भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगुणोपासनामें सरलता ६०९ रसामृतमूर्ति मनोहर विग्रहका ध्यान, भावन, मानस- आराधन ही समस्त पुरुषार्थोंका परम मूल है। बिना इसके सगुण या निर्गुण किसी भी स्वरूपका साक्षात्कार नहीं हो सकता। पुरुषार्थका मूल ही क्या, महानुभावोंने इसीको परम पुरुषार्थ भी स्वीकार किया है। यदि मनका अखण्ड प्रवाह सौन्दर्यमाधुर्यसुधाजलनिधि भगवान्के श्रीअंगकी ओर हो, पदनखमणिचन्द्रिका या अमृतमय मुखचन्द्रके माधुर्य-रसास्वादनमें दृष्टि आसक्त हो जाय, तब तो कुछ अवशिष्ट ही नहीं रहता। परंतु जबतक मनोमयी भगवदीय मूर्तिरूपमें भगवान्का प्राकट्य नहीं हुआ और इस ओर पूर्ण मानसी स्थिति नहीं हुई, तबतक उसकी सिद्धिके लिये अन्य अर्चा आदि मूर्तियोंमें भगवान्की तनुजा और वित्तजा आराधना करनी चाहिये। आचार्योंने कहा है कि प्राणियोंको सदा ही श्रीकृष्ण-सेवामें संलग्न रहना चाहिये। उनमें भी मानसी सेवा बड़े महत्त्वकी है। चित्तकी भगवत्प्रवणता (भगवान्में तन्मयता) ही मानसी सेवा है, उसीकी सिद्धिके लिये तनुजा और वित्तजा सेवा करनी चाहिये— कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा॥ (श्रीमद्वल्लभाचार्य) सगुणोपासनामें सरलता श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द भगवान्से अर्जुनने प्रश्न किया कि जो भक्त आपकी परम श्रद्धासहित उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षरकी उपासना करते हैं, इन दोनोंमें कौन अतिशय रूपसे आत्यन्तिक पुरुषार्थप्राप्तिके उपायको जाननेवाले हैं? एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ (गीता १२।१) प्रश्नका आशय यह है कि गीतामें द्वितीय अध्यायसे लेकर दशम अध्यायपर्यन्त भगवान्ने भिन्न- भिन्न स्थलोंमें सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, निराकार, निर्विकार, सर्वेन्द्रियाद्यगोचर ब्रह्मकी एवं सर्वैश्वर्यसर्वज्ञानशक्त्यादि- सम्पन्न विशुद्ध सत्त्वमय सगुण भगवत्स्वरूपकी उपासनाका वर्णन किया है। विशेषतः विश्वरूपाध्यायमें भगवान्ने सगुण परमेश्वरके अचिन्त्य, अद्भुत, लोकोत्तर- चमत्कारी स्वरूपका दर्शन भी कराया और अन्तमें ‘मत्कर्मकृत्’ (११।५५)—इस वचनसे यह कहा कि मेरे लिये श्रौत-स्मार्तकर्म करता हुआ, मुझे ही ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य समझता हुआ मेरी भक्ति करे और सर्वभूतोंमें वैरभावविवर्जित हो तो प्राणी मुझे प्राप्त कर लेता है। सगुणोपासना एवं निर्गुणोपासनाका तारतम्य ऐसी स्थितिमें यह सन्देह होना स्वाभाविक है कि दोनों उपासनाओंमें कौन श्रेष्ठ है? ‘एवं’ शब्दसे अव्यवहित पूर्वोक्त प्रकारका परामर्श होता है। यद्यपि अव्यवहित पूर्व ग्यारहवें अध्यायमें विश्वरूपका वर्णन है तथापि यहाँ सविशेष स्वरूपमात्रकी उपासनाका प्रश्न समझना चाहिये अर्थात् जो कोई भगवान्के अचिन्त्यानन्त कल्याणगुणगणार्णव विश्वरूप एवं श्रीमन्नारायण, श्रीसदाशिव अथवा श्रीकृष्णचन्द्र परमा- नन्दकन्द, श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रकी उपासनामें निरत है और जो भगवान्के निर्विशेष स्वरूपमें निरत है, इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? तब श्रीभगवान्ने कहा—जो महानुभाव मेरे सगुणस्वरूपमें मन लगाकर परम श्रद्धासे उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें अत्यन्त श्रेष्ठ हैं— मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ (गीता १२।२) तब क्या निर्गुण स्वरूपमें परिनिष्ठित श्रेष्ठ नहीं है? इस आशंकाका समाधान करते हुए भगवान् कहते हैं कि अव्यक्त, निर्गुण ब्रह्ममें निरतचित्त