भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
६१२ भक्तिसुधा
'विषयाकारं भजतीति भक्तिः'। इसके अतिरिक्त 'भज सेवायाम्' धातुसे 'भक्ति' शब्दकी सिद्धि होती है—'भजनं भक्तिः।' भजन अर्थात् सेवनको ही भक्ति कहा जाता है। मानसी सेवा सेवा यद्यपि शरीर, इन्द्रिय, बुद्धिसे की गयी कायिकी, ऐन्द्रियिकी, मानसी भेदसे अनेक हैं तथापि मुख्य सेवा मानसी ही है। मानसी सेवा ही सर्वश्रेष्ठ है। श्रीवल्लभाचार्यजीने भी कहा है— कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा॥ अर्थात् प्राणीको सदा श्रीकृष्णसेवा करनी चाहिये। सेवामें भी मानसी सेवा ही सर्वोत्कृष्ट सेवा है। चित्तकी कृष्णोन्मुखता या कृष्णमें तन्मयता ही सेवा है। मानसी सेवाकी सिद्धिके लिये ही तनुजा और वित्तजा सेवा करनी चाहिये। अर्थात् कायिकी, वाचिकी आदि सेवा करते-करते अन्तमें मानसी सेवाकी योग्यता प्राप्त होती है। 'विजातीयप्रत्ययनिरासपूर्वकं सेव्याकाराकारित मानसी वृत्तिप्रवाह' ही मानसी सेवा है। जिस प्रकार समुद्रोन्मुखी गंगाका अखण्ड प्रवाह चलता है, उसी प्रकार भगवदुन्मुखी मानसी वृत्तियोंका प्रवाह चलना ही भगवान्की मानसी सेवा है। जैसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्द भगवान्के आकारसे आकारित वृत्तिका प्रवाह होता है, वैसा ही वेदान्तवेद्य, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान्की स्वरूपविषयीणी वृत्तियोंका भी प्रवाह होता है। निर्विकार परब्रह्माकार मानस प्रवाह ही भक्ति, भजन या सेवा है और वही भगवान्का प्रापक होनेसे या एकाग्रता होनेसे योग भी है। जब वह बीच-बीचमें भगवान्से हटकर बाह्य प्रपंचोंसे जुड़ जाता है, तब व्यभिचारी कहा जाता है। अतः अन्यसम्बन्धविवर्जित, निर्विशेष भगवान्के आकारसे आकारित अविच्छिन्न मानस वृत्ति-प्रवाह ही अव्यभिचार भक्तियोग है, वही ज्ञानाभ्यास है और वही निदिध्यासन भी है। चार प्रकारके भक्त इस अव्यभिचार भक्तियोगसे भगवान्का सेवन करनेसे साक्षात्कारद्वारा अति शीघ्र ही गुणमय प्रपंचका बाध हो जाता है। ज्ञान चतुर्थी भक्ति है। अतः भगवान्के आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार भक्त होते हैं—'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।' (गीता ७।१६) ज्ञानी ज्ञानसे ही भगवान्का भजन या सेवन करता है। ज्ञानी भगवान्का अत्यन्त प्रिय भक्त है। यद्यपि भगवान्के भजन करनेवाले सभी भगवान्के प्रिय एवं उदार हैं तथापि ज्ञानी तो एकमात्र भगवान्में ही भक्ति करता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें भगवान्से भिन्न दूसरी वस्तु रहती ही नहीं। अतएव ज्ञानीको भगवान् एक क्षणके लिये भी अदृश्य नहीं होते और भगवान्को ज्ञानी अदृश्य नहीं होता— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ (गीता ६।३०) प्रथम सूक्ष्मतत्त्वमें मनकी स्थिति असम्भव है, अतः विराट्, हिरण्यगर्भादि तत्त्वोंमें मनको स्थित करके फिर क्रमेण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् सगुणमें स्थिति-सम्पादन करते हुए निर्गुण, निराकार, निर्विशेष, ब्रह्ममें स्थिति सम्पन्न होती है। स्थूल आलम्बनोंका अपोहन करते हुए सूक्ष्म आलम्बनोंमें चित्तकी एकाग्रता करते हुए अन्तमें चित्त अत्यन्त निरालम्ब बनाया जा सकता है। श्रीकपिलदेवजीने भी निर्गुण, निर्विकार ब्रह्ममें स्थितिके लिये भगवान्की मधुर, मनोहर, मंगलमयी, सगुण, साकार सच्चिदानन्दमयी मूर्तिका ध्यान बतलाया है। प्रथम अस्त्र-शस्त्र, भूषण, वसनादिसे सुसज्जित मूर्तिका ध्यान कहा है, फिर अस्त्र-शस्त्ररहित केवल श्रीअंगका ध्यान करना बतलाया है। एक-एक अंगका ध्यान और उसके सौन्दर्य, माधुर्य एवं महिमाओंका प्रेमपूर्वक चिन्तन बतलाया है। फिर श्रीचरणारविन्दकी नखमणिचन्द्रिका या
अव्यभिचार भक्तियोग ६१३
अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य, माधुर्यमें मनकी तल्लीनता कही गयी है। परम पवित्रता, अद्भुत महिमा, लोकोत्तर सौन्दर्य, माधुर्यके चिन्तनसे भावुकका मन प्रेमोन्मादमें विभोर हो जाता है। प्रेममें जैसे अंग एवं वागादि इन्द्रियोंमें शैथिल्य होता है, वैसे ही मनमें भी शैथिल्य आता है, जिससे कि वह ध्येयस्वरूपको भी ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाता है। जब मन सब दृश्योंसे रहित हो जाता है, यहाँतक कि ध्येयस्वरूपसे भी शून्य हो जाता है, तब ध्येयके अभावमें ध्येयाकार वृत्तिरूप ध्यान और ध्यानका आश्रयरूप ध्याता भी नहीं उपलब्ध होता। उस समय ध्याता-ध्यान-ध्येयके बाधके अवधि एवं साक्षिरूपसे भगवान्का प्राकट्य होता है। अर्थात् भावुकोंका मन आकर्षण करनेके लिये ही भगवान् ध्येयरूपसे प्रकट होते हैं। उसे आकर्षित करके फिर वही भगवान् ध्येयातीत अग्राह्य रूपमें प्रकट होते हैं। यों भी भगवान्में ही चित्त लगाकर भगवत्परायण होकर सर्वभावसे जो भगवान्को भजते हैं, भगवान् उनके ऊपर कृपा करके उन्हें बुद्धियोग प्रदान करते हैं। उनके हृदयमें तेजोमय ज्ञानदीपका प्रकाश करके अज्ञानान्धकार दूर कर देते हैं— ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ (गीता १०।१०-११) सविकल्पक और निर्विकल्पक ब्रह्म यद्यपि वेदान्तवेद्य परमतत्त्व अत्यन्त अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य है तथापि भगवान्के भक्त निश्चिन्त रहते हैं। वे जानते हैं कि हमें निरन्तर प्रभुके पाद- पंकजमें आत्मसमर्पण करके प्रभुका भजन ही करना चाहिये। यदि प्रभु अपने निर्गुण, निराकार, निर्विकार स्वरूपका साक्षात् कराना आवश्यक समझेंगे तो जिस किसी तरह साक्षात्कार करा देंगे। अत्यन्त बधिरके लिये शब्द एवं जन्मान्धको रूप वैसे ही दुर्ग्राह्य हैं, जैसे अज्ञानीको ब्रह्म दुर्ग्राह्य है, परंतु भगवान् श्रोत्र और नेत्रका निर्माण करके दुर्ग्राह्य शब्द और रूपको सुग्राह्य एवं सुज्ञेय बना देते हैं। उन भगवान्को अपने अत्यन्त अचिन्त्य एवं दुर्ज्ञेय निराकार रूपका साक्षात्कार करा देनेमें कोई भी कठिनाई नहीं पड़ती। अतः पूर्ण विश्वास और आशासे भगवान्के पाद-पंकजका अव्यभिचार भक्तियोगसे सेवन करनेवालेको दुर्गम-से-दुर्गम सभी तत्त्व प्राप्त हो जाते हैं। फिर गुणोंका उल्लंघन भी उनके लिये सुगम हो जाता है— सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ श्रीमुखकी भी उक्ति है— ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ (गीता १४।२७) अर्थात् अमृत, अव्यय, शाश्वतधर्म एवं ऐकान्तिक सुखस्वरूप ब्रह्मकी मैं ही प्रतिष्ठा हूँ। मुझे भजनेसे गुणोंका अतिक्रमण बड़ी सरलतासे हो सकता है। 'अहं' पदका अर्थ प्रत्यगात्मा है। भावार्थ यह हुआ कि जैसे महाकाश ही घटाकाशके रूपमें प्रतिष्ठित होता है, वैसे ही मैं प्रत्यगात्मा ही परब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। अर्थात् परमात्मा ही प्रत्यगात्मारूपमें प्रतिष्ठित होता है। अतः जैसे घटाकाश महाकाशसे अभिन्न ही है, उसी तरह प्रत्यगात्मा परमात्मस्वरूप ही है। परमात्मा प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा)-रूपसे प्रतिष्ठित होते हैं। प्रत्यगात्मा परमात्माकी प्रतिष्ठा है अथवा 'अहं' पदका अर्थ प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, मायातीत, अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, निर्विकल्प, निर्विशेष शुद्ध परमात्मा है, जैसा कि 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४), 'ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्' (गीता १२।३), 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४) इत्यादि स्थलोंमें विवक्षित है। ब्रह्मपदका अर्थ मायाविशिष्ट सविशेष सविकल्प ब्रह्म है। इस तरह भावार्थ यह हुआ कि मैं निर्विकल्प ब्रह्म सविकल्प ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। निर्विकल्प ब्रह्ममें
६१४ भक्तिसुधा सविकल्प ब्रह्म प्रतिष्ठित कल्पित है। मुझे सेवन करनेसे सविकल्प प्रपंचका लंघन बड़ी सरलतासे हो सकता है अथवा 'ब्रह्म' पदका निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्म अर्थ है और 'अहं' पदका अर्थ सगुण, साकार, ब्रह्म (श्रीकृष्ण) है। अभिप्राय यह है कि मैं सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। यहाँ 'राहोः शिरः' के समान सम्बन्धार्था षष्ठी अभेदमें ही है अर्थात् जैसे व्यापक, अव्यक्त अग्नि दहन, प्रकाशन, पाचनादि कार्य करनेके लिये घृत, वर्तिकादिके सम्बन्धसे व्यक्त साकार अग्निके रूपमें प्रतिष्ठित-प्रवृत्त होता है, वैसे ही निर्गुण, निराकार, निर्विकार, अव्यक्त ब्रह्म भक्तानुग्रहादि कार्य करनेके लिये अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे सगुण, साकार व्यक्तरूपमें प्रतिष्ठित होता है। इसीलिये सगुण ब्रह्म ही निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा है। अतः मेरा आराधन करनेसे ही गुणोल्लंघन आदि भक्तानुग्रह सिद्ध होता है। कुछ लोगोंका कहना है कि सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा अर्थात् आधार है। जैसे आतप (घाम)-की प्रतिष्ठा उसका उद्गमस्थान या आधार सूर्य है, सूर्यसे ही निकलकर सूर्यके सहारे ही आतप रहता है, वैसे ही सगुण, साकार श्रीकृष्णचन्द्रकी मधुर मूर्ति ही निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा या आधार है। सूर्यस्थानीय श्रीकृष्ण हैं, आतप-स्थानीय निर्गुण ब्रह्म है। 'अनादिमत्परं ब्रह्म' (गीता १३।