भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 622, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें६१२ भक्तिसुधा
'विषयाकारं भजतीति भक्तिः'। इसके अतिरिक्त 'भज सेवायाम्' धातुसे 'भक्ति' शब्दकी सिद्धि होती है—'भजनं भक्तिः।' भजन अर्थात् सेवनको ही भक्ति कहा जाता है। मानसी सेवा सेवा यद्यपि शरीर, इन्द्रिय, बुद्धिसे की गयी कायिकी, ऐन्द्रियिकी, मानसी भेदसे अनेक हैं तथापि मुख्य सेवा मानसी ही है। मानसी सेवा ही सर्वश्रेष्ठ है। श्रीवल्लभाचार्यजीने भी कहा है— कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा॥ अर्थात् प्राणीको सदा श्रीकृष्णसेवा करनी चाहिये। सेवामें भी मानसी सेवा ही सर्वोत्कृष्ट सेवा है। चित्तकी कृष्णोन्मुखता या कृष्णमें तन्मयता ही सेवा है। मानसी सेवाकी सिद्धिके लिये ही तनुजा और वित्तजा सेवा करनी चाहिये। अर्थात् कायिकी, वाचिकी आदि सेवा करते-करते अन्तमें मानसी सेवाकी योग्यता प्राप्त होती है। 'विजातीयप्रत्ययनिरासपूर्वकं सेव्याकाराकारित मानसी वृत्तिप्रवाह' ही मानसी सेवा है। जिस प्रकार समुद्रोन्मुखी गंगाका अखण्ड प्रवाह चलता है, उसी प्रकार भगवदुन्मुखी मानसी वृत्तियोंका प्रवाह चलना ही भगवान्की मानसी सेवा है। जैसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्द भगवान्के आकारसे आकारित वृत्तिका प्रवाह होता है, वैसा ही वेदान्तवेद्य, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान्की स्वरूपविषयीणी वृत्तियोंका भी प्रवाह होता है। निर्विकार परब्रह्माकार मानस प्रवाह ही भक्ति, भजन या सेवा है और वही भगवान्का प्रापक होनेसे या एकाग्रता होनेसे योग भी है। जब वह बीच-बीचमें भगवान्से हटकर बाह्य प्रपंचोंसे जुड़ जाता है, तब व्यभिचारी कहा जाता है। अतः अन्यसम्बन्धविवर्जित, निर्विशेष भगवान्के आकारसे आकारित अविच्छिन्न मानस वृत्ति-प्रवाह ही अव्यभिचार भक्तियोग है, वही ज्ञानाभ्यास है और वही निदिध्यासन भी है। चार प्रकारके भक्त इस अव्यभिचार भक्तियोगसे भगवान्का सेवन करनेसे साक्षात्कारद्वारा अति शीघ्र ही गुणमय प्रपंचका बाध हो जाता है। ज्ञान चतुर्थी भक्ति है। अतः भगवान्के आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार भक्त होते हैं—'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।' (गीता ७।१६) ज्ञानी ज्ञानसे ही भगवान्का भजन या सेवन करता है। ज्ञानी भगवान्का अत्यन्त प्रिय भक्त है। यद्यपि भगवान्के भजन करनेवाले सभी भगवान्के प्रिय एवं उदार हैं तथापि ज्ञानी तो एकमात्र भगवान्में ही भक्ति करता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें भगवान्से भिन्न दूसरी वस्तु रहती ही नहीं। अतएव ज्ञानीको भगवान् एक क्षणके लिये भी अदृश्य नहीं होते और भगवान्को ज्ञानी अदृश्य नहीं होता— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ (गीता ६।३०) प्रथम सूक्ष्मतत्त्वमें मनकी स्थिति असम्भव है, अतः विराट्, हिरण्यगर्भादि तत्त्वोंमें मनको स्थित करके फिर क्रमेण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् सगुणमें स्थिति-सम्पादन करते हुए निर्गुण, निराकार, निर्विशेष, ब्रह्ममें स्थिति सम्पन्न होती है। स्थूल आलम्बनोंका अपोहन करते हुए सूक्ष्म आलम्बनोंमें चित्तकी एकाग्रता करते हुए अन्तमें चित्त अत्यन्त निरालम्ब बनाया जा सकता है। श्रीकपिलदेवजीने भी निर्गुण, निर्विकार ब्रह्ममें स्थितिके लिये भगवान्की मधुर, मनोहर, मंगलमयी, सगुण, साकार सच्चिदानन्दमयी मूर्तिका ध्यान बतलाया है। प्रथम अस्त्र-शस्त्र, भूषण, वसनादिसे सुसज्जित मूर्तिका ध्यान कहा है, फिर अस्त्र-शस्त्ररहित केवल श्रीअंगका ध्यान करना बतलाया है। एक-एक अंगका ध्यान और उसके सौन्दर्य, माधुर्य एवं महिमाओंका प्रेमपूर्वक चिन्तन बतलाया है। फिर श्रीचरणारविन्दकी नखमणिचन्द्रिका या