भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 616

६०६ भक्तिसुधा जो आचार-व्यवहारचिह्न हैं, वे सभी उसको अत्यन्त आदरणीय होने चाहिये। कोई जिज्ञासु यह पूछ सकता है कि 'कुछ शैव तथा वैष्णवोंका कहना है कि गायत्री, यज्ञोपवीत एवं अन्यान्य ब्राह्मणादि धर्म शैव या वैष्णवके लिये गौण हैं, उनके लिये तो अष्टाक्षर, पंचाक्षरादि मन्त्रका ही अत्यन्त प्राधान्य होना चाहिये। वेद-शास्त्र तथा तदुक्त वर्णाश्रम-धर्मके बिना भी केवल शैव एवं वैष्णवधर्मसे उनका कल्याण हो जाता है।' इसका यह उत्तर है कि यद्यपि विष्णुमन्त्रादि प्राणिकल्याणके साधनरूपमें आदरणीय हैं तथापि वैष्णवतादिसे द्विजत्व ही अधिक प्रबल है; क्योंकि द्विजत्व परमेश्वरदत्त है। वैष्णवत्व, शैवत्व आदि प्राणिसम्पादित हैं, अतः वैष्णवतादिके निमित्तसे होनेवाले धर्मोंका सम्मान अवश्य करना चाहिये; परंतु परमेश्वरदत्त द्विजत्वकी रक्षाका भी ध्यान रखना परमावश्यक है। द्विजत्वकी अभिव्यक्ति यज्ञोपवीत, भस्म एवं शिखासे होती है। वैष्णवताकी अभिव्यक्ति कण्ठी, गोपीचन्दनादिसे होती है। वैष्णवताके चिह्नोंसे द्विजत्वके चिह्नोंका तिरस्कार अत्यन्त असंगत है। इसलिये वैदिकोंके गृहमें वैष्णवताको द्विजत्वसे अवरुद्ध होकर ही रहना चाहिये। अवैदिकोंके यहाँ यथारुचि व्यक्त लिंगोंसे वैष्णवता भले ही रहे। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि शैव, वैष्णव, शाक्त—इन सभी सम्प्रदायोंमें प्रधान रूपसे दो भेद हो गये हैं—एक वैदिक, दूसरा अवैदिक। वैदिकोंके यहाँ वेद तथा वेदोक्त कर्म एवं तदनुसारी लिंगोंका प्राधान्य होता है और तदविरुद्ध प्रकारसे ही विष्णु, शिव आदि देवताओंकी उपासना होती है तथा सभी देवताओंका सम्मान होता है। इन वैदिकोंमें किसी दूसरे देवताकी निन्दा करना पाप समझा जाता है। परंतु अवैदिक वैष्णवों तथा शैवोंके यहाँ वेद या तदुक्त धर्म-कर्म तथा तदनुकूल लिंगोंका कोई सम्मान नहीं, केवल साम्प्रदायिक आगम-तन्त्रादिके अनुसार आचार एवं चिह्नोंका ही अधिक सम्मान है। द्विजके लिये वैदिक चिह्नोंका तिरस्कार अयुक्त है, शैवत्व या वैष्णवत्व पितृपरम्परासे नियत नहीं है। वैदिक लोगोंका तो यही कहना है कि जिस पुत्रके कल्याणके लिये उसके पिता, माता, पितामह-प्रपितामह आदिने जिस व्रतका या देवताका अनुष्ठान-आराधन किया हो, उस पुत्रके कल्याणका मूल वही व्रत एवं उसी देवताका आराधन है। ऐसी व्यवस्था माननेसे राग-द्वेष मिट जाते हैं। अतः जिसकी मातृ-पितृ- परम्परामें जिस देवताकी आराधना प्रचलित हो, उसे उसी देवताके आराधनमें तत्पर होना चाहिये।

मानसी आराधना

अजगररूपधारी अघासुरके मुखमें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने भी अपने बछड़ोंकी रक्षाके लिये प्रवेश किया। अघासुर अपनी अजगर-देहको छोड़ भगवान्‌के स्वरूपमें मिल गया। साधारण दृष्टिसे यहाँ आश्चर्य हो सकता था कि गो-ब्राह्मणोंके मांस- रुधिरोंसे उदर-पोषण करनेवाले, देवधर्म-शास्त्रद्रोही उस असुरको भगवत्सायुज्यपद कैसे प्राप्त हुआ ? इसीपर श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकने परीक्षित्‌से कहा— राजन् ! जिसके मंगलमय श्रीअंगकी मानसी प्रतिमा एक बार हृदयमें धारण करनेसे अपरिगणित प्राणियोंको मुक्ति प्राप्त हो जाती है, वे मायातीत सच्चिदानन्द भगवान् जिसके हृदयमें साक्षात् प्रविष्ट हुए, उसके सायुज्य (मुक्ति)-में क्या आश्चर्य— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) भगवान्‌के मंगलमय श्रीअंगकी काष्ठमयी, धातुमयी प्रतिमा भी श्रद्धा-उत्कण्ठापूर्वक हृदयमें धारण और