१२)—इस वचनमें भी ब्रह्मको 'अनादि' और 'मत्परं' कहा गया है। यहाँ 'मत्परं' का अर्थ यह है कि 'अहं श्रीकृष्णः पर उत्कृष्टो यस्मात्तन्मत्परम्।' मैं श्रीकृष्ण ही हूँ, पर-उत्कृष्ट, जिससे—निर्गुण ब्रह्मसे उत्कृष्ट मैं सगुण ब्रह्म हूँ। इसीलिये उन लोगोंका मत है कि औपनिषद ब्रह्मात्मदर्शियोंका ब्रह्म आतपके समान है और भक्तोंका भगवान् सूर्यस्थानीय है। परंतु उनका यह कथन श्रुति-सूत्रोंके विरुद्ध है। वेद, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र आदि सभी शास्त्रोंका परम तात्पर्य ब्रह्ममें ही है। 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तैत्तिरीय० २।१), 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१), 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि वाक्योंमें सर्वत्र ब्रह्मका ही विचार चलता है। श्रीकृष्ण वैदिक औपनिषद परब्रह्मसे भिन्न होते तब तो उनमें वेदवेद्यता नहीं सिद्ध होती, जो कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो' (गीता १५।१५) इत्यादि वचनोंसे भगवान्ने स्वीकार की है। अतएव 'अनादिमत्परं ब्रह्म' यहाँ भी 'मत्परं' ऐसा पदच्छेद न करके 'अनादिमत्परं ब्रह्म' ऐसा पदच्छेद करना युक्त है, जिसका सारांश यह है कि ब्रह्म अनादिमान् एवं पर अर्थात् सर्वोत्कृष्ट है। ब्रह्म-पर्यवसायी- प्रकरणको विच्छिन्न करके अन्य वर्णनका प्रसंग लाना अप्राकृत प्रक्रिया है एवं ब्रह्मज्ञानकी प्रशंसाके प्रसंगमें उसे किसीसे भी अपकृष्ट कहना सर्वथा विचारशून्यता है। श्रीमद्भागवतमें भी सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदरहित, स्वप्रकाश, नित्य विज्ञानको ही तत्त्व कहा है— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० १।२।११) 'अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वविद् लोग तत्त्व कहते हैं, उसीको ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् कहा जाता है।' कुछ लोगोंका कहना है कि यहाँ ब्रह्मसे परमात्मामें और उससे भगवान्में उत्कर्ष विवक्षित है। यदुकुलभूषण श्रीकृष्णकी सभामें बैठे हुए यादवोंने आकाश-मार्गसे आते हुए देवर्षि श्रीनारदजीको प्रथम केवल तेजःपुंज ही समझा। कुछ समीप आनेपर कोई देहधारी समझा और अधिक समीप होनेपर पुरुष एवं सर्वथा सान्निध्यमें श्रीनारद समझा। चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ (शिशुपालवध १।३) ठीक उसी तरह तत्त्वसे अति दूरस्थ अधिकारीको प्रथम केवल चिन्मात्र ब्रह्मका बोध होता है, कुछ
सामीप्य होनेपर योगियोंको कतिपय गुण-विशिष्ट परमात्मा, सर्वथा सान्निध्य होनेपर अनन्त कल्याण- गुणगण-विशिष्ट भगवान्के रूपमें तत्त्वका उपलम्भ होता है। इन्हीं लोगोंमें ही मनमानी कल्पना करनेवाले कुछ लोग श्रीकृष्णको आदित्यस्थानीय और ब्रह्मको प्रकाशस्थानीय मानते हैं। कुछ श्रीवृषभानुकिशोरीके नख-मणि-प्रकाश या नूपुर-प्रकाशको ही औपनिषद परब्रह्म कहते हैं, परन्तु वैदिकोंकी दृष्टिमें तो वेदोंका महान् तात्पर्य ब्रह्महीमें है और वही सब तरहसे सर्वोत्कृष्ट है। ब्रह्म—अतिशयताकी कल्पनासे अतीत संकोचका कारण न होनेसे वृद्ध्यर्थक ‘बृहि’ धातुसे निष्पन्न ‘ब्रह्म’ शब्दका अर्थ निरतिशय बृहत्तम तत्त्व होता है। जो देश-काल-वस्तु-परिच्छेदवाला हो, वह तो परिच्छिन्न होनेके कारण क्षुद्र ही है, निरतिशय बृहत् नहीं। यदि जड़ हो तो भी दृश्य होनेसे अल्प और मर्त्य होगा। अतः अनन्त, स्वप्रकाश, सदानन्द तत्त्व ही ‘ब्रह्म’ पदका अर्थ होता है और वही भूमा अमृत है। उससे भिन्न सभीको अल्प और मर्त्य ही समझना चाहिये। फिर अनन्त पदके साथ पठित ‘ब्रह्म’ शब्दका सुतरां यही अर्थ है। उसमें अतिशयताकी कल्पना निर्मूल है। किसी राजाने ऐसी कहानी सुननी चाही कि जिसका अन्त ही न हो। एक चतुरने सुनाना आरम्भ किया। राजन्! एक वृक्ष था, उसकी अनन्त शाखाएँ थीं, उन शाखाओंमें अनन्त उपशाखाएँ थीं, उपशाखाओंमें भी अनन्त पल्लव थे और उनपर अनन्त पक्षी बैठे थे। कुछ कालमें एक पक्षी उड़ा ‘फुर्र’। राजाने कहा आगे कहिये, इसपर उसने कहा दूसरा उड़ा ‘फुर्र’। तब राजाने कहा और आगे कहिये, तब उस चतुरने कहा कि पहले पक्षियोंका उड़ना पूरा हो तब आगे बढूँ। यहाँ एक-एक पक्षीका उड़ना समाप्त ही नहीं हो सकता। इसी तरह कल्पनाओंका अन्त ही नहीं है। अतः एक शब्दमें यही कहा जाता है कि अतिशयताकी कल्पना करते-करते वाचस्पति तथा प्रजापतिकी भी मति जब विरत हो जाय और जिससे आगे कभी भी कोई कल्पना कर ही न सके, तब उसी अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश, परमानन्दघन, भगवान्को वेदान्ती ब्रह्म कहते हैं। उसीका ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ इत्यादि व्याससूत्रोंसे विचार किया गया है। प्रकाशकी अपेक्षा आदित्यमें जिस अतिशयताकी कल्पना की जाती है। उससे भी अनन्तकोटि-गुणित अतिशयताकी कल्पनाके पश्चात् जिस अन्तिम निरतिशय, सर्व बृहत् पदार्थकी सिद्धि हो उसमें भी देश, काल, वस्तुके परिच्छेदोंको मिटाकर परिच्छिन्न या एकदेशिता आदि दूषणोंका अत्यन्ताभाव-सम्पादन करे, तब उसे ब्रह्म शब्दका अर्थ जानना चाहिये। इसीको ‘तत्त्व’ कहा जाता है। इसका ही लक्षण है—‘तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।’ इसीका नाम ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् है। लक्षणके भेदसे लक्ष्य-भेद हो सकता है, नाम-भेदसे नहीं। जैसे कम्बुग्रीवादिमत्त्व घटका एक लक्षण है, अतएव घट, कुम्भ, कलशादि नामसे उसका भेद नहीं है। हाँ, ब्रह्म अनेक हैं— कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म, कार्यकारणातीत ब्रह्म। ऐसी स्थितिमें यह हो सकता है कि कार्यकारणातीत वेदान्तवेद्य शुद्ध-ब्रह्मरूप भगवान्के प्रकाशस्थानमें कार्यब्रह्म या कारणब्रह्म हो। प्रायः यह भी कहा जाता है कि निर्गुण ब्रह्म भगवान्का धाम है। यद्यपि धाम शब्द ऐसे स्थलोंमें स्वरूपभूत आत्मज्योतिका ही बोधक होता हैं—‘परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।’ (गीता १०।१२) ‘हे नाथ! आप परमात्मा हैं, परम प्रकाश (परम ज्योति) और परम पवित्र हैं’ तथापि कुछ अविवेकियोंकी यही अटल धारणा है कि धामका अर्थ निवासस्थान ही होता है। अस्तु, वे लोग अव्यक्तरूप कारण-ब्रह्मको ही वेदान्तवेद्य ब्रह्म मान बैठते हैं। कार्यकारणातीत तत्त्वतक उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। इस कारण यदि ब्रह्मको धाम भी मान लें तो भी सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं पड़ती। यह भेद वेदान्तियोंको इष्ट ही है कि स्थूल कार्य-ब्रह्मके ऊपर सूक्ष्म कार्यरूप ब्रह्म, उसके ऊपर कारणब्रह्म और इस अव्यक्त कारणब्रह्मके ऊपर
६१६ भक्तिसुधा कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म स्थित है। यह अन्तिम तत्त्व ही अद्वितीय अनन्त शुद्ध बोधरूप है। इसका ही विवर्त समस्त चराचर प्रपंच है। यदि सर्वाधिष्ठान होनेके कारण इसे सर्वनिवासस्थान भी कहें तो भी कोई हानि नहीं। इसी अंशका स्पष्टीकरण भागवतके इन पद्योंमें किया गया है— ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्मनिर्गणम्। अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा॥ (श्रीमद्भा० ३।३२।२८) एक अद्वितीय नित्य बोध ही भ्रान्तजनोंको अविद्या- प्रत्युपस्थापित बहिर्मुख इन्द्रियाँ तथा मन-बुद्धि आदि द्वारा शब्दादि-धर्मक प्रपंचरूपसे भासित होता है। श्रीमद्भागवतने भी श्रीकृष्णको परब्रह्म ही कहा है— अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३२) अतः पूर्वोक्त अर्थ ही श्रेष्ठ है और वही अव्यभिचार भक्तियोग है।
सबसे सगे भगवान्
जीवात्मा सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका अंश है। जैसे घटाकाश, महाकाश; शरावाकाशके भीतर, बाहर, मध्यमें महाकाश, कटक, मुकुट, कुण्डल आदिके भीतर, बाहर, मध्यमें सुवर्ण और तरंगके भीतर, बाहर, मध्यमें जल विद्यमान है; वैसे ही चेतन, अमल, सहज सुखराशि जीवात्माओंके भीतर, बाहर, मध्यमें सच्चिदानन्द परमात्मा विद्यमान हैं। इस दृष्टिसे जीवात्मा भगवान्का पुत्र, अंश एवं स्वरूप है। जैसे शूकर-कूकुरके बच्चे शूकर-कूकुर होते हैं, सिंहके बच्चे सिंह होते हैं, वैसे ही 'अमृतस्य पुत्राः,' (श्वेताश्वतर० २।५) 'ममैवांशो जीवलोके' (गीता १५।७) इत्यादि श्रुतिस्मृतिके अनुसार भगवान्के पुत्र या अंश जीवात्मा भगवान्के स्वरूप ही ठहरते हैं। जैसे निर्मल जल पृथ्वीपर पड़ते ही मलिन हो जाता है, वैसे ही शुद्ध चिदात्मा मायाके संसर्गसे मलिन हो जाता है। भगवान् जीवोंके परम अन्तरङ्ग और घनिष्ठ सम्बन्धी हैं। संसारकी सब वस्तुओंका वियोग अनिवार्य है। कलत्र, पुत्र, मित्र, क्षेत्र सभी वस्तुओंके साथ जीवात्माका सम्बन्ध गौण ही है। मुख्य सम्बन्ध तो भगवान्का ही है। जीवात्मा स्वर्ग, नरक जहाँ भी जाय, भगवान् ही उसके साथ होते हैं और सभी लोग सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। अघासुरके मुखमें ग्वालबाल प्रविष्ट हो गये, उसके विषसे उन्हें जलते हुए देखकर प्रभु श्रीकृष्ण भी प्रविष्ट हो गये। संसारमें है किसीकी प्रीति या शक्ति ऐसी, जो एक साँपके मुखमें पड़े पुत्र या मित्रके साथ स्वयं भी जाय ? किसी स्त्रीका पुत्र कूपमें गिरता है, वह कूपके तटपर खड़ी होकर चिल्लाती है—'दौड़ो, दौड़ो, बच्चेको निकालो' पर कूपमें उतरनेकी हिम्मत उसकी
