भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानसी आराधना ६०७ चिन्तन करनेसे प्राणियोंको परम सद्गति प्रदान करती है। जिन महानुभावोंके अन्तर हृदयमें भगवान्के श्रीअंगकी मनोमयी प्रतिमा सदा विराजमान रहती है, वे तो अपना ही क्या; विश्वका कल्याण कर सकते हैं। वे भगवान्की मानसी मूर्तिके ध्यानको ही परम पुरुषार्थ मानते हैं, त्रिभुवनसम्पत्तिके लिये भी भगवान्के मंगलमय श्रीचरणारविन्दसे लव या अर्धनिमेष भी चलायमान नहीं होते। जिस हृदयमें भगवान्के चरणारविन्दकी नखचन्द्र- चन्द्रिका विस्तीर्ण है, वहाँ शोक-मोह, पाप-ताप रह ही कैसे सकते हैं? जिस तरह शैत्यके योगसे निर्मल जल ही बर्फ, ओलारूपसे उपलब्ध होता है, किंवा घृत-वर्तिका या विचित्र जलादिके संघर्षसे अदृश्य व्यापक अग्नि ही दाहकत्व-प्रकाशकत्व-विशिष्ट दीपशिखा या विद्युल्लता-रूपमें अभिव्यक्त होती है, उसी तरह विशुद्ध सत्त्वमयी स्वेच्छा या कृपाके योगसे ही अदृश्य, अनन्त, आनन्दसुधाम्बुनिधि परतत्त्व ही मायासे अनभिभूत या असंस्पृष्ट दिव्य मूर्तिमान् होकर व्यक्त होते हैं। उनका दर्शन, स्पर्श, अनुभव, परतत्त्वका ही अनुभव है। अतएव जिन लोगोंने भगवान् श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रका दर्शन, स्पर्श, अनुगमन किया; वे सभी परम पदके भागी हुए— स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा। कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ (श्रीमद्भा० ९।११।२२) सीताके सन्देशसे प्रसन्न होकर मारुतिको अपने श्रीअंगका परिष्वंग (आलिंगन) देते हुए भगवान्ने ही कहा है— एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥ (वा०रा० ६।१।१३) अर्थात् महात्मा मारुतिको इस अवसरपर मैं सर्वस्वभूत यह परिष्वंग (ब्राह्मसंस्पर्श) देता हूँ। इन बातोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्गुण, निरंजन, विगत-विनोद, व्यापक ब्रह्म ही श्रीकौसल्यानन्दवर्धन राम या यशोदोत्संगललित श्रीकृष्णके रूपमें व्यक्त होता है। फिर उनके संस्पर्शसे उनकी प्राप्ति—ब्रह्मकी प्राप्ति क्यों न हो? इतना ही नहीं, भावुकोंके मानस- पंकजमें व्यक्त भगवान्की मंगलमयी मानसी प्रतिमा भी शुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही है, तभी उसका हृदयमें आधान होनेसे मुक्तिकी बात संगत हो सकती है। यद्यपि मनकी और कल्पनाएँ मनोराज्य-कोटिमें परिगणित होती हैं तथापि श्रीभगवान्के सम्बन्धकी सभी कल्पनाएँ—भावनाएँ—आराधनापदसे व्यवहृत होती हैं। जैसे—कामुक विधुरकी भावनासे होनेवाले कामिनी- साक्षात्कारको प्रमा (यथार्थ ज्ञान) न मानकर भ्रमरूप ही माना जाता है, वैसे उत्कण्ठापूर्वक भावनासे होनेवाले भगवान्के साक्षात्कारको भ्रमरूप नहीं समझा जाता; क्योंकि जैसे भावरूप निदिध्यासन या निर्गुणोपासनसे निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार होता है, वैसे ही सगुण ब्रह्मकी भावनासे उसका साक्षात्कार होता है। यद्यपि कामुक-कामित कामिनी-साक्षात्कार और भक्तभावित भगवत्साक्षात्कार—इन दोनों ही स्थलोंमें पुनः-पुनः साभिनिवेश चिन्तनरूप अभ्याससे जन्य संस्कारप्रचय (संस्कार-समूह) ही कारण है, अर्थात् अभ्यासजन्य संस्कार-प्रचयकी ही महिमासे ब्रह्मका साक्षात्कार और उसीसे भावित कामिन्यादिका साक्षात्कार होता है तथापि ब्रह्मसाक्षात्कार-स्थलमें प्रमाणका संवाद होनेसे उसे प्रमा (यथार्थ ज्ञान) माना जाता है। प्रमाण-संवाद न होनेसे ही भावित कामिन्यादि साक्षात्कारको भ्रमरूप माना जाता है। जिस ब्रह्मका अभ्यासजन्य संस्कारसंस्कृत अन्तःकरणसे जिस रूपमें साक्षात्कार होता है, वह अपौरुषेय स्वतःप्रमाण वेदान्तसे सम्मत है। अतः वह साक्षात्कार प्रमाणरूप है, परंतु अन्यभावनाजन्य प्रत्यक्षोंमें प्रमाणका संवाद नहीं है। इसके सिवा विधुरभावित कामिनी या शीतातुरभावित अग्निका साक्षात्कार तो होता है, परंतु वहाँ तो वे हैं ही नहीं। जब जिसका साक्षात्कार होता हो और वह वस्तु वहाँ न हो, तब उस साक्षात्कारको प्रमा कैसे