाना आरम्भ किया। राजन्! एक वृक्ष था, उसकी अनन्त शाखाएँ थीं, उन शाखाओंमें अनन्त उपशाखाएँ थीं, उपशाखाओंमें भी अनन्त पल्लव थे और उनपर अनन्त पक्षी बैठे थे। कुछ कालमें एक पक्षी उड़ा ‘फुर्र’। राजाने कहा आगे कहिये, इसपर उसने कहा दूसरा उड़ा ‘फुर्र’। तब राजाने कहा और आगे कहिये, तब उस चतुरने कहा कि पहले पक्षियोंका उड़ना पूरा हो तब आगे बढूँ। यहाँ एक-एक पक्षीका उड़ना समाप्त ही नहीं हो सकता। इसी तरह कल्पनाओंका अन्त ही नहीं है। अतः एक शब्दमें यही कहा जाता है कि अतिशयताकी कल्पना करते-करते वाचस्पति तथा प्रजापतिकी भी मति जब विरत हो जाय और जिससे आगे कभी भी कोई कल्पना कर ही न सके, तब उसी अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश, परमानन्दघन, भगवान्को वेदान्ती ब्रह्म कहते हैं। उसीका ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ इत्यादि व्याससूत्रोंसे विचार किया गया है। प्रकाशकी अपेक्षा आदित्यमें जिस अतिशयताकी कल्पना की जाती है। उससे भी अनन्तकोटि-गुणित अतिशयताकी कल्पनाके पश्चात् जिस अन्तिम निरतिशय, सर्व बृहत् पदार्थकी सिद्धि हो उसमें भी देश, काल, वस्तुके परिच्छेदोंको मिटाकर परिच्छिन्न या एकदेशिता आदि दूषणोंका अत्यन्ताभाव-सम्पादन करे, तब उसे ब्रह्म शब्दका अर्थ जानना चाहिये। इसीको ‘तत्त्व’ कहा जाता है। इसका ही लक्षण है—‘तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।’ इसीका नाम ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् है। लक्षणके भेदसे लक्ष्य-भेद हो सकता है, नाम-भेदसे नहीं। जैसे कम्बुग्रीवादिमत्त्व घटका एक लक्षण है, अतएव घट, कुम्भ, कलशादि नामसे उसका भेद नहीं है। हाँ, ब्रह्म अनेक हैं— कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म, कार्यकारणातीत ब्रह्म। ऐसी स्थितिमें यह हो सकता है कि कार्यकारणातीत वेदान्तवेद्य शुद्ध-ब्रह्मरूप भगवान्के प्रकाशस्थानमें कार्यब्रह्म या कारणब्रह्म हो। प्रायः यह भी कहा जाता है कि निर्गुण ब्रह्म भगवान्का धाम है। यद्यपि धाम शब्द ऐसे स्थलोंमें स्वरूपभूत आत्मज्योतिका ही बोधक होता हैं—‘परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।’ (गीता १०।१२) ‘हे नाथ! आप परमात्मा हैं, परम प्रकाश (परम ज्योति) और परम पवित्र हैं’ तथापि कुछ अविवेकियोंकी यही अटल धारणा है कि धामका अर्थ निवासस्थान ही होता है। अस्तु, वे लोग अव्यक्तरूप कारण-ब्रह्मको ही वेदान्तवेद्य ब्रह्म मान बैठते हैं। कार्यकारणातीत तत्त्वतक उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। इस कारण यदि ब्रह्मको धाम भी मान लें तो भी सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं पड़ती। यह भेद वेदान्तियोंको इष्ट ही है कि स्थूल कार्य-ब्रह्मके ऊपर सूक्ष्म कार्यरूप ब्रह्म, उसके ऊपर कारणब्रह्म और इस अव्यक्त कारणब्रह्मके ऊपर