सबसे सगे भगवान् ६१७ एक वहम है' तब कहीं व्यापक भूकम्पोंद्वारा, कहीं महामारियोंद्वारा, कहीं प्राकृतिक विकट तूफानों या विश्वव्यापी नरसंहारोंद्वारा प्राणियोंको परमात्माका स्मरण दिलाया जाता है। फिर भी जैसे कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा अपने शिशुओंका कभी भी अहित नहीं चाहती, वैसे ही प्रभु भी कभी भी प्राणियोंका अहित नहीं चाहते। तभी तो वे निरीश्वरवादी प्राणियोंका भी कल्याण चाहते हैं। उनपर भी कुपित नहीं होते। इसी आशापर तो ब्रह्माने कहा था कि 'हे नाथ ! यद्यपि मैंने आपकी कौतुकपूर्ण क्रीड़ामें विघ्न डाला, आपके बछड़ों और ग्वालबालोंका हरण करके बड़ा ही अपराध किया तथापि प्रभो, जैसे अम्बा गर्भगत शिशुके पैर चलानेको अपराध नहीं मानती, वैसे ही आप भी हमारे ऐसे कर्मोंपर ध्यान न दें। प्रभो, सम्पूर्ण विश्व ही आपके उदरमें है फिर गर्भगत शिशुके समान ही प्राणियोंके अपराधोंको क्षमा करना क्या उचित नहीं है ?' उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध ही स्थिर है प्रभुने क्षमा भी कर दिया। उन्होंने सरल-से- सरल उपाय शास्त्रोंद्वारा बता रखा है। पत्र, पुष्प, फल, जल, नमस्कारसे ही प्रभु प्रसन्न हो सकते हैं। कुछ भी न हो तो केवल मनसे ही पूजन, स्मरण और वह भी न बने तो भाव, कुभाव जिस किसी तरह भगवान्के नाम- जपसे ही परम गति प्राप्त हो सकती है। जब एक अदृष्टकी, जो वस्तुतः सबका द्रष्टा या असली स्वरूप है, उसपर विश्वास होगा, तब सम्पूर्ण दुनियाके सम्बन्ध, नाते अपने-आप फीके लगने लगेंगे। संसारके कलत्र, मित्र, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, क्षेत्र, वित्त आदि सभी वस्तुओंका सम्बन्ध केवल स्थूल देहके साथ ही है। उसके नष्ट होते ही वे सब सम्बन्ध अपने-आप ही छूट जाते हैं। 'यदद्य पच्यते ह्यन्नं सायं तच्च विनश्यति ।' जो भात आज प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक सड़ जाता है। उसमें दुर्गन्ध आने लगती है। फिर, ऐसे विनश्वर, क्षणभंगुर शरीरका आत्माके साथ कहाँतक सम्बन्ध रह सकता है? एक जन्मकी बात कौन कहे, जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंके देहों एवं तत्सम्बन्धी पुत्र, पौत्र, कलत्रोंका स्मरण करें तो चित्तकी क्या दशा होगी? यही समझकर आचार्यचरणोंने कहा है— कति नाम सुता न लालिता कति वा नेह वधूरभुञ्जिहि। क्वनु ते क्वनु ताश्च वा वयं भवसङ्गः खलु पान्थसङ्गमः॥ जन्म-जन्मान्तरोंमें कितने पुत्रोंका लालन नहीं किया, कितनी सुन्दरी रमणियोंका संस्पर्श नहीं किया, परंतु आज कहाँ वे पुत्रादि, कहाँ वे रमणियाँ, कहाँ हम सब ? यह संसारका संगम केवल यात्रियोंके संगके समान अस्थिर है। स्थिर सम्बन्ध तो एकमात्र भगवान्का ही है, जो कि स्वर्ग, नरक, कहीं भी जीवका संग नहीं छोड़ते। जीवात्मा और परमात्मा दोनों ही एक शोभन पंखवाले सुपर्ण पक्षी हैं, दोनों सुपर्ण एक जातिके पक्षी हैं, इसलिये भी उन दोनोंका आपसमें मुख्य सम्बन्ध है। साथ ही दोनोंकी परस्पर पूर्ण मैत्री है। परमात्मा पालकसखा है, जीवात्मा बालकसखा है। दोनोंहीकी 'चेतन अमल सहज-सुख-राशिरूप' से ख्याति भी है। कहीं साजात्य सख्य होनेपर भी दुर्दैवयोगसे भिन्न देशमें रहनेके कारण सम्बन्ध कमजोर हो जाता है। परंतु यहाँ तो एक ही शरीररूप वृक्षपर जीवात्मा-परमात्मा दोनों ही पक्षी रहते हैं। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्य—तीनों तरहके सम्बन्ध दृढ़ हैं। यद्यपि भगवान् जड़वर्गसे सर्वदा असंस्पृष्ट और निर्लेप ही रहते हैं तथापि चिद्रूप जीवात्माके साथ तो भगवान्का तादात्म्य या अभेद सम्बन्ध रहता है। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्यके समान ही सायुज्य भी सर्वदा ही रहता है। जैसे कभी घटाकाश महाकाशसे वियुक्त नहीं होता, तरंग जलसे पृथक् नहीं होती, घट-
६१८ भक्तिसुधा शरावादि मृत्तिकासे वियुक्त नहीं होते, कटक-मुकुटादि सुवर्णसे पृथक् नहीं होते, वैसे ही जीवात्मा कभी भी भगवान्से विमुख नहीं होता। इस तरह अपने असली सम्बन्धी भगवान्को भूल जानेसे ही प्राणी अनेकानर्थपरिप्लुत भवाटवीमें ही भटकता है और दुःख पाता है। जब कभी भी सावधान होकर वह भगवान्की ओर दृष्टि करता है, प्रभु उसपर पूर्ण कृपा करके अपना लेते हैं। विभीषण-शरणागति भगवान्के चरणपंकजमें पहुँचे बिना, इस अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनाट्यके सूत्रधार प्रभुके शरण गये बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती। पृथ्वी, जल, तेज, सूर्य, अग्नि, चन्द्रमण्डल, नक्षत्रमण्डल जिसके संकेतपर नाचते हैं, उसकी शरणागतिके बिना अखण्ड शान्ति कहाँ ? पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण शान्ति एवं पूर्ण नियामकत्व भगवान्में ही होता है। सब लोग चाहते हैं कि 'आनन्दस्वरूप बन जाऊँ, पूर्ण स्वतन्त्र हो जाऊँ, सबका नियमन- शासन करूँ।' इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द अत्यन्त प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही आनन्द होता है। स्पष्ट ही है कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री-पुत्रादिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही वे द्वेष्य हो जाते हैं। परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहते हैं। कभी किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह नास्तिकसे भी नास्तिक आनन्दको चाहता है, उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील और उसके लिये लालायित होता है। परंतु उसमें पहचाननेकी ही कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे वह पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन स्त्री-पुत्रादि, शब्द, स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। विवेचन करनेसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम-द्वेष होता है, वह सुख नहीं है। सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। सांसारिक सम्भोग-साधन- पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं हैं। किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णा-प्रशमनके अनन्तर शान्त, अन्तर्मुख मनपर जिस सुखका आभास पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो शुद्ध अन्तरात्मा है, वही आनन्द है; क्योंकि जो लक्षण आनन्दका है, वही अन्तरात्माका भी है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं होता, ठीक वैसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता। अतः अन्तरात्मा ही आनन्द और निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमका आस्पद है। उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे 'अहं सुखी' इत्यादि व्यवहार होता है। वही सुख किंवा अन्तरात्मा है। इसीके लिये समस्त कार्य- करणसंघातकी प्रवृत्ति होती है। यही सुख-दुःख- मोहात्मक, नानात्मक संघातसे विलक्षण, सुख-दुःख- मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही सच्चिदानन्दका आनन्दरूप है। जीवभावसे मुक्त हुए बिना पूर्ण स्वातन्त्र्य सम्भव नहीं इसी तरह प्राणिमात्र स्वतन्त्रता चाहता है। एक चींटीको भी पकड़नेपर वह व्याकुलताके साथ हाथ- पैर चलाती है। शुक-सारिकादि विहंगम सुवर्णके भी पंजरमें रहकर सुन्दर, मधुर, भक्ष्य-पेयको नहीं पसन्द करते, किंतु बन्धनमुक्त होकर स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलोंको भी खाकर जीवन बिताना अच्छा समझते हैं।
इस तरह प्राणिमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित हैं। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा ? परंतु स्वतन्त्रताके वास्तविक रूपका विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी भगवान्का स्वरूप है, क्योंकि बिना असंग सच्चिदानन्दको प्राप्त किये बन्धनमुक्ति एवं स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निरालम्बन है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण देहका सम्बन्ध विद्यमान है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी ? भले ही कोई माता, पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, विपत्ति, दरिद्रता, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ेगा; क्योंकि जबतक कुछ स्वतन्त्रताका त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना एवं ज्ञानद्वारा मल, विक्षेप, आवरणको दूरकर शरीरत्रयबन्धन किंवा जीवभावसे मुक्त होकर निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर ले, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल नहीं सकता। इस विवेचनसे यह स्पष्ट होता है कि यह बन्धन, मुक्ति और स्वातन्त्र्य भी सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, प्रत्यगभिन्न, सच्चिदानन्द भगवान्का ही स्वरूप है। इसी तरह प्राणिमात्रको यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ। यहाँतक कि माता-पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। यह सभी भाव जीवभावके रहते पूर्ण नहीं हो सकते। समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्के ही परतन्त्र हो सकते हैं। जब आस्तिक-नास्तिक सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यता या सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक भी जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, वह तत्त्व भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, परब्रह्म भगवान् नहीं हैं; क्योंकि प्राणिमात्रके अन्तरात्मा भगवान् ही हैं, फिर उनसे विमुख होकर निःसत्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा ? