भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपलम्भ होता है। जैसे चन्द्रके सम्बन्धसे राहुका दर्शन होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धिके सम्बन्धसे परमात्मपदका दर्शन होता है। भावना-भावित भगवान्की सगुण मूर्ति ही वास्तविक दिव्य मूर्तिरूपमें व्यक्त होती है। भगवान् सर्वत्र होते हुए भी मायाजवनिका (पर्दे)-से ढके हैं। उसे हटाकर वे जहाँसे चाहें वहाँसे व्यक्त हो सकते हैं। पाषाणसे भी मायाजवनिकाको हटाकर भगवान् प्रह्लादके लिये प्रकट हो सकते हैं, तब फिर शुद्ध मन तो भगवान्के उपलम्भका साधन ही है। वस्तुतः किसी भी वस्तुमें चित्तको एकाग्र करनेसे मूल परमात्मपदकी ही प्राप्ति होती है। जैसे स्फटिकमें लालपुष्पके सम्बन्धसे 'रक्तः स्फटिकः' (लाल स्फटिक है) ऐसी बुद्धि होती है, उसीमें यदि किसीको 'स्फटिक है' ऐसा ज्ञान प्रमुष्ट (विलुप्त) हो जाता है तो उसे उसमें पद्मरागमणिकी बुद्धि होती है। आगे चलकर चन्द्रकी चाँदनी आदिके संसर्गसे उसीमें इन्द्रनीलकी बुद्धि होने लगती है। फिर भी इन सभी बुद्धियोंका आलम्बन एक स्वच्छ स्फटिक ही है। वैसे ही एक शुद्ध ब्रह्मतत्त्व ही मायाके सम्बन्धसे अव्यक्त ब्रह्म और सूक्ष्म प्रपंच उपाधिसे उपहित होनेपर हिरण्यगर्भ एवं स्थूल प्रपंचसे उपहित होकर वही विराट् कहलाता है। जैसे स्वच्छ स्फटिकमें ही इन्द्रनीलबुद्धिसे दृढ़ चिन्तनद्वारा इन्द्रनीलबुद्धि मिटकर पद्मरागबुद्धि होगी। यह दृढ़ चिन्तनकी महिमा है कि वह चिन्तनीय वस्तुका यथार्थ स्वरूप अवगत करा देता है। अतः पद्मरागका चिन्तन रक्त स्फटिकका बोध करा देगा। पुनश्च उसके चिन्तनसे अन्तमें अवश्य ही 'शुद्धः स्फटिकः' ऐसा बोध हो जाता है। वैसे ही स्थूलका चिन्तन करते-करते सूक्ष्मका और फिर उसका चिन्तन करते-करते कारणका, फिर कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्मका बोध (साक्षात्कार) होता है। शुद्ध मन तो ऐसी सुन्दर उपाधि है, जहाँ 'स्वच्छः स्फटिकः' के समान शुद्ध ब्रह्मका बोध होता है। अन्य मूर्तियोंके चिन्तनमें चिन्तनीय पदार्थ पृथक् होता है, मन चिन्तन-व्यापारमें ही लगा रहता है। परंतु यहाँ तो मन ही ध्येय भगवान्की मूर्तिरूपसे भी व्यक्त होता है और वही चिन्तन करनेवाला होता है। मानसजपमें भी यही हाल है, वहाँ मनको ही मानसमन्त्र बनना पड़ता है। इस मानसजप और ध्यानसे मनकी शुद्धि, एकाग्रता, भगवान्के वास्तविक स्वरूपकी प्राप्ति बड़ी ही सुविधाके साथ हो जाती है।
अव्यभिचार भक्तियोग
प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्को अव्यभिचार भक्तियोगसे सेवन करनेवाले सात्त्विक, राजस, तामस गुणोंका उल्लंघन करके ब्रह्मभावको प्राप्त होते हैं। गुणमय संसारसे छूटनेका एकमात्र यही सुन्दर उपाय है। वेदान्तोंका श्रवण, मनन करनेपर जिस प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परमात्मतत्त्वका निश्चय होता है उसीका निरन्तर निदिध्यासन करनेसे उसीका साक्षात्कार होता है। रज्जु आदि अधिष्ठानके साक्षात्कारसे उसमें कल्पित सर्प, धारा, माला आदिका जैसे अभाव हो जाता है, वैसे ही निर्विकार सर्वाधिष्ठान चिदात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसे उसमें कल्पित गुणमय प्रपंचका आत्यन्तिक अभाव हो जाता है। इसी कारण 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।' (गीता १४।२६) यहाँपर अव्यभिचार भक्तियोगसे शुद्ध परब्रह्मका निदिध्यासन या ज्ञानाभ्यास ही लिया जाता है। यद्यपि भक्तिका ज्ञान या निदिध्यासन अर्थ पक्षपातयुक्त-सा प्रतीत होता है तथापि 'स्व- स्वरूपानुसन्धान' को भक्ति कहा है। विचार करनेसे यह ठीक भी मालूम पड़ता है। विषयाकारका भजन करनेवाला ज्ञान 'भक्ति' शब्दसे कहा जा सकता है।