भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहा जा सकता है? परमात्मवस्तु तो सर्वत्र सर्वदा ही विराजमान है, अतः उसके प्रमाणान्तरसंवादी साक्षात्कारको भ्रम माननेका कोई भी कारण न होते हुए भी योगमायासे आवृत होनेके कारण सबको नहीं उपलब्ध होते। जिसके प्रति योगमायारूप जवनिका (पर्दा)-का अपसारण हो जाता है, उसे ही भगवान्का साक्षात्कार होता है। भगवान्के स्वेच्छामय स्वरूपका प्रादुर्भाव कहीं भी हो सकता है। परीक्षित्के रक्षार्थ उत्तराके गर्भमें; प्रह्लादके रक्षार्थ स्तम्भमें जैसे उनका आविर्भाव हो सकता है, वैसे ही भक्तकी भावनासे भक्तके हृदयमें भी प्रादुर्भाव होता है। इसीलिये भावुकोंने कहा है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भगवन्! भक्त अपनी बुद्धिसे आपके जैसे-जैसे रूपका भावन करता है, आप वैसे-वैसे ही स्वरूपको धारण करते हैं। इसीलिये भक्तकी इच्छासे ही भगवान्का रूप बनता है। उपासनामें भावनाका प्राधान्य प्रथम शास्त्रों और सत्पुरुषोंके वचनोंसे भगवान्के स्वरूप और सौन्दर्य, माधुर्य, भूषण, वसन, अंग- उपांग आदिकी मनसे ही भावना की जाती है और वह भावना नीलमेघ, पंकज, मणि, सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि उपमाओंके ही आधारपर होती है, पश्चात् ध्यान और मानसपूजनकी महिमासे वही साधारण-सी ही भावनामयी मूर्ति दिव्य श्रीविग्रहरूपमें व्यक्त हो जाती है। इसीलिये यहाँकी भावना केवल मनोराज्य नहीं है। धातुमयी मूर्तिमें भी यद्यपि ईश्वरके व्यापक होने और मन्त्रकी विचित्र शक्तिसे उनका आविर्भाव माना जाता है तथापि भावनाकी वहाँ भी बड़ी प्रधानता है। तभी कहा गया है कि भावमें ही देवता है, इसीलिये भाव ही मुख्य कारण है— भावेषु विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥ साधारण-से-साधारण भोग या नैवेद्यमें भावनाकी महिमासे प्रियत्वसम्पत्ति हो जाती है। भावुक लोग भगवान्के सम्मुख स्थापित नैवेद्यमें श्रीलक्ष्मीनिर्मित दिव्यभोगकी भावना करते हैं। कौसल्या-सुमित्रादि माताओं और सुनयनादि श्वश्रुओंसे निर्मित अनन्त व्यंजनोंकी भावना साधारण शाकमें भी बनायी जा सकती है। भक्त कहता है— 'नाथ! आपने जिस रुचिसे शबरीके बेर और सुदामाके तण्डुलको ग्रहण किया था, उसी रुचिसे मेरे इस नैवेद्यको ग्रहण करो। देव! श्रीयशोदा, रोहिणीके हाथके नवनीत और दधिकी भावनासे मेरे इन पदार्थोंको ग्रहण करो।' श्रीसीता-राधासे परिवेशित व्यंजनोंकी भावनासे सचमुच भक्तसमर्पित वस्तु वैसी ही हो जाती है। भगवान्के सम्मुख स्थित नैवेद्योंमें श्रीराधाकी अधर- सुधा और भूषण-वसनोंमें श्रीराधाकी ही भावनासे अपनी समर्पित वस्तुओंका महत्त्व बढ़ा लिया जाता है। किसी कर्ममें साभिनिवेश मनका योग होनेसे उसका महत्त्व बढ़ जाता है। यज्ञ, दान, तप आदि भी विद्याभावनासहित किये जानेसे उच्चतम फलके कारण बन जाते हैं। कायिक, वाचिक, मानस—विविध कर्मोंमें मानस कर्मकी महिमा अधिक है। कायिक, वाचिक, कर्मोंका मूल भी मानस कर्म ही है। जैसे सूर्यकान्तापर सूर्य व्यक्त होता है, वैसे ही शुद्ध भावनापर भगवान्का प्राकट्य होता है। भावनामयी मूर्तिपर भगवान्का प्राकट्य होता है। जैसे वह्निकी ज्वाला, चन्द्र-सूर्यकी ज्योत्स्ना या प्रभा अन्यत्र अव्यक्त होनेपर भी अभिव्यंजक संस्थानके योगसे व्यक्त होती है, वैसे ही मन्त्रविधान और भावनाकी महिमासे मूर्तियोंमें देवतत्त्वकी अभिव्यक्ति होती है। इन दृष्टियोंसे मनोमयी मूर्तिमें तो साक्षात् ही भगवान्का आविर्भाव होता है। यद्यपि सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मतत्त्वका स्वरूप श्रुति-युक्तिसे समझ लिया जा सकता है और इसे भी अनन्तानन्त जन्मोंके पुण्यपुंजका ही परिणाम समझना चाहिये तथापि श्रद्धाभक्तिपूर्वक निरन्तर चिन्तन एवं भावनाके बिना तत्त्वका अपरोक्ष नहीं होता। सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान्की निखिल-