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिजीकी उक्ति है कि 'लोके न हि स विद्यते यो न राममनुव्रतः।' लोकमें कोई ऐसा हुआ नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। भगवान्के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है निजी सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणिमात्रकी भगवदनुगामिता है। भेद यह है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे नहीं जानते। अस्तु, स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञानपूर्वक प्रभुको ही 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्' (गीता ९।१८) जानकर उनसे प्रेम करना चाहिये। भगवान्के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है। भक्तिसे ही पूर्णानुरागरससारसिन्धु मर्यादापुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके प्रत्यक्ष दर्शन हो सकते हैं। 'रसो वै सः। रसꣳ ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।' भक्तिसे ही अरविन्दनयन भगवान्के श्रीचरणार- विन्द-मकरन्दरसका समास्वादन प्राप्त होता है। प्रेमी भक्त श्रीआनन्दकन्द कोसलचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्ष- पातसे युक्त अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका पान करनेमें ही अपनेको कृतकृत्य समझते हैं और निर्निमेष नयनोंसे उसी दिव्य रूपमाधुरीका पान करते हुए आनन्दोन्मत्त हो जाते हैं। इनका भगवान्में स्वाभाविक सहज, अकृत्रिम प्रेम होता है। विशुद्ध प्रेममें कुछ भी कामना नहीं होती। इसी विशुद्ध प्रेमका वर्णन देवर्षि नारदने अपने भक्तिसूत्र (५४)- में किया है—'गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण- वर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम् ॥' प्रेमीको अपने निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद प्राणधन भगवान्में गुण-दोष देखनेका अवकाश ही नहीं मिलता। वे इसलिये भगवान्में प्रेम नहीं करते कि हमारे भगवान् अचिन्त्य, अनन्तकल्याणगुणगणनिलय हैं, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक हैं, सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश
६२० भक्तिसुधा
हैं, देवाधिदेव हैं, सर्वतन्त्रस्वतन्त्र हैं, दिव्यातिदिव्य सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण हैं एवं परमानन्दरससारसिन्धुसर्वस्व हैं इत्यादि, क्योंकि किसी गुणको देखकर जो प्रेम होता है, वह तो गुण न दीखनेपर नष्ट हो जा सकता है। परंतु विशुद्ध दिव्य प्रेममें गुण-गणोंकी अपेक्षा ही नहीं होती। प्रेमी अपने प्रेमास्पदमें प्रेम ही करता है, चाहे वह अचिन्त्य अनन्तकल्याणगुणगणनिलय हो अथवा सर्वगुणविहीन हो, चाहे सुन्दरातिसुन्दर, दिव्यवसनभूषण-अलंकारसे सुसज्जित हो, चाहे सौन्दर्यविहीन हो। चाहे दिव्यातिदिव्य ऐश्वर्यसम्पन्न हो, चाहे दीन, हीन, दरिद्र हो, चाहे सर्वतन्त्रस्वतन्त्र हो, चाहे बन्धनयुक्त हो। एक बार महात्मा तुलसीदासजी श्रीमद्वृन्दारण्य- धाममें गये, वहाँ व्रजेन्द्रनन्दन, श्यामसुन्दर, मदनमोहन, आनन्दकन्द, परमानन्द श्रीकृष्णचन्द्रके उपासकोंने उनसे कहा—'महात्मन्! आप व्रजेन्द्रनन्दन, श्यामसुन्दर, मदनमोहन, सौन्दर्यमाधुर्यरसामृतसारभूत श्रीकृष्णचन्द्रकी उपासना छोड़कर श्रीराघवेन्द्रजीकी उपासना क्यों करते हो? क्या आपको मालूम नहीं कि श्रीराघवेन्द्रजी १२ कलाके एवं श्रीकृष्णजी १६ कलाके पूर्ण अवतार हैं?' उन व्रजभक्तोंकी यह बात सुनते ही श्रीतुलसीदासजी ऐसे प्रेमविभोर हो गये कि उन्हें अपना भान ही न रहा और बेहोश होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। गोस्वामीजीकी ऐसी दशा देखकर वे व्रजवासी घबराये और बेहोशी दूर करनेके लिये तरह-तरहका उपचार करने लगे। उन्हें यह पश्चात्ताप होने लगा कि हमने इनके उपास्यकी हीनता बतलाकर इनके हृदयको क्यों कष्ट पहुँचाया। अन्ततोगत्वा कुछ समयोपरान्त उनको होश हुआ। व्रजभक्तोंके पूछनेपर उन्होंने कहा कि 'अभीतक तो मैं आनन्दकन्द कोसलचन्द्र श्रीमद्राघवेन्द्रजीको कोसल- राजकिशोर जानकर, श्रीकौसल्या अम्बाका ललन जानकर एवं रघुराजजीके मंगलमय मनोहर गुण-गणोंकी ओर आकर्षित होकर ही उनकी उपासना करता था, किंतु आज आपसे यह जानकर कि हमारे राघवजी भगवान्के अवतार तो हैं, चाहे १२ कलाके हों, चाहे इससे भी कम, मैं परमानन्दरससारसमुद्रमें डूब गया।' यह है विशुद्ध प्रेमका ज्वलन्त उदाहरण ! इसी प्रकार एक बार श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें रासलीलाके समय योगीन्द्रमुनीन्द्रवन्दितपादारविन्द, लीलाविहारी, वंशीधर, श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र, परमानन्दकन्द अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्धान हो जानेसे श्रीश्रीव्रजांगनाएँ शोक-विह्वल होकर एवं अपने निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद, प्राणधन, व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके विप्रयोगजन्य तीव्र तापसे दुःखी होकर इधर-उधर भटक रही थीं और अशोक वृक्ष एवं नागेश्वरसे पूछती थीं कि 'हे तरुओ ! आपने हमारे प्राणप्यारेको इधर कहीं जाते देखा हो तो कहो। हम आपका बड़ा अनुग्रह मानेंगी।' अभिप्राय यह कि उन्मत्त एवं शोकाकुल होकर इधर-उधर फिर रही थीं। इतनेमें भगवान् श्रीकृष्ण उनकी प्रेमपरीक्षा लेनेके लिये दिव्य, चिन्मय वसन-भूषण-अलंकारसे अलंकृत, सुसज्जित होकर सौन्दर्यनिधि विष्णुरूपमें प्रकट होकर उनके सामने आये। उनको देखते ही व्रजांगनाएँ सकुचा गयीं और घूँघटसे अपना-अपना मुख छिपा लिया। उनके व्यवहारको देखकर मायातीत, विज्ञानानन्दघन, परमात्मा, भक्तोंके प्रिय भगवान् विष्णुने कहा—'व्रजांगनाओ! क्यों सकुचाती हो ? आओ, हमारे संग रासलीलामें सम्मिलित हो, तुम्हारे श्याम- सुन्दरसे क्या हमारी शोभा कुछ कम है ?' सारांश यह कि भगवान् विष्णुके ऐसे अनेकानेक प्रलोभनोंमें वे न आयीं। तब भगवान् उनको प्रेमपरीक्षामें उत्तीर्ण समझकर मंगलमय श्रीकृष्णचन्द्र श्यामसुन्दरके रूपमें प्रकट हुए और रासलीला प्रारम्भ हुई। इन महाभागा व्रजांगनाओंकी चित्तवृत्ति ही श्याममयी बन गयी थी, जिसका वर्णन श्री देवकविने इस तरह किया है— औचक अगाध सिंधु स्याहीकौ उमड़ि आयो, तामें तीनों लोक बूड़ि गए एक संगमें। कारे-कारे आखर लिखे जु कारे कागद सु न्यारे करि बाँचे कौन जाँचे चितभंगमें॥ आँखिनमें तिमिर अमावसकी रैन जिमि, जंबूनद-बूंद जमुना-जल-तरंगमें।
विभीषण-शरणागति ६२१ यों ही मन मेरो मेरे कामकौ रह्यो न माई, स्याम रँग ह्वै करि समानो स्याम रंगमें ॥ अभिप्राय यह है कि गुण-दोषका पर्यवेक्षण छोड़कर परमानन्दरससार सिन्धुसर्वस्वमें डूबा हुआ प्रेमानन्दमय प्रेमी सर्वत्र अपने परमप्रियतम प्रेमास्पद प्राणधनको ही देखता है। उसे समस्त नामरूपक्रियात्मक प्रपंचका भान ही नहीं रहता। ऐसी ही स्थितिमें एक व्रजांगना कहती है— जित देखौं तित स्याममई है। स्याम कुंज बन, जमुना स्यामा, स्याम गगन घनघटा छई है॥ सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है। मैं बौरी, की लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है॥ चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद स्याम काम बिजई है। नीलकंठको कंठ स्याम है, मनो स्यामता बेल बई है॥ श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीपसिखापर स्यामतई है। नर-देवनकी कौन कथा है, अलख-ब्रह्म-छबि स्याममई है॥ इसी प्रकार भूतभावन सदाशिव शंकर विश्वनाथजीकी परमान्तरंगा अनन्योपासिका पार्वतीजीको सप्तर्षियोंने शंकरजीके अनेकानेक दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसद्गुणसम्पन्न भगवान् विष्णुमें मन लगानेको कहा, तब आद्याशक्ति, महाचिति, अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी शिवजीकी परमान्तरंगा भगवतीने उत्तर दिया— जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥ महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८१।५; दो० ८०) अहा ! प्रेमकी बात ही निराली है। प्रेमी प्रेमपाशमें बँधकर अपने जीवनको भी खतरेमें डाल देता है, पर अपनी टेक नहीं छोड़ता। चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई ॥ (रा०च०मा० २।२०५।४) प्रेमियोंमें चातक अग्रगण्य समझा जाता है। वह स्वातिबूँदको छोड़कर गंगाजलको भी जो कि साक्षात् ब्रह्मद्रव है, पान करना पसन्द नहीं करता, भले ही पिपासाके कारण प्राणपखेरू उड़ जायँ। पवित्रसलिला, पतितपावनी श्रीजाह्नवीके पावन तटके ऊपर किसी वृक्षपर एक पपीहा रहता था। अचानक वह एक दिन घायल होकर गंगाजीमें गिर पड़ा। गिरते समय अपने बच्चोंको पुकारकर उसने कहा—'देखना, कहीं मेरा पिण्डदान गंगाजलसे न करना।' वह स्वयं जलमें तो गिर पड़ा, किंतु मुखमें गंगाजल न चला जाय, इसलिये अपनी चोंच बन्द कर ली। यह है चातककी टेक। यदि मरणकालमें प्राणीके मुखमें गंगाजल पड़ जाय तो वह मुक्त हो जाय, किंतु मुक्तिको ठुकराकर पपीहेने अपने प्रेमकी रक्षा की। भ्रमरका भी प्रेम विचित्र है। पाषाणसदृश काष्ठमें भी छिद्र बनाकर निकल जानेका सामर्थ्य रखनेवाला भ्रमर कमलकोशमें बँध जाता है। एक भ्रमर था, वह कमलके भीतर बैठा मकरन्दरसका पान कर रहा था और उसके सौगन्ध्यसे मस्त हो रहा था। इतनेमें सन्ध्या हो आयी। सूर्यास्त होते ही कमल बन्द हो गया और मोटे-मोटे शाल और शीशमके पेड़ोंको भी छेद डालनेकी ताकत रखनेवाला भ्रमर उसके अन्दर ही रह गया और विचार करने लगा—'रात बीत जायगी, प्रातःकाल होगा, भगवान् भास्करकी किरणरश्मियोंसे कमल फिर खिल जायगा, तब मैं इसमेंसे निकल जाऊँगा। तबतक आनन्दसे मकरन्दका आस्वादन करता रहूँ।' वह यों विचार कर ही रहा था, इतनेमें एक मत्त गयन्दने आकर कमलको उखाड़कर मुँहमें डाल लिया और कमलके साथ भौंरा भी हाथीके दाँतोंसे पिस गया— रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजश्रीः। इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार॥ यदि वह चाहता तो बड़ी सुगमतासे कमलकोशके बाहर आ जाता, परंतु प्रेमबन्धन बड़ा ही मजबूत होता है। इसी प्रकार प्रेमके ही कारण पतंग दीपकपर बैठकर जल जाता है। मृगयु (बहेलिये)-के
