भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 624, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें६१४ भक्तिसुधा सविकल्प ब्रह्म प्रतिष्ठित कल्पित है। मुझे सेवन करनेसे सविकल्प प्रपंचका लंघन बड़ी सरलतासे हो सकता है अथवा 'ब्रह्म' पदका निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्म अर्थ है और 'अहं' पदका अर्थ सगुण, साकार, ब्रह्म (श्रीकृष्ण) है। अभिप्राय यह है कि मैं सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। यहाँ 'राहोः शिरः' के समान सम्बन्धार्था षष्ठी अभेदमें ही है अर्थात् जैसे व्यापक, अव्यक्त अग्नि दहन, प्रकाशन, पाचनादि कार्य करनेके लिये घृत, वर्तिकादिके सम्बन्धसे व्यक्त साकार अग्निके रूपमें प्रतिष्ठित-प्रवृत्त होता है, वैसे ही निर्गुण, निराकार, निर्विकार, अव्यक्त ब्रह्म भक्तानुग्रहादि कार्य करनेके लिये अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे सगुण, साकार व्यक्तरूपमें प्रतिष्ठित होता है। इसीलिये सगुण ब्रह्म ही निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा है। अतः मेरा आराधन करनेसे ही गुणोल्लंघन आदि भक्तानुग्रह सिद्ध होता है। कुछ लोगोंका कहना है कि सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा अर्थात् आधार है। जैसे आतप (घाम)-की प्रतिष्ठा उसका उद्गमस्थान या आधार सूर्य है, सूर्यसे ही निकलकर सूर्यके सहारे ही आतप रहता है, वैसे ही सगुण, साकार श्रीकृष्णचन्द्रकी मधुर मूर्ति ही निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा या आधार है। सूर्यस्थानीय श्रीकृष्ण हैं, आतप-स्थानीय निर्गुण ब्रह्म है। 'अनादिमत्परं ब्रह्म' (गीता १३।१२)—इस वचनमें भी ब्रह्मको 'अनादि' और 'मत्परं' कहा गया है। यहाँ 'मत्परं' का अर्थ यह है कि 'अहं श्रीकृष्णः पर उत्कृष्टो यस्मात्तन्मत्परम्।' मैं श्रीकृष्ण ही हूँ, पर-उत्कृष्ट, जिससे—निर्गुण ब्रह्मसे उत्कृष्ट मैं सगुण ब्रह्म हूँ। इसीलिये उन लोगोंका मत है कि औपनिषद ब्रह्मात्मदर्शियोंका ब्रह्म आतपके समान है और भक्तोंका भगवान् सूर्यस्थानीय है। परंतु उनका यह कथन श्रुति-सूत्रोंके विरुद्ध है। वेद, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र आदि सभी शास्त्रोंका परम तात्पर्य ब्रह्ममें ही है। 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तैत्तिरीय० २।१), 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१), 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि वाक्योंमें सर्वत्र ब्रह्मका ही विचार चलता है। श्रीकृष्ण वैदिक औपनिषद परब्रह्मसे भिन्न होते तब तो उनमें वेदवेद्यता नहीं सिद्ध होती, जो कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो' (गीता १५।१५) इत्यादि वचनोंसे भगवान्ने स्वीकार की है। अतएव 'अनादिमत्परं ब्रह्म' यहाँ भी 'मत्परं' ऐसा पदच्छेद न करके 'अनादिमत्परं ब्रह्म' ऐसा पदच्छेद करना युक्त है, जिसका सारांश यह है कि ब्रह्म अनादिमान् एवं पर अर्थात् सर्वोत्कृष्ट है। ब्रह्म-पर्यवसायी- प्रकरणको विच्छिन्न करके अन्य वर्णनका प्रसंग लाना अप्राकृत प्रक्रिया है एवं ब्रह्मज्ञानकी प्रशंसाके प्रसंगमें उसे किसीसे भी अपकृष्ट कहना सर्वथा विचारशून्यता है। श्रीमद्भागवतमें भी सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदरहित, स्वप्रकाश, नित्य विज्ञानको ही तत्त्व कहा है— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० १।२।११) 'अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वविद् लोग तत्त्व कहते हैं, उसीको ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् कहा जाता है।' कुछ लोगोंका कहना है कि यहाँ ब्रह्मसे परमात्मामें और उससे भगवान्में उत्कर्ष विवक्षित है। यदुकुलभूषण श्रीकृष्णकी सभामें बैठे हुए यादवोंने आकाश-मार्गसे आते हुए देवर्षि श्रीनारदजीको प्रथम केवल तेजःपुंज ही समझा। कुछ समीप आनेपर कोई देहधारी समझा और अधिक समीप होनेपर पुरुष एवं सर्वथा सान्निध्यमें श्रीनारद समझा। चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ (शिशुपालवध १।३) ठीक उसी तरह तत्त्वसे अति दूरस्थ अधिकारीको प्रथम केवल चिन्मात्र ब्रह्मका बोध होता है, कुछ