भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 623

अव्यभिचार भक्तियोग ६१३

अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य, माधुर्यमें मनकी तल्लीनता कही गयी है। परम पवित्रता, अद्भुत महिमा, लोकोत्तर सौन्दर्य, माधुर्यके चिन्तनसे भावुकका मन प्रेमोन्मादमें विभोर हो जाता है। प्रेममें जैसे अंग एवं वागादि इन्द्रियोंमें शैथिल्य होता है, वैसे ही मनमें भी शैथिल्य आता है, जिससे कि वह ध्येयस्वरूपको भी ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाता है। जब मन सब दृश्योंसे रहित हो जाता है, यहाँतक कि ध्येयस्वरूपसे भी शून्य हो जाता है, तब ध्येयके अभावमें ध्येयाकार वृत्तिरूप ध्यान और ध्यानका आश्रयरूप ध्याता भी नहीं उपलब्ध होता। उस समय ध्याता-ध्यान-ध्येयके बाधके अवधि एवं साक्षिरूपसे भगवान्‌का प्राकट्य होता है। अर्थात् भावुकोंका मन आकर्षण करनेके लिये ही भगवान् ध्येयरूपसे प्रकट होते हैं। उसे आकर्षित करके फिर वही भगवान् ध्येयातीत अग्राह्य रूपमें प्रकट होते हैं। यों भी भगवान्‌में ही चित्त लगाकर भगवत्परायण होकर सर्वभावसे जो भगवान्‌को भजते हैं, भगवान् उनके ऊपर कृपा करके उन्हें बुद्धियोग प्रदान करते हैं। उनके हृदयमें तेजोमय ज्ञानदीपका प्रकाश करके अज्ञानान्धकार दूर कर देते हैं— ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ (गीता १०।१०-११) सविकल्पक और निर्विकल्पक ब्रह्म यद्यपि वेदान्तवेद्य परमतत्त्व अत्यन्त अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य है तथापि भगवान्‌के भक्त निश्चिन्त रहते हैं। वे जानते हैं कि हमें निरन्तर प्रभुके पाद- पंकजमें आत्मसमर्पण करके प्रभुका भजन ही करना चाहिये। यदि प्रभु अपने निर्गुण, निराकार, निर्विकार स्वरूपका साक्षात् कराना आवश्यक समझेंगे तो जिस किसी तरह साक्षात्कार करा देंगे। अत्यन्त बधिरके लिये शब्द एवं जन्मान्धको रूप वैसे ही दुर्ग्राह्य हैं, जैसे अज्ञानीको ब्रह्म दुर्ग्राह्य है, परंतु भगवान् श्रोत्र और नेत्रका निर्माण करके दुर्ग्राह्य शब्द और रूपको सुग्राह्य एवं सुज्ञेय बना देते हैं। उन भगवान्‌को अपने अत्यन्त अचिन्त्य एवं दुर्ज्ञेय निराकार रूपका साक्षात्कार करा देनेमें कोई भी कठिनाई नहीं पड़ती। अतः पूर्ण विश्वास और आशासे भगवान्‌के पाद-पंकजका अव्यभिचार भक्तियोगसे सेवन करनेवालेको दुर्गम-से-दुर्गम सभी तत्त्व प्राप्त हो जाते हैं। फिर गुणोंका उल्लंघन भी उनके लिये सुगम हो जाता है— सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ श्रीमुखकी भी उक्ति है— ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ (गीता १४।२७) अर्थात् अमृत, अव्यय, शाश्वतधर्म एवं ऐकान्तिक सुखस्वरूप ब्रह्मकी मैं ही प्रतिष्ठा हूँ। मुझे भजनेसे गुणोंका अतिक्रमण बड़ी सरलतासे हो सकता है। 'अहं' पदका अर्थ प्रत्यगात्मा है। भावार्थ यह हुआ कि जैसे महाकाश ही घटाकाशके रूपमें प्रतिष्ठित होता है, वैसे ही मैं प्रत्यगात्मा ही परब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। अर्थात् परमात्मा ही प्रत्यगात्मारूपमें प्रतिष्ठित होता है। अतः जैसे घटाकाश महाकाशसे अभिन्न ही है, उसी तरह प्रत्यगात्मा परमात्मस्वरूप ही है। परमात्मा प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा)-रूपसे प्रतिष्ठित होते हैं। प्रत्यगात्मा परमात्माकी प्रतिष्ठा है अथवा 'अहं' पदका अर्थ प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, मायातीत, अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, निर्विकल्प, निर्विशेष शुद्ध परमात्मा है, जैसा कि 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४), 'ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्' (गीता १२।३), 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४) इत्यादि स्थलोंमें विवक्षित है। ब्रह्मपदका अर्थ मायाविशिष्ट सविशेष सविकल्प ब्रह्म है। इस तरह भावार्थ यह हुआ कि मैं निर्विकल्प ब्रह्म सविकल्प ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। निर्विकल्प ब्रह्ममें