६२२ भक्तिसुधा वीणावादनपर मुग्ध होकर हरिणियाँ अपना प्राण दे देती हैं। ये सब विशुद्धप्रेमके ज्वलन्त उदाहरण हैं। सूरके शब्दोंमें— ऊधौ! मन मानेकी बात। दाख छोहारा छोड़ि अमृतफल बिषकौरा बिष खात॥ जो चकोरको दै कपूर कोड तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें बँधत कमलके पात॥ ज्यों पतंग हित जानि आपनो, दीपकसों लपटात। 'सूरदास' जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥ इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने निरतिशय, निरूपाधिक, परप्रेमास्पद, प्राणधन भगवान्को ही अपना सर्वस्व समझते हैं और प्रभुका ही समाश्रयण लेते हैं। श्रीविभीषणजी रावणसे तिरस्कृत एवं अपमानित होकर अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक महाराजाधिराज, परात्पर, पूर्णतम, पुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्रजीको ही अपना 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।' (गीता ९।१८) जानकर आनन्दमें विभोर होकर और मनमें अनेकानेक मनोरथ संकल्प-विकल्प करते हुए चले— चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥ (रा०च०मा० ५।४२।४) त्संकल्पकी महिमा वह मनोरथ मनोराज्य नहीं। सांसारिक अभीष्टोंके लिये जो संकल्प-विकल्प होता है, उसीको 'मनोराज्य' और भगवान्के प्रति जो संकल्प-विकल्प होता है, उसे 'मनोरथ' कहते हैं। भगवद्दर्शनके लिये, प्रभुके मंगलमय श्रीचरणारविन्दमकरन्दरससमास्वादनके लिये जो संकल्प-विकल्प होते हैं, वे बड़े पुण्योंके फल हैं और उनसे बड़ा पुण्य होता है। भारतीय शास्त्रों एवं वर्तमान कालके पाश्चात्य वैज्ञानिकोंके भी मतसे संकल्पमें एक अद्भुत शक्ति होती है। उसके द्वारा बड़े-से-बड़े अनर्थोंको मिटाकर बड़े-से-बड़ा अभीष्ट सिद्ध किया जा सकता है। भगवान्के संकल्पसे ही अनन्त ब्रह्माण्डकी रचना होती है, अतः भगवान्के ही अंशभूत जीवोंके भी संकल्पमें विचित्र शक्तियाँ हैं। जो दाहकत्व शक्ति अग्निमें है, वही उसके अंशभूत विस्फुलिंगमें भी होती है। अतः संकल्पोंका प्रभाव अत्यन्त स्पष्ट है। फिर भी दुःसंकल्पों एवं दुराचारोंसे संकल्पकी दिव्य शक्तियाँ तिरोहित हो जाती हैं। सत्संकल्प, सदाचारसे दिव्य शक्तियोंका प्रादुर्भाव होता है। संकल्पबलसे यदि हम चाहें तो घटको पट एवं पटको घट बना सकते हैं। आवश्यकता है सत्संकल्पकी। निराशारूपी पिशाचिनीको दूरकर संकल्पबलसे सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। सत्संकल्पके द्वारा साम्राज्य, स्वाराज्य, वैराज्यादि सुख-सामग्री एवं स्वर्ग-अपवर्ग-सब कुछ मिल सकता है। परंतु संकल्पसिद्धिमें एक बड़ा भारी विघ्न है—निराशा अथवा असम्भावना। एक वृद्ध पुरुषको जिसने कि अपना सारा जीवन अत्याचार, अनाचार, दुराचार, व्यभिचारादिमें ही बिताया है, उसे यह विश्वास नहीं होता कि हमें भी भगवान् मिल सकते हैं। पर बात ऐसी नहीं है। किसीको भी निराश होनेका कारण नहीं। हमारे शास्त्रोंने सबके लिये आश्वासन दे रखा है। लोगोंको प्रायः इस प्रकारकी असम्भावना हुआ करती है कि 'मुझ दीन, हीन, मलिनके पास भगवान् कैसे आयेंगे, कैसे कृपा करेंगे, मैं बड़ा पापी हूँ, मुझे कैसे शरणमें रख सकते हैं।' पर यह बात भी नहीं। चिद्रूप जीवात्माके साथ परमात्माका अभेद सम्बन्ध रहता है। परमक spy मय भगवान् गाढ़-से-गाढ़, विषम-से-विषम स्थानोंमें भी जीवात्माका साथ नहीं छोड़ते। माँके पेटमें, विभिन्न योनियोंमें, नरकमें, किं बहुना जहाँ भी जीवात्माको जाना होता है, भगवान् वहीं जाते हैं। जीवात्मा कभी भी अनन्त आनन्दसिन्धु, परमानन्दकन्द भगवान्से वियुक्त नहीं होता। फेन, तरंग, बुद्बुदके भीतर-बाहर जैसे जल ही ओत-प्रोत है, वैसे ही स्वांशभूत जीवोंके बाहर-भीतर, चारों ओर भगवान् ही व्याप्त हैं। 'अमृतस्य पुत्राः' आस्तिक-नास्तिक सभी जीव अमृत भगवान्के पुत्र हैं। जैसे सिंहका पुत्र सिंह ही होता है, वैसे ही अमृतका पुत्र अमृत ही होता है। भगवान्का सच्चिदानन्दस्वरूप जीवमें भी है। जो
रसादि गुण होते हैं, वे सभी उसके विकार फेन, बुद्बुद, तरंगमें भी होते हैं। अग्निके विस्फुलिंगोंमें अग्निगत दाहकत्व, प्रकाशकत्व सभी गुण होते हैं। इसलिये सर्वावभासक, अखण्ड, अनन्त, अपरिच्छिन्न, आनन्दसिन्धु, परमानन्दकन्द भगवान् जीवके और जीव उनके हैं। भगवान् परमकारुणिक हैं। वे चाहते हैं कि जीव किसी प्रकारसे निरावरण निजानुभव करके जन्म-मरण-विच्छेद-लक्षण संसृतिसे विनिर्मुक्त हो जाय। तभी तो सृष्टिका निर्माण करते हैं। यद्यपि महाप्रलयकालमें सब जीव भगवान्के सम्मिलनसे सुखी थे, परंतु फिर भी परमप्रियतम प्राणधन भगवान्ने उनको सृष्टिकालमें जगाया। जिस प्रकार पुत्रवत्सला माता स्वाङ्कमें प्रसुप्त स्वपुत्रको किसी उत्तम फलके मिलनेपर उसे खिलानेको जगाती है, उसी प्रकार भगवान्के सभी पुत्र उनकी गोदमें सोते थे, भगवान्ने उन्हें उत्तम फल देनेके लिये जगाया—‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति।’ महाप्रलयमें सावरण भगवान्का अनुभव रहता है। भगवान्ने सृष्टि, स्थिति, प्रलय आदि परम्परासे सन्तप्त जीवोंको देखकर उन्हें निरावरण निजानुभव करानेके लिये सृष्टिका निर्माण किया। कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा कभी भी अपने पुत्रका अकल्याण नहीं चाहती, पुत्रजन्मके लिये तरह-तरहके देवी-देवताओंको मनाती है, पुत्रके गर्भमें आते ही हर्षके मारे फूली नहीं समाती, गर्भस्थ बालकके हस्त-पादादि-उत्क्षेपणसे कष्ट होनेपर भी उसे अपराध नहीं मानती, प्रत्युत ‘अब पुत्र बड़ा हो गया’ यह समझकर प्रसन्न होती है, पुत्रकी उत्पत्तिमें प्राणान्त कष्ट सहनकर भी आनन्दमें विभोर रहती है, स्वयं गीलेमें रहकर बालकको सूखेमें रखती है, मल-मूत्रादि अपने ऊपर लेती है। माँका हृदय कितना उदार होता है! वह पुत्रके लिये क्या-क्या नहीं करती? ठीक इसी प्रकार अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी, कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा अपने पुत्रों—जीवोंका अकल्याण कभी भी नहीं चाहती, अपितु उनका सर्वविध कल्याण ही चाहती है। इसीलिये तो भगवान् शंकराचार्यने कहा है कि पुत्र कुपुत्र हो जाय, पर माता कुमाता नहीं होती—‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥’ वह सदैव अपने पुत्रके उत्कर्षके लिये लालायित रहती है। तभी तो ब्रह्माजीने कहा है कि हे प्रभो! क्या गर्भगत बालकोंके पादप्रक्षेपको माता अपराध मानती है? नहीं, क्योंकि यह तो अबोध बालककी बात है— उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) यदि माता यह समझे कि इसने मेरे पेटमें रहकर मुझे कितना कष्ट दिया है और इसका बदला लेनेपर तुल जाय, तब तो उदरसे बाहर होते ही उस नवजात शिशुका गला घोंटकर वह उसके प्राण निकाल दे, किंतु माता उसके पादप्रक्षेपको अपराध नहीं मानती। अपराधी बालकोंपर भी माताएँ क्रोध नहीं करतीं, यदि करती हैं तो उनके कल्याणार्थ ही। जैसे दर्पणके भीतर पृथ्वी, सूर्य, नक्षत्रमण्डल, सागर, पर्वत सभी दीखते हैं, वैसे ही उस अखण्डबोधरूप सत्-तत्त्वके अन्तर्गत सभी पदार्थोंकी स्फूर्ति होती है, उसीसे सभी दीखते हैं। उस भगवान्की ही कुक्षिमें भावाभावात्मक सकल प्रपंच है। अतएव भगवान् स्व- कुक्षिगत पुत्रस्थानीय सकल प्राणियोंपर क्रोध नहीं करते— नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥ (रा०च०मा० ४।३।२) हम भगवान्, शास्त्र और धर्मसे क्यों शत्रुता करते हैं? इसलिये न कि हम स्वयं अपने वशमें नहीं हैं। मोहमयी प्रमादमदिराके पानसे जगत् प्रमत्त हो रहा है—‘पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्।’ उसीसे पतनके कारणमें प्रेम और अभ्युदयके कारणमें द्वेष होता है। इसीलिये वैदिक मन्त्रोंद्वारा भगवान्से
