भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पुरुषोंको क्लेश अधिकतर होता है; क्योंकि देहधारियों— देहाभिमानियोंको अव्यक्त गति—निर्गुणप्राप्ति सम्पादित करनी बहुत कठिन है— क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ (गीता १२।५) यहाँ यह कहा जा सकता है कि 'जब श्रुतियोंमें निर्विशेष ब्रह्मकी उपासनासे अविद्या, तत्कार्यात्मक- प्रपंचनिवृत्ति तथा परमानन्दप्राप्तिरूप मोक्ष सद्यः श्रुत है एवं सविशेष ब्रह्मकी उपासनासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति कही गयी है, जिससे कालान्तरमें कैवल्य प्राप्त होता है, तब निर्विशेष ब्रह्मकी उपासनासे सविशेष सगुण- ब्रह्मकी उपासनाका उत्कृष्टत्व कैसे कहा जा सकता है?' यद्यपि यह ठीक है कि अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, निराकार, निर्विकार, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म परमात्माकी उपासनासे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मका साक्षात्कार होनेसे मूल अविद्याकी निवृत्ति होती है और अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंचकी निवृत्ति होते ही अनावृत परमानन्दघन ब्रह्मात्मनावस्थानरूप सद्योमुक्ति प्राप्त हो जाती है और सगुण ब्रह्मकी उपासनासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति एवं कल्पान्तमें ब्रह्माके साथ कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है, अतः सगुणोपासनाकी अपेक्षा फलदृष्टिसे निर्गुणोपासनाका ही महत्त्व है तथापि निर्गुणोपासनामें कठिनाई अधिक है, सगुणोपासनामें सरलता है—'क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्।' (गीता १२।५) यदि कहा जाय कि 'निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति उत्कृष्ट है, अतः उसमें अधिकतर क्लेश होना उसकी निकृष्टताका हेतु नहीं है; क्योंकि उत्कृष्ट फलप्राप्तिमें अधिकतर क्लेश होता ही है' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि सगुण-उपासनासे भी उसी फलकी प्राप्ति होती है, जिसकी निर्गुणोपासनासे। इसका कारण यह है कि भगवत्कृपासे भगवत्स्वरूप साक्षात्कारद्वारा उसी निर्गुणोपासक-प्राप्य कैवल्यपदकी प्राप्ति हो जाती है। मनोवचनातीत, अनिद्मात्मक (दृश्यप्रपंचसे अतीत), अनिर्देश्य ब्रह्मका प्राणिबुद्धिमें आरोहण ही अतिकठिन होता है। नामरूपक्रियात्मक दृश्यप्रतीतिका निराकरणके बिना निर्दृश्यक दृक्का अभिव्यंजन होना अशक्य है; क्योंकि जैसे चन्द्रमाके किसी असाधारण अवस्थाविशेष विशिष्टस्वरूपपर ही राहुका प्राकट्य होता है, अन्यथा नहीं, वैसे ही दृश्याकार परिणामविवर्जित रजस्तमोऽननुविद्ध विशुद्धचित्तसत्त्वपर ही— प्रत्यक्चैतन्याभिन्न निर्विशेष ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। चित्तकी तादृशी अवस्था सम्पत्ति देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त दुःशक है। इसके विपरीत सगुणोपासनामें सरलता है। यद्यपि बाह्य विषयोंसे मनःप्रत्यावर्तनपूर्वक भगवत्स्वरूपमें मनोयोग करना कठिन ही है तथापि निर्गुण, निर्विशेषमें मनोयोग उससे भी कठिन है। उसकी अपेक्षा सगुणमें मनका आकर्षण होना सरल है। भगवान्की मंगलमयी मनोरंजक लीलाएँ मुक्त, मुमुक्षु, विषयी आदि सब तरहके अधिकारियोंके चित्तको खींचनेवाली होती हैं। जनसाधारण, वे चाहे ज्ञान, तत्साधनविहीन भी क्यों न हों, उनके कल्याणार्थ निर्गुण, निराकार, निर्विकार, शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म सगुण, साकाररूपमें प्रकट होता है— नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) राम, कृष्ण, विष्णु, शिवकी उपासना शुद्ध ब्रह्मकी ही उपासना है। बुद्धि कुछ भी हो, किंतु जिस वस्तुकी उपासना होती है, उसीकी प्राप्ति होती है। जैसे दीपक-बुद्धिसे भी यदि चिन्तामणिमें प्रवृत्त हुआ जाय तो भी प्राप्ति चिन्तामणिकी ही होती है, वैसे ही चाहे जिस बुद्धिसे भगवान्की उपासना हो, प्राप्ति उस परमात्माकी ही होती है। सच्चिदानन्द परब्रह्म आकाशादि समस्त प्रपंचका कारण है और सर्वत्र विराजमान है। विशेषतः बुद्धिरूपा गुहा या हार्दाकाशमें उसका विशेष रूपसे