भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरसादि गुण होते हैं, वे सभी उसके विकार फेन, बुद्बुद, तरंगमें भी होते हैं। अग्निके विस्फुलिंगोंमें अग्निगत दाहकत्व, प्रकाशकत्व सभी गुण होते हैं। इसलिये सर्वावभासक, अखण्ड, अनन्त, अपरिच्छिन्न, आनन्दसिन्धु, परमानन्दकन्द भगवान् जीवके और जीव उनके हैं। भगवान् परमकारुणिक हैं। वे चाहते हैं कि जीव किसी प्रकारसे निरावरण निजानुभव करके जन्म-मरण-विच्छेद-लक्षण संसृतिसे विनिर्मुक्त हो जाय। तभी तो सृष्टिका निर्माण करते हैं। यद्यपि महाप्रलयकालमें सब जीव भगवान्के सम्मिलनसे सुखी थे, परंतु फिर भी परमप्रियतम प्राणधन भगवान्ने उनको सृष्टिकालमें जगाया। जिस प्रकार पुत्रवत्सला माता स्वाङ्कमें प्रसुप्त स्वपुत्रको किसी उत्तम फलके मिलनेपर उसे खिलानेको जगाती है, उसी प्रकार भगवान्के सभी पुत्र उनकी गोदमें सोते थे, भगवान्ने उन्हें उत्तम फल देनेके लिये जगाया—‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति।’ महाप्रलयमें सावरण भगवान्का अनुभव रहता है। भगवान्ने सृष्टि, स्थिति, प्रलय आदि परम्परासे सन्तप्त जीवोंको देखकर उन्हें निरावरण निजानुभव करानेके लिये सृष्टिका निर्माण किया। कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा कभी भी अपने पुत्रका अकल्याण नहीं चाहती, पुत्रजन्मके लिये तरह-तरहके देवी-देवताओंको मनाती है, पुत्रके गर्भमें आते ही हर्षके मारे फूली नहीं समाती, गर्भस्थ बालकके हस्त-पादादि-उत्क्षेपणसे कष्ट होनेपर भी उसे अपराध नहीं मानती, प्रत्युत ‘अब पुत्र बड़ा हो गया’ यह समझकर प्रसन्न होती है, पुत्रकी उत्पत्तिमें प्राणान्त कष्ट सहनकर भी आनन्दमें विभोर रहती है, स्वयं गीलेमें रहकर बालकको सूखेमें रखती है, मल-मूत्रादि अपने ऊपर लेती है। माँका हृदय कितना उदार होता है! वह पुत्रके लिये क्या-क्या नहीं करती? ठीक इसी प्रकार अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी, कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा अपने पुत्रों—जीवोंका अकल्याण कभी भी नहीं चाहती, अपितु उनका सर्वविध कल्याण ही चाहती है। इसीलिये तो भगवान् शंकराचार्यने कहा है कि पुत्र कुपुत्र हो जाय, पर माता कुमाता नहीं होती—‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥’ वह सदैव अपने पुत्रके उत्कर्षके लिये लालायित रहती है। तभी तो ब्रह्माजीने कहा है कि हे प्रभो! क्या गर्भगत बालकोंके पादप्रक्षेपको माता अपराध मानती है? नहीं, क्योंकि यह तो अबोध बालककी बात है— उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) यदि माता यह समझे कि इसने मेरे पेटमें रहकर मुझे कितना कष्ट दिया है और इसका बदला लेनेपर तुल जाय, तब तो उदरसे बाहर होते ही उस नवजात शिशुका गला घोंटकर वह उसके प्राण निकाल दे, किंतु माता उसके पादप्रक्षेपको अपराध नहीं मानती। अपराधी बालकोंपर भी माताएँ क्रोध नहीं करतीं, यदि करती हैं तो उनके कल्याणार्थ ही। जैसे दर्पणके भीतर पृथ्वी, सूर्य, नक्षत्रमण्डल, सागर, पर्वत सभी दीखते हैं, वैसे ही उस अखण्डबोधरूप सत्-तत्त्वके अन्तर्गत सभी पदार्थोंकी स्फूर्ति होती है, उसीसे सभी दीखते हैं। उस भगवान्की ही कुक्षिमें भावाभावात्मक सकल प्रपंच है। अतएव भगवान् स्व- कुक्षिगत पुत्रस्थानीय सकल प्राणियोंपर क्रोध नहीं करते— नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा॥ (रा०च०मा० ४।३।२) हम भगवान्, शास्त्र और धर्मसे क्यों शत्रुता करते हैं? इसलिये न कि हम स्वयं अपने वशमें नहीं हैं। मोहमयी प्रमादमदिराके पानसे जगत् प्रमत्त हो रहा है—‘पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्।’ उसीसे पतनके कारणमें प्रेम और अभ्युदयके कारणमें द्वेष होता है। इसीलिये वैदिक मन्त्रोंद्वारा भगवान्से