प्रार्थना की जाती है कि हे दयालो! हे करुणामय! आप मुझे न भूलना तथा मैं भी आपको न भूलूँ— 'माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्।' हाँ, ठीक भी है; क्योंकि जीव स्ववश नहीं है, मायाके वशमें है। अतएव भगवान्को न भूलना उसके वशमें नहीं है—'नाथ जीव तव मायाँ मोहा।', 'तव माया बस फिरउँ भुलाना।' यद्यपि हम अल्पज्ञ जीव अपने प्रियतम प्रभुको भूलकर उनकी आज्ञाका उल्लंघन करते हैं तथापि हे प्रभो! आप ऐसा नहीं कर सकते; क्योंकि आप तो सर्वज्ञ हैं— मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं। (रा०च०मा० ४।२।८) आप मुझे कैसे भूलते हैं? क्यों उपेक्षा करते हैं? आप मेरे ऊपर ऐसी अनुकम्पा कीजिये कि मैं भी आपको न भूलूँ। यद्यपि हम मोहवश आपको भूलते हैं तथापि पिता-माता पुत्रोंको नहीं भूलते, न उनका नाश ही चाहते हैं तो फिर प्रभो! आप अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान् होकर अपने पुत्रोंका नाश कैसे चाहोगे ? अस्तु, कहनेका अभिप्राय यह है कि किसीको भी निराश होनेकी आवश्यकता नहीं, आवश्यकता है श्रद्धा-विश्वासपूर्वक संकल्पकी। श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक भक्तलोग जिस तरह चाहते हैं, भगवान्को नचाते हैं। हठीले, रसीले भक्तोंके सामने भगवान्को घुटने टेकने ही पड़ते हैं। मचले हुए दर्शनाकांक्षी भक्त किसी भी बातसे सन्तुष्ट नहीं होते, मातृपरायण शिशुको बहुमूल्य रत्न दीजिये, सुन्दर, स्वादिष्ट पक्वान्न खानेको दीजिये, वसन-भूषण- अलंकारसे उसे खूब अलंकृत एवं सुसज्जित कीजिये, उसका खूब सम्मान कीजिये, यश गाइये, उसे विविध सुखसामग्रियों एवं स्वर्ग-मोक्षका प्रलोभन दीजिये, फिर भी वह स्नेहमयी, करुणामयी अम्बा और मातृस्तनोंको छोड़कर और कुछ भी नहीं चाहता, अम्बाकी अपेक्षा वह किसी भी पदार्थसे सन्तुष्ट हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार प्रेमी भक्तोंकी कामना केवल प्रभुको पानेके लिये ही होती है। एकमात्र प्रभु ही उसके काम्य होते हैं। बच्चा कुछ बड़ा हुआ, इधर-उधर कुछ चलने लगा, चलते-चलते ठोकर खाकर गिर पड़ा, रोने लगा। बच्चेका रोना सुनकर माँ दौड़ी आयी। बच्चा खीझ गया, गिर पड़ा स्वयं, परंतु क्रोध उसका मातापर हुआ। वह अपनी तोतली बोलीमें बार-बार कहता है—'तू मुझे अकेला छोड़कर क्यों गयी?' फिर अभिमान करके रूठ जाता है। कहता है—'जा, मैं तुझसे नहीं बोलूँगा, तेरी गोदमें नहीं आऊँगा।' माँ मनाती है, गोद लेना चाहती है, स्तन पिलाना चाहती है, वह रोता हुआ आगे भागता है। वह ऐसा क्यों करता है? इसलिये कि वह स्वाभाविक ही मातापर अपना अधिकार समझता है। माताको ही अपना 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी' एवं सर्वस्व समझता है, वह भूखा रहे तो माँका दोष, वह गिर जाय तो माँका अपराध, वह सो न सके तो माताका अपराध और अपराधका दण्ड खीझना तथा रूठना—क्रोध तथा अभिमान! किंतु ऐसी भावना कि 'भगवान् मेरे हैं, मेरा उनपर पूर्णाधिकार है' बड़े उच्चकोटिके भक्तोंमें होती है। ऐसे भक्तोंके पीछे परमानन्दरससार-सिन्धु-सर्वस्व, करुणामय, सर्व- सामर्थ्य, सर्वपद प्रभु बछड़ेके पीछे स्नेहवश दौड़नेवाली गौकी भाँति दौड़ते हैं। भक्त जो इच्छा करता है, उसकी पूर्ति करते हैं। भगवान्की भक्तपरवशताका एक दृष्टान्त श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें एक महात्मा रहते थे, वे एक दिन अरण्यमें घूमने गये। उनकी लम्बी जटा झाड़ीमें उलझ गयी, बस फिर क्या था, वे महात्मा भी अकड़ गये और कहने लगे कि 'जिसने उलझाया, वही सुलझाये।' अन्ततोगत्वा रसिकेन्द्रशेखर, भक्तभावनापराधीन प्रभु पथिकरूपमें प्रकट हुए और कहने लगे—'बाबा जी! आपकी उलझी हुई जटाओंको छुड़ा दूँ?' बाबाजीने कहा—'ना भैया! जिसने उलझाया, वही सुलझायेगा।' भगवान्ने कहा—'मैंने ही तो उलझाया है।' बाबाजीने कहा—'नहीं, मेरी जटाओंको तो अखिलरसामृतसिन्धु, व्रजेन्द्रनन्दन, मदनमोहन
श्यामसुन्दरने उलझाया है और वे ही सुलझायेंगे।' अन्तमें विश्व-विमोहन मोहन दिव्य, चिन्मय वसन- भूषण-अलंकारोंसे अलंकृत और सुसज्जित होकर अखिल-सौन्दर्य-माधुर्यसाम्बुधि, रसराज-मणि, आनन्द- कन्द व्रजेन्द्रनन्दनके रूपमें अवतरित हुए और सुलझानेके लिये आगे बढ़े। बाबाजीने कहा—'उधर ही रहो, मुझे छूना मत।' श्यामसुन्दरने कहा—'आखिर क्या बात है, मैंने ही तो उलझाया है।' बाबाजीने कहा— 'बात यह है कि श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें पाँच प्रकारके कृष्ण माने जाते हैं, किंतु मैं तो नित्यनिकुंजेश्वरी राधाके वल्लभको ही चाहता हूँ। यदि श्रीराधाजी आकर कहें तो मैं आपको छूने दूँ।' राधाजी भी आयीं और कहने लगीं कि 'हाँ, ये ही नित्यनिकुंजेश्वर, यदुकुलनलिनदिनेश हमारे श्यामसुन्दर हैं।' तब बाबाजीने उन्हें छूने दिया। यह है भक्तोंका संकल्प! इसी प्रकार एक बार श्रीसूरदास कुएँमें गिर पड़े और यह संकल्प कर लिया कि भगवान् ही निकालेंगे तो निकलूँगा, अन्यथा नहीं। भगवान् आये और अपनी विशाल भुजाओंद्वारा सूरदासजीको बाहर निकालकर जाने लगे। श्रीसूरदासजीने अपने हाथोंसे भगवान्के मंगलमय श्रीहस्तारविन्दको पकड़ लिया, किंतु जिसकी शक्तिसे शक्तियाँ भी शक्तिशालीनी होती हैं, उसे क्या कोई पकड़ सकता है अथवा कुछ कर सकता है? अस्तु, भगवान्ने यों ही हाथोंको छुड़ा लिया और जाने लगे। तब सूरदासजीने कहा— हाथ छुड़ाये जात हौ निबल जानिके मोहि। हृदयसे जब जाहुगे मर्द कहौंगे तोहि॥ अन्ततोगत्वा भगवान्को पराजित होना पड़ा। भक्तके हृदयसे आखिर भगवान् जा ही कैसे सकते हैं? जैसे द्रवीभूत लाखमें हरिद्रा आदिका रंग मिलाया जाय तो करोड़ों प्रयत्न करनेपर भी लाख हरिद्रारंगको दूर नहीं कर सकती एवं रंग भी करोड़ों उपायोंद्वारा लाखसे वियुक्त नहीं हो सकता, वैसे ही भक्त या भगवान् चाहनेपर भी परस्पर वियुक्त नहीं हो सकते। अस्तु, सारांश यही है कि भक्त सत्संकल्पोंद्वारा जो चाहे वह प्राप्त कर सकता है। यदि सच्चे अन्तःकरणसे उसका सत्संकल्प हो तो क्षणमात्रमें वह अचिन्त्य, अनन्तगुणगणनिलयपटीयान् भगवान्को पाकर कृतकृत्य हो सकता है। अस्तु, श्रीविभीषणजी अपने मनमें अनेकानेक संकल्पोंको करते और यह सोचते हुए कि आज मैं सबको सुख देनेवाले श्रीराघवेन्द्रजीके कोमल लाल पादारविन्दोंको देखूँगा, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके पास जा रहा हूँ— 'देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥' (रा०च०मा० ५।४२।५) श्रीविभीषणजी मनोरथ कर रहे हैं कि अब जाकर अचिन्त्य, अद्भुत, महामहिमवैभवशाली श्रीराघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके मनोहर, मंगलमय उन श्रीचरणारविन्दका दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले, योग-क्षेम वहन करनेवाले हैं। अप्राप्तकी प्राप्ति एवं प्राप्त वस्तुका रक्षण करना ही इन श्रीचरणोंकी विशेषता है। भावुकोंका सिद्धान्त है कि वैसे तो भगवत्स्वरूप ही फल है; क्योंकि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सबका पर्यवसान आनन्दमें है। संसारका जितना सुख है, वह एक बिन्दु है और अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत उस बिन्दुका जो उद्गमस्थान है, वह परमानन्दसिन्धु भगवान् ही हैं। इसीलिये एक जगह ब्रह्माने भगवान्से कहा—'विभो! आप इन प्रेमी भक्तोंको क्या देकर उऋण होंगे, जिनके एकमात्र सर्वस्व आप ही हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व आपके श्रीचरणोंमें अर्पण कर दिया है?' भगवान्ने कहा—'ब्रह्मन्! जब मैं अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक हूँ, 'कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुम् समर्थ' हूँ, तब फिर ये प्रेमी भक्त जो लेंगे, वही देकर उऋण हो जाऊँगा। दिव्यातिदिव्य सौख्यसाधन, उच्च-से-उच्चकोटिका ऐश्वर्यादि देकर इनसे उऋण हो सकता हूँ।' ब्रह्माने कहा—'भगवन्! संसारमें जितना सुख है, उन सबका पर्यवसान आनन्दबिन्दुमें है तो क्या आप इन प्रेमियोंको आनन्दबिन्दु देकर ही ऋणसे छुटकारा पाना चाहते हैं? यह हो नहीं सकता। भला जिनके मणिमय प्रांगणमें धूलिधूसरित
होकर परमानन्दसिन्धु ही मूर्तिमान् होकर 'थेई-थेई' करता हुआ नाच रहा है, उनको आनन्दबिन्दु की अपेक्षा ही क्या ? भगवन् ! विविध सुखसामग्री, ऐन्द्र- माहेन्द्र एवं ब्राह्मपदके समस्त वैभवोंको देकर भी इनसे उऋण नहीं हो सकते। आपको तो इनका चिरऋणी ही रहना पड़ेगा।' भगवान्ने कहा- 'अच्छा ब्रह्मन् ! मैं इन प्रेमी भक्तोंको अचिन्त्य, अनन्तपरमानन्दसिन्धुसारसर्वस्व अपने-आपको ही दे डालूँगा, तब तो इनसे मुक्त होऊँगा?' ब्रह्माने फिर कहा-'भगवन् ! अपने-आपको तो आपने लोकबालघ्नी, रुधिराशना राक्षसी पूतनाको भी दे डाला, दुर्वृत्त राक्षसेश्वर रावण-जैसे अत्याचारियोंको भी दे दिया। जो महद् वस्तु उन विरोधियोंको दी गयी, वही इन अनन्य, अन्तरंग प्रेमी भक्तोंको दी जाय, यह न्याय नहीं। इसलिये अपने-आपको देकर भी आप इनसे उऋण नहीं हो सकते।' भगवान्ने कहा-'अच्छा, इनके कुटुम्बभरको अपनेको दे डालूँगा।' फिर ब्रह्माने कहा-'हे देव ! पूतनाका क्या कोई बचा था? अघासुर, बकासुर सब तो आपको पा गये। रावण भी तो सकुदुम्ब आपको पा गया।' अन्तमें भगवान्को कहना पड़ा-'अच्छा ब्रह्मन् ! मैं इनका ऋणी ही रहूँगा।' सारांश यह कि भगवान्का मधुर, मनोहर, मंगलमय स्वरूप स्वतः फलस्वरूप है। भगवान्के श्रीपादारविन्द-नखमणिचन्द्रिकाकी दिव्य द्युतिका ध्यान करना ही परम फलस्वरूप है। कुछ लोग भगवान्के श्रीचरणारविन्दको साधन मानते हैं, पर उच्चकोटिके भक्तगण प्रभुके सौगन्ध्यामृतसिन्धु श्रीचरणारविन्दमें अनन्य भक्तिको ही परप्रेमरूपा, स्वतःसिद्धा, भगवान्की परमान्तरंगा शक्तिरूपा मानते हैं—'साधन सिद्धि राम पग नेहू।' (रा०च०मा २।२८९।८) भक्ति साधन और साध्यरूपसे दो प्रकारकी होती है। जैसे-अपक्व आम्र पक्व आम्रका हेतु होता है, वैसे ही साधनरूपा भक्तिका साध्यरूपा भक्तिके साथ साध्यसाधनभाव होता है। सर्वाभिलाषवर्जित, ज्ञान और कर्मोंसे असंस्पृष्ट, अनुकूलतापूर्वक श्रीकृष्णका अनुस्मरण ही 'भक्ति' है— अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ इन सिद्धान्तोंमें भक्ति ही सब कुछ है, उसके लिये ही समस्त साधन हैं, ज्ञान और मोक्ष आदि उसमें विघ्न हैं। भक्तजन भुक्ति, मुक्ति और विरक्ति सबको तिलांजलि देकर भक्तिको ही चाहते हैं। इसीलिये बड़े-बड़े अमलात्मा परमहंस, महामुनीन्द्रगण भी अद्वैत, अनन्त, अखण्ड ब्रह्मसे मन हटाकर सगुण, साकार भगवान्में मन लगाते हैं। प्रभुके श्रीचरणारविन्द- सौगन्ध्यामृतसिन्धुके एक बिन्दुके भी समास्वादन करनेसे सनकादिक, शुकादिक-जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं। अरविन्दनयन भगवान्के श्रीचरणारविन्दमकरन्दमिश्रित तुलसीके मकरन्दरेणु जिस समय स्वविवर (नासिका) -द्वारा सनकादिकोंके हृदयान्तर्गत हुए, बस उसी समय उन अक्षरब्रह्मनिष्ठ सनकादिकोंके शरीर और मनमें भी क्षोभ हो गया अर्थात् शरीरमें पुलकावली, नयनोंमें अश्रु और मनमें द्रवता उत्पन्न हो उठी— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) श्रीशुकाचार्य, जिनका चित्त स्वरूपभूत परमानन्द- सुधासिन्धुसे ही परिपूर्ण हो गया था, स्वसुखनिभृतचेता होनेसे ही अन्यपदार्थविषयक अस्तित्वबुद्धि जिनकी मिट गयी थी, जो केवल सर्वत्र एक परमतत्त्वका दर्शन करते थे, भगवान्की लीलारुचिरसे उनका भी धैर्य च्युत हो गया— स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽ- प्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८)
