भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रार्थना की जाती है कि हे दयालो! हे करुणामय! आप मुझे न भूलना तथा मैं भी आपको न भूलूँ— 'माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्।' हाँ, ठीक भी है; क्योंकि जीव स्ववश नहीं है, मायाके वशमें है। अतएव भगवान्को न भूलना उसके वशमें नहीं है—'नाथ जीव तव मायाँ मोहा।', 'तव माया बस फिरउँ भुलाना।' यद्यपि हम अल्पज्ञ जीव अपने प्रियतम प्रभुको भूलकर उनकी आज्ञाका उल्लंघन करते हैं तथापि हे प्रभो! आप ऐसा नहीं कर सकते; क्योंकि आप तो सर्वज्ञ हैं— मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं। (रा०च०मा० ४।२।८) आप मुझे कैसे भूलते हैं? क्यों उपेक्षा करते हैं? आप मेरे ऊपर ऐसी अनुकम्पा कीजिये कि मैं भी आपको न भूलूँ। यद्यपि हम मोहवश आपको भूलते हैं तथापि पिता-माता पुत्रोंको नहीं भूलते, न उनका नाश ही चाहते हैं तो फिर प्रभो! आप अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान् होकर अपने पुत्रोंका नाश कैसे चाहोगे ? अस्तु, कहनेका अभिप्राय यह है कि किसीको भी निराश होनेकी आवश्यकता नहीं, आवश्यकता है श्रद्धा-विश्वासपूर्वक संकल्पकी। श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक भक्तलोग जिस तरह चाहते हैं, भगवान्को नचाते हैं। हठीले, रसीले भक्तोंके सामने भगवान्को घुटने टेकने ही पड़ते हैं। मचले हुए दर्शनाकांक्षी भक्त किसी भी बातसे सन्तुष्ट नहीं होते, मातृपरायण शिशुको बहुमूल्य रत्न दीजिये, सुन्दर, स्वादिष्ट पक्वान्न खानेको दीजिये, वसन-भूषण- अलंकारसे उसे खूब अलंकृत एवं सुसज्जित कीजिये, उसका खूब सम्मान कीजिये, यश गाइये, उसे विविध सुखसामग्रियों एवं स्वर्ग-मोक्षका प्रलोभन दीजिये, फिर भी वह स्नेहमयी, करुणामयी अम्बा और मातृस्तनोंको छोड़कर और कुछ भी नहीं चाहता, अम्बाकी अपेक्षा वह किसी भी पदार्थसे सन्तुष्ट हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार प्रेमी भक्तोंकी कामना केवल प्रभुको पानेके लिये ही होती है। एकमात्र प्रभु ही उसके काम्य होते हैं। बच्चा कुछ बड़ा हुआ, इधर-उधर कुछ चलने लगा, चलते-चलते ठोकर खाकर गिर पड़ा, रोने लगा। बच्चेका रोना सुनकर माँ दौड़ी आयी। बच्चा खीझ गया, गिर पड़ा स्वयं, परंतु क्रोध उसका मातापर हुआ। वह अपनी तोतली बोलीमें बार-बार कहता है—'तू मुझे अकेला छोड़कर क्यों गयी?' फिर अभिमान करके रूठ जाता है। कहता है—'जा, मैं तुझसे नहीं बोलूँगा, तेरी गोदमें नहीं आऊँगा।' माँ मनाती है, गोद लेना चाहती है, स्तन पिलाना चाहती है, वह रोता हुआ आगे भागता है। वह ऐसा क्यों करता है? इसलिये कि वह स्वाभाविक ही मातापर अपना अधिकार समझता है। माताको ही अपना 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी' एवं सर्वस्व समझता है, वह भूखा रहे तो माँका दोष, वह गिर जाय तो माँका अपराध, वह सो न सके तो माताका अपराध और अपराधका दण्ड खीझना तथा रूठना—क्रोध तथा अभिमान! किंतु ऐसी भावना कि 'भगवान् मेरे हैं, मेरा उनपर पूर्णाधिकार है' बड़े उच्चकोटिके भक्तोंमें होती है। ऐसे भक्तोंके पीछे परमानन्दरससार-सिन्धु-सर्वस्व, करुणामय, सर्व- सामर्थ्य, सर्वपद प्रभु बछड़ेके पीछे स्नेहवश दौड़नेवाली गौकी भाँति दौड़ते हैं। भक्त जो इच्छा करता है, उसकी पूर्ति करते हैं। भगवान्की भक्तपरवशताका एक दृष्टान्त श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें एक महात्मा रहते थे, वे एक दिन अरण्यमें घूमने गये। उनकी लम्बी जटा झाड़ीमें उलझ गयी, बस फिर क्या था, वे महात्मा भी अकड़ गये और कहने लगे कि 'जिसने उलझाया, वही सुलझाये।' अन्ततोगत्वा रसिकेन्द्रशेखर, भक्तभावनापराधीन प्रभु पथिकरूपमें प्रकट हुए और कहने लगे—'बाबा जी! आपकी उलझी हुई जटाओंको छुड़ा दूँ?' बाबाजीने कहा—'ना भैया! जिसने उलझाया, वही सुलझायेगा।' भगवान्ने कहा—'मैंने ही तो उलझाया है।' बाबाजीने कहा—'नहीं, मेरी जटाओंको तो अखिलरसामृतसिन्धु, व्रजेन्द्रनन्दन, मदनमोहन