भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्यामसुन्दरने उलझाया है और वे ही सुलझायेंगे।' अन्तमें विश्व-विमोहन मोहन दिव्य, चिन्मय वसन- भूषण-अलंकारोंसे अलंकृत और सुसज्जित होकर अखिल-सौन्दर्य-माधुर्यसाम्बुधि, रसराज-मणि, आनन्द- कन्द व्रजेन्द्रनन्दनके रूपमें अवतरित हुए और सुलझानेके लिये आगे बढ़े। बाबाजीने कहा—'उधर ही रहो, मुझे छूना मत।' श्यामसुन्दरने कहा—'आखिर क्या बात है, मैंने ही तो उलझाया है।' बाबाजीने कहा— 'बात यह है कि श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें पाँच प्रकारके कृष्ण माने जाते हैं, किंतु मैं तो नित्यनिकुंजेश्वरी राधाके वल्लभको ही चाहता हूँ। यदि श्रीराधाजी आकर कहें तो मैं आपको छूने दूँ।' राधाजी भी आयीं और कहने लगीं कि 'हाँ, ये ही नित्यनिकुंजेश्वर, यदुकुलनलिनदिनेश हमारे श्यामसुन्दर हैं।' तब बाबाजीने उन्हें छूने दिया। यह है भक्तोंका संकल्प! इसी प्रकार एक बार श्रीसूरदास कुएँमें गिर पड़े और यह संकल्प कर लिया कि भगवान् ही निकालेंगे तो निकलूँगा, अन्यथा नहीं। भगवान् आये और अपनी विशाल भुजाओंद्वारा सूरदासजीको बाहर निकालकर जाने लगे। श्रीसूरदासजीने अपने हाथोंसे भगवान्के मंगलमय श्रीहस्तारविन्दको पकड़ लिया, किंतु जिसकी शक्तिसे शक्तियाँ भी शक्तिशालीनी होती हैं, उसे क्या कोई पकड़ सकता है अथवा कुछ कर सकता है? अस्तु, भगवान्ने यों ही हाथोंको छुड़ा लिया और जाने लगे। तब सूरदासजीने कहा— हाथ छुड़ाये जात हौ निबल जानिके मोहि। हृदयसे जब जाहुगे मर्द कहौंगे तोहि॥ अन्ततोगत्वा भगवान्को पराजित होना पड़ा। भक्तके हृदयसे आखिर भगवान् जा ही कैसे सकते हैं? जैसे द्रवीभूत लाखमें हरिद्रा आदिका रंग मिलाया जाय तो करोड़ों प्रयत्न करनेपर भी लाख हरिद्रारंगको दूर नहीं कर सकती एवं रंग भी करोड़ों उपायोंद्वारा लाखसे वियुक्त नहीं हो सकता, वैसे ही भक्त या भगवान् चाहनेपर भी परस्पर वियुक्त नहीं हो सकते। अस्तु, सारांश यही है कि भक्त सत्संकल्पोंद्वारा जो चाहे वह प्राप्त कर सकता है। यदि सच्चे अन्तःकरणसे उसका सत्संकल्प हो तो क्षणमात्रमें वह अचिन्त्य, अनन्तगुणगणनिलयपटीयान् भगवान्को पाकर कृतकृत्य हो सकता है। अस्तु, श्रीविभीषणजी अपने मनमें अनेकानेक संकल्पोंको करते और यह सोचते हुए कि आज मैं सबको सुख देनेवाले श्रीराघवेन्द्रजीके कोमल लाल पादारविन्दोंको देखूँगा, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके पास जा रहा हूँ— 'देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥' (रा०च०मा० ५।४२।५) श्रीविभीषणजी मनोरथ कर रहे हैं कि अब जाकर अचिन्त्य, अद्भुत, महामहिमवैभवशाली श्रीराघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके मनोहर, मंगलमय उन श्रीचरणारविन्दका दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले, योग-क्षेम वहन करनेवाले हैं। अप्राप्तकी प्राप्ति एवं प्राप्त वस्तुका रक्षण करना ही इन श्रीचरणोंकी विशेषता है। भावुकोंका सिद्धान्त है कि वैसे तो भगवत्स्वरूप ही फल है; क्योंकि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सबका पर्यवसान आनन्दमें है। संसारका जितना सुख है, वह एक बिन्दु है और अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत उस बिन्दुका जो उद्गमस्थान है, वह परमानन्दसिन्धु भगवान् ही हैं। इसीलिये एक जगह ब्रह्माने भगवान्से कहा—'विभो! आप इन प्रेमी भक्तोंको क्या देकर उऋण होंगे, जिनके एकमात्र सर्वस्व आप ही हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व आपके श्रीचरणोंमें अर्पण कर दिया है?' भगवान्ने कहा—'ब्रह्मन्! जब मैं अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक हूँ, 'कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुम् समर्थ' हूँ, तब फिर ये प्रेमी भक्त जो लेंगे, वही देकर उऋण हो जाऊँगा। दिव्यातिदिव्य सौख्यसाधन, उच्च-से-उच्चकोटिका ऐश्वर्यादि देकर इनसे उऋण हो सकता हूँ।' ब्रह्माने कहा—'भगवन्! संसारमें जितना सुख है, उन सबका पर्यवसान आनन्दबिन्दुमें है तो क्या आप इन प्रेमियोंको आनन्दबिन्दु देकर ही ऋणसे छुटकारा पाना चाहते हैं? यह हो नहीं सकता। भला जिनके मणिमय प्रांगणमें धूलिधूसरित