(‘स्वसुखेनैव निभृतं परिपूर्णं चेतो यस्य स तथोक्तः। तेनैव निरस्तः अन्यस्मिन् पदार्थे भावो भावना अस्तित्वबुद्धिर्यस्य स तथोक्तः’) उन्होंने स्वयं कहा है कि मेरा मन निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित था, फिर भी उत्तमश्लोक भगवान्की लीलाने मेरे चित्तको खींच लिया। श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्तमति होकर मैंने श्रीमद्भागवतरूप महाख्यानका अध्ययन किया है— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९; १।७।११) लखी जिन लालकी मुसकान। तिनहिं बिसरी वेदविधि सब योग संयम ज्ञान ॥ × × × आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, तत्त्वनिष्ठोंकी ये अनुभूतियाँ हैं कि भगवान्की सौन्दर्यछटा, आकर्षक माधुरी एवं रूपराशिको देखते ही उनका ज्ञान मानो मूर्च्छित हो गया, देहकी सुधि जाती रही, रोमांच हो आया, वाणी गद्गद हो गयी और आनन्दाश्रुसे आँखें डबडबा आयीं— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा। सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५; १।२१६।३) भगवान्के अवतरणका हेतु—अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान ठीक ही है, तभी तो यह कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंके लिये ही भक्तियोगका विधान करनेके लिये अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य- सुधाजलनिधि दिव्य मूर्ति धारण करते हैं। अन्यथा असुरनाश-जैसे छोटे कार्योंके लिये प्रभुका अवतार वैसे ही अनुचित होगा, जैसे मशकनिवारणार्थ भुशुण्डीका प्रयोग (मच्छर मारनेके लिये तोप चलाना)। परंतु समस्त नाम-रूप-क्रियात्मक प्रपंचसे व्यावृत्तमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्यस्वरूपधारण परमावश्यक है। अद्वैतब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना—यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्यसिद्धान्तके अनुसार प्रकृति-प्राकृत प्रपंचसे पृथक्, असंग, अनन्त चेतनतत्त्वका विवेचन कर लेनेवाले ‘हंस’ कहे जा सकते हैं। परंतु वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार तो दृग्दृश्य, आत्मा-अनात्मा, परात्पर पूर्णतम, सर्वभासक भगवान् और प्रकृति-प्राकृत प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे दिव्य मणिमाला और उसमें कल्पित सर्पका अर्थात् सत्य एवं अनृतका आध्यात्मिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्का आध्यात्मिक सम्बन्ध है। अतः सत्यानृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, वैसे ही दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृतस्वरूप दृश्यका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान् ही अवशिष्ट रहते हैं। इस तरह वेदान्त-सिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप नीर-क्षीरका विवेचन है और नीरस्थानीय दृश्यको मिटाकर परमसत्य भगवान्में ही स्थित होनेवाले ‘परमहंस’ कहे जा सकते हैं। परंतु बिना भगवान्के मधुर, मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता— ‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।’, ‘सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।’ (रा०च०मा० २।२७७।५) अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना— बस, यही मुख्य प्रयोजन प्रभुके मधुर, मंगलमय स्वरूप धारण करनेका है। भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्के और कौन हो सकता है? रहा भगवान्का अचिन्त्य, अनन्त,
६२८ भक्तिसुधा अव्यपदेश्य, निराकार स्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं। महावाक्यजन्य परब्रह्माकारा वृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन, बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम-रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपनी हिंसा किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूः।' महर्षि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने स्नेहभरी दृष्टिसे श्रीरामचन्द्रको नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा—धिक्कार करती है— यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति॥ जैसे कमलनयन पुरुषके अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, यदि प्रभुके रूपदर्शनमें उनका उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्धभोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि व्यर्थ और नीरस ही रहे, यदि उन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ। इसीलिये श्रीब्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवालोंके नेत्रादि करणग्रामोंकी सार्थकता और इनका चरम फल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्षपातसे युक्त, वेणुचुम्बित, अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका निर्निमेष नयनोंसे पान किया जाय और घ्राणसे सौगन्ध्यामृतका, त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ है—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्य रससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये भगवान्का प्रादुर्भाव होता है। चतुर्विधा भजन्ते ज्ञानी भक्त भगवद्भक्त चार प्रकारके होते हैं। एक तो आप्तकाम, आत्माराम, परमनिष्काम, तत्त्वविद्, ब्रह्मनिष्ठ, परमात्मरहस्यज्ञ ज्ञानी, जिसको ऐन्द्र तथा ब्राह्मपद-पर्यन्तके सम्पूर्ण वैभवोंकी रंचमात्र भी चाह नहीं होती। वे योगीन्द्र, मुनीन्द्र, अमलात्मा, परमहंस बिना किसी प्रयोजनके सर्वैश्वर्यपूर्ण, मधुरतम लीलाबिहारी भगवान्के अव्यावृत्त भजनमें लगे रहते हैं। यद्यपि वे पूर्णकाम, आत्माराम, परब्रह्ममें परिनिष्ठित हैं, भजन करनेकी उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है तथापि वे ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले मुनिजन दिव्य, शुद्ध, नित्य, चिन्मय भगवत्स्वरूपके सामने आते ही क्षुब्ध हो उठते हैं और उनके मरे हुए मन भी जीवित होकर इस स्वरूपकी एक-एक वस्तुपर मुग्ध हो जाते हैं। इन्द्रियोंके विषय रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्शसे मुमुक्षु-अवस्थामें ही चित्त उपरत हो जाता है और भजन करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। कमलनयन, घनश्यामके विधुविनिन्दक वदनारविन्दपर अतिमृदुल मन्द मुसकान एवं उनके अतिमनोहर नयनयुगलके कमनीय कृपाकटाक्ष एवं इसी प्रकार प्रभुके अन्यान्य श्रीअंगोंका अवलोकनकर नामरूपात्मक दृश्य-प्रपंचसे उपरत चित्तवाले योगीन्द्र, मुनीन्द्र भी लट्टू हो जाते हैं। एक बार दिव्य वैकुण्ठलोकमें श्रीमहाविष्णुके समीप नित्य आत्मनिष्ठ सनकादि ऋषि पधारे। ज्यों ही वे भगवान्के सामने पहुँचे और उनके स्वरूपको देखा कि मुग्ध हो गये। भगवान्की सुन्दरता देखते-देखते उनके नेत्र किसी प्रकार तृप्त ही न होते थे। भगवान्के सौन्दर्यने ही उन्हें मुग्ध किया हो सो नहीं, प्रणाम करते समय कमलनयन श्रीहरिके पादपद्मपरागसे मिली हुई तुलसीमंजरीकी सुगन्ध वायुके द्वारा नासिकामार्गसे ज्यों ही मुनियोंके अन्तरमें पहुँची
चतुर्विधा भजन्ते ६२१ कि उनका मन क्षुब्ध हो गया, उस सुगन्धकी ओर खिंच गया, उसपर मोहित हो गया और आनन्दसे उनको रोमांच हो आया— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसी मकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) यही दशा श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रका स्वरूप देखकर श्रीजनकजीकी हुई थी— मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥ (रा०च०मा० १।२१५।८) किसी प्रकार अपनेको विवेक, धैर्यसे सँभाला, परंतु पूछे बिना न रहा गया। श्रीविश्वामित्रके चरणोंमें प्रणाम किया और फिर गद्गद वाणीसे पूछने लगे— कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा ॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ (रा०च०मा० १।२१६।१-५) और भी देखिये, विवाहके समय जो दशा हुई— क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं। करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं ॥ (रा०च०मा० १।३२४। छंद ४) इत्यादि। सारांश यह है कि भजन करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। वे चाहते हैं कि कुछ समय भजन न करें, किन्तु उनके रोकनेपर भी उनका मन प्रभुकी नखमणि-चन्द्रिकाका चिन्तन करने लगता है, प्रभुके त्रिभुवनपावन, मंगलमय नामका उच्चारण करने लगता है। एक गोपांगना लीलाबिहारी, त्रिभुवन-कमनीय, योगीजनदुर्लभ, देवदेवप्रत्याशित, ऋषि-महर्षि-महापुरुष- चित्ताकर्षक, निखिल सौन्दर्य-माधुर्य-रसामृतसारभूत, आनन्दकन्द, व्रजेन्द्रनन्दन, मदनमोहन कृष्णचन्द्रके विरहजन्य तीव्रतापसे तापित होकर जमीनपर बेहोश पड़ी थी और एक दूसरी सखी उसके मुखपर गुलाबजलके छींटे दे-देकर धीरे-धीरे पंखा झल रही थी। इतनेमें ही एक तीसरी सखी आयी और जनमनहारी, बाँकेबिहारी, राधारमण, बाधाहरण नन्दनन्दनकी चर्चा करने लगी। त्यों ही दूसरी बोली—'हे सखी! उनकी चर्चा इस समय न छेड़। यदि अपनी प्रियसखीको इस समय विश्राम लेने देना चाहती है तो उनकी चर्चा भूलकर भी मत चला। कोई और चर्चा चलाकर माधवको इस समय भुला दे।' कैसी विचित्र दशा है? कोई तो इस आधि- व्याधिपूर्ण, शोकतापसंकुल, जन्ममृत्यु-संकीर्ण, आर्तनादके उद्भवस्थान, मृत्युके लीलाक्षेत्र, पापविद्ध संसारका विस्मरणकर भगवद्रसका आस्वादन करना अथवा प्रभुका स्मरण करना चाहते हैं, पर ऐसा होता नहीं और ये महाभागा गोपांगनाएँ नन्दनन्दनका किसी तरह विस्मरण करना चाहती हैं, पर ऐसा होता नहीं। इसी तरह ज्ञानी भी कई तरहके होते हैं। एक तो जड़भरतके समान जंगलोंमें उन्मत्त, प्रेमविभोर होकर इधर-उधर फिरनेवाले। लोकसंग्रही भी आत्माराम, आप्तकाम होते हैं, परंतु भगवान्की प्रेरणासे धर्मसंस्थापनमें लगे रहते हैं। व्यास परमज्ञानी होते हुए भी पुराणोंके निर्माणमें, शंकराचार्य परमज्ञानी होते हुए भी बौद्धोंके खण्डनमें लगे रहते थे। लोकसंग्रहीके सामने कठिनाइयाँ भी आती हैं; क्योंकि संसार कुत्तेकी पूँछके समान है। कुत्तेकी पूँछको कितना ही घी, तेल लगाकर बाँसकी नलीमें डालकर सीधा रखो, किंतु ज्यों ही बाँसकी नलीसे निकली, त्यों ही फिर टेढ़ी-की-टेढ़ी। इसलिये ऐसे ज्ञानियोंको पदे-पदे भगवान्का सहारा लेना पड़ता है। जिज्ञासु भक्त दूसरे प्रकारके भक्त होते हैं-जिज्ञासु-पूर्णविरक्त- 'रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥' (रा०च०मा० २।३२४।८) जैसे उत्तमोत्तम पदार्थोंको खाकर वमन कर दें तो उस ओर
६३० भक्तिसुधा
देखनेतकको जी नहीं चाहता, ठीक वैसे ही इन जिज्ञासुओंको ऐन्द्र, माहेन्द्र एवं ब्राह्मपदपर्यन्तके समस्त वैभव विषवत्, वमनवत् प्रतीत होते हैं। वे वेदाध्ययन आदि करते हैं, किंतु भगवान्का भजन करते हुए। जो लोग ऐसा नहीं करते, वे उसी चीलके समान हैं, जो उड़ती तो आकाशमें है, पर दृष्टि रहती है उसकी नीचे। ये लोग भी उड़ते तो शास्त्रोंपर हैं, पर दृष्टि रहती है संसारपर, लक्ष्य रहता है क्षुद्र वैषयिक सुखोंकी प्राप्ति करना। अस्तु, जो लोग विवेक और ज्ञानके साथ भगवत्प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर ग्रन्थोंका अध्ययन नहीं करते, उनके लिये ग्रन्थ ग्रन्थिका ही काम करते हैं। ऐसे लोग भगवत्साक्षात्कार नहीं कर सकते। आर्त भक्त तीसरे प्रकारके भक्त हैं आर्त—गजेन्द्र, द्रौपदीकी तरह पीड़ित, सताये गये। अर्थार्थी भक्त चौथे भक्त हैं अर्थार्थी—विभीषणकी तरह। जिस समय विभीषण सर्वसौन्दर्याधार, अखण्डानन्द- भण्डार, परमसमुज्ज्वल, अतिसुन्दर, चिरमधुर रसमय भगवान्के पास आये, उस समय उन्होंने कहा— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥ (रा०च०मा० ५।४९।६) फिर तत्क्षण कहने लगे कि— अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी। (रा०च०मा० ५।४९।७) इनमें एक भक्त ऐसे होते हैं, जो ज्ञान भी प्राप्त करना चाहते हैं, धन भी प्राप्त करना चाहते हैं और विपत्ति-निवारण भी करना चाहते हैं। यद्यपि ज्ञान प्राप्त करने, धन प्राप्त करने और विपत्ति-निवारण करनेका साधन उनके पास है तथापि वे भगवान्का भजन नहीं छोड़ते। जो अस्त्रबल, बाहुबल, बुद्धिबलके घमण्डमें आकर भगवान्को भूल जाते हैं, उनका मनोरथ मरुभूमिकी नदियोंकी तरह बीचमें ही सूख जाता है, सिद्धिसाफल्य मिलना तो दूर रहा। इसलिये अर्जुन जिस समय कृष्णचन्द्रकी पटरानियोंको लेकर लौट रहे थे, उस समय आभीरोंने उनको बाँसके खण्डोंसे पीट-पीटकर पटरानियोंको छीन लिया। वही शक्तिमान् अर्जुन और वही गाण्डीव धनुष, किंतु एक श्रीकृष्णके बिना उनके सारे साधन बेकार हो गये। अस्तु, कोई कितना ही शक्तिसम्पन्न क्यों न हो, भगवच्चरणोंका सहारा लेते हुए ही उसे चलना चाहिये। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो चाहते तो सब कुछ हैं, पर साधन एक भी नहीं। ऐसे लोगोंको भी निराश न होना चाहिये। शास्त्रोंने उनको भी आश्वासन दे रखा है—'सुने री मैंने निरबलके बल राम।' निष्काम अनन्यभक्त नरसीकी तरह जो साधनविहीन हैं, दीन-दुनियाका जिन्हें कुछ भी भरोसा नहीं, केवल भगवान्का सहारा है, ऐसे भक्तोंको भगवान् ऐसा प्रसन्न करते हैं कि वे निहाल हो जाते हैं। ऐसे भी भक्त होते हैं, जो चाहते सब कुछ हैं, पर साधन कुछ नहीं है और साथ ही भगवान्पर विश्वास भी नहीं है। ऐसे लोगोंके लिये भी शास्त्रोंमें निराशाका शब्द नहीं। उनके लिये शास्त्र कहते हैं कि भगवान्को पुकारो—'हे अशरण-शरण, हे अनाथनाथ, हे अकारण-करुण, हे करुणावरुणालय, हे प्रभो ! मैं आपको नहीं जानता। अपनेको नहीं जानता, आपके और अपने सम्बन्धको नहीं जानता। माया ठगिनीने मुझे खूब ठगा। मैं उन्मादी बन बैठा। तरंग, कटक, मुकुट, कुण्डल, घटाकाश जैसे घमण्ड करे कि मेरे अतिरिक्त जल नामकी कोई वस्तु नहीं, स्वर्ण नामकी कोई वस्तु नहीं और महाकाश नामकी कोई वस्तु ही नहीं है। ठीक इसी प्रकार भगवन्! मैं इतना उन्मादी बन बैठा कि कहने लगा, ईश्वर नामकी कोई वस्तु नहीं। हे नाथ ! अब आप ही कृपा करें कि मैं भाव- कुभाव जिस किसी तरहसे भी आपको पुकारूँ।'
भगवच्छरणागतिसे ही गति ६३१ भगवच्छरणागतिसे ही गति 'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥' (गीता ६।४१) इत्यादि शास्त्रवचनोंमें योगभ्रष्टकी चर्चा आती है। अर्जुनने प्रश्न किया कि— अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ (गीता ६।३७-३८) अर्थात् जो ब्रह्मके मार्गमें प्रतिष्ठित नहीं हो सका, योगसिद्धि बिना प्राप्त किये ही मर गया, उसकी क्या गति होती है ? यहाँ यही अभिप्राय है कि जो लोग कर्मसंन्यास करके कर्ममार्गको छोड़ चुके और ब्रह्मसाक्षात्कार-साधन श्रवणादिमें लगे हुए हैं, वे मरकर छिन्न बादलके समान नष्ट होते हैं या किसी तरह उनकी भी सद्गति होती है ? भगवान्ने कहा— 'पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।' (गीता ६।४०) पार्थ! इस लोक-परलोक कहीं भी उसका विनाश नहीं होता, 'न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥' (गीता ६।४०) हे तात! कल्याणके लिये प्रयत्न करनेवाला कोई प्राणी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता। उनमें उच्चकोटिके अधिकारी लोग तो जन्मान्तरमें पवित्र अध्यात्मनिष्ठ योगियोंके कुलमें जन्म ग्रहण करते हैं और वहाँ पूर्वाभ्यासवशात् पुनः योगाभ्यासमें लगकर शीघ्र ही सिद्धिको प्राप्त कर लेते हैं। कोई-कोई पवित्र श्रीमानोंके यहाँ जन्म ग्रहणकर धर्मानुष्ठान तथा सत्संगादि करके पुनः उच्चगतिको प्राप्त होते हैं। सारांश यही है कि जो कर्मादिका सहारा छोड़कर योग या ज्ञानके अभ्यासमें तल्लीन हो गये और पूर्ण सिद्धि या तत्त्वसाक्षात्कारसे पहले ही मृत हो गये, वे भी नष्ट नहीं होते, किंतु वे भी अच्छी ही गतिको प्राप्त होते हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि इतना ही नहीं, किंतु 'योगभ्रष्ट' का यह भी अर्थ है कि जो योगमार्गसे भ्रष्ट हो गया अर्थात् कामादि दोषोंसे अभिभूत होकर मायिक प्रपंचोंमें फँस गया, उसीकी छिन्नाभ्रवत् नष्ट होनेकी सम्भावना हो सकती है। जो सदाचारी एवं नियतमानस होकर श्रवणादिमें लगा रहता है, वह तो एक प्रकारके बड़े दिव्य पुण्यमें ही लगा रहता है। श्रद्धापूर्वक वेदान्तश्रवणसे प्रतिदिन अशीति (८०) कृच्छ्रचान्द्रायणका पुण्य शास्त्रोंमें कहा गया है। अनेक जन्मोंके अभ्याससे ही संसिद्धि प्राप्त होती है, यही गीताका भी अभिप्राय है— 'अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥' (गीता ६।४५) अर्जुनके प्रश्नसे भी यही मालूम होता है कि यह विकर्म-निमित्त योगभ्रंशको लेकर ही प्रश्न उठा है। शास्त्रोंने यही कहा है कि जो प्राणी स्वधर्मको छोड़कर भगवान्को भजने लगा, अपक्व होनेके कारण कथंचित् यदि वह गिर जाय तो भी किसी- न-किसी तरह उसका कल्याण हो ही जाता है। परन्तु जो भगवान्का स्मरण न करके कर्मानुष्ठानमें ही लगा है, वह तो कोई भी परमार्थ-लाभ नहीं कर सकता— त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरे- र्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि। यत्र क्व वाभद्रमभूदमूष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥ (श्रीमद्भा० १।५।१७) इसी तरह यह भी कहा गया है कि सर्वत्यागी भगवत्परायण पुरुषसे यदि कोई विकर्म हो जाय तो भी भगवत्स्मृति-परम्परासे उसकी निवृत्ति हो जाती है— स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥ (श्रीमद्भा० ११।५।४२)