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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

श्यामसुन्दरने उलझाया है और वे ही सुलझायेंगे।' अन्तमें विश्व-विमोहन मोहन दिव्य, चिन्मय वसन- भूषण-अलंकारोंसे अलंकृत और सुसज्जित होकर अखिल-सौन्दर्य-माधुर्यसाम्बुधि, रसराज-मणि, आनन्द- कन्द व्रजेन्द्रनन्दनके रूपमें अवतरित हुए और सुलझानेके लिये आगे बढ़े। बाबाजीने कहा—'उधर ही रहो, मुझे छूना मत।' श्यामसुन्दरने कहा—'आखिर क्या बात है, मैंने ही तो उलझाया है।' बाबाजीने कहा— 'बात यह है कि श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें पाँच प्रकारके कृष्ण माने जाते हैं, किंतु मैं तो नित्यनिकुंजेश्वरी राधाके वल्लभको ही चाहता हूँ। यदि श्रीराधाजी आकर कहें तो मैं आपको छूने दूँ।' राधाजी भी आयीं और कहने लगीं कि 'हाँ, ये ही नित्यनिकुंजेश्वर, यदुकुलनलिनदिनेश हमारे श्यामसुन्दर हैं।' तब बाबाजीने उन्हें छूने दिया। यह है भक्तोंका संकल्प! इसी प्रकार एक बार श्रीसूरदास कुएँमें गिर पड़े और यह संकल्प कर लिया कि भगवान् ही निकालेंगे तो निकलूँगा, अन्यथा नहीं। भगवान् आये और अपनी विशाल भुजाओंद्वारा सूरदासजीको बाहर निकालकर जाने लगे। श्रीसूरदासजीने अपने हाथोंसे भगवान्के मंगलमय श्रीहस्तारविन्दको पकड़ लिया, किंतु जिसकी शक्तिसे शक्तियाँ भी शक्तिशालीनी होती हैं, उसे क्या कोई पकड़ सकता है अथवा कुछ कर सकता है? अस्तु, भगवान्ने यों ही हाथोंको छुड़ा लिया और जाने लगे। तब सूरदासजीने कहा— हाथ छुड़ाये जात हौ निबल जानिके मोहि। हृदयसे जब जाहुगे मर्द कहौंगे तोहि॥ अन्ततोगत्वा भगवान्‌को पराजित होना पड़ा। भक्तके हृदयसे आखिर भगवान् जा ही कैसे सकते हैं? जैसे द्रवीभूत लाखमें हरिद्रा आदिका रंग मिलाया जाय तो करोड़ों प्रयत्न करनेपर भी लाख हरिद्रारंगको दूर नहीं कर सकती एवं रंग भी करोड़ों उपायोंद्वारा लाखसे वियुक्त नहीं हो सकता, वैसे ही भक्त या भगवान् चाहनेपर भी परस्पर वियुक्त नहीं हो सकते। अस्तु, सारांश यही है कि भक्त सत्संकल्पोंद्वारा जो चाहे वह प्राप्त कर सकता है। यदि सच्चे अन्तःकरणसे उसका सत्संकल्प हो तो क्षणमात्रमें वह अचिन्त्य, अनन्तगुणगणनिलयपटीयान् भगवान्‌को पाकर कृतकृत्य हो सकता है। अस्तु, श्रीविभीषणजी अपने मनमें अनेकानेक संकल्पोंको करते और यह सोचते हुए कि आज मैं सबको सुख देनेवाले श्रीराघवेन्द्रजीके कोमल लाल पादारविन्दोंको देखूँगा, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके पास जा रहा हूँ— 'देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥' (रा०च०मा० ५।४२।५) श्रीविभीषणजी मनोरथ कर रहे हैं कि अब जाकर अचिन्त्य, अद्भुत, महामहिमवैभवशाली श्रीराघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके मनोहर, मंगलमय उन श्रीचरणारविन्दका दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले, योग-क्षेम वहन करनेवाले हैं। अप्राप्तकी प्राप्ति एवं प्राप्त वस्तुका रक्षण करना ही इन श्रीचरणोंकी विशेषता है। भावुकोंका सिद्धान्त है कि वैसे तो भगवत्स्वरूप ही फल है; क्योंकि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सबका पर्यवसान आनन्दमें है। संसारका जितना सुख है, वह एक बिन्दु है और अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत उस बिन्दुका जो उद्गमस्थान है, वह परमानन्दसिन्धु भगवान् ही हैं। इसीलिये एक जगह ब्रह्माने भगवान्‌से कहा—'विभो! आप इन प्रेमी भक्तोंको क्या देकर उऋण होंगे, जिनके एकमात्र सर्वस्व आप ही हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व आपके श्रीचरणोंमें अर्पण कर दिया है?' भगवान्ने कहा—'ब्रह्मन्! जब मैं अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक हूँ, 'कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुम् समर्थ' हूँ, तब फिर ये प्रेमी भक्त जो लेंगे, वही देकर उऋण हो जाऊँगा। दिव्यातिदिव्य सौख्यसाधन, उच्च-से-उच्चकोटिका ऐश्वर्यादि देकर इनसे उऋण हो सकता हूँ।' ब्रह्माने कहा—'भगवन्! संसारमें जितना सुख है, उन सबका पर्यवसान आनन्दबिन्दुमें है तो क्या आप इन प्रेमियोंको आनन्दबिन्दु देकर ही ऋणसे छुटकारा पाना चाहते हैं? यह हो नहीं सकता। भला जिनके मणिमय प्रांगणमें धूलिधूसरित

होकर परमानन्दसिन्धु ही मूर्तिमान् होकर 'थेई-थेई' करता हुआ नाच रहा है, उनको आनन्दबिन्दु की अपेक्षा ही क्या ? भगवन् ! विविध सुखसामग्री, ऐन्द्र- माहेन्द्र एवं ब्राह्मपदके समस्त वैभवोंको देकर भी इनसे उऋण नहीं हो सकते। आपको तो इनका चिरऋणी ही रहना पड़ेगा।' भगवान्‌ने कहा- 'अच्छा ब्रह्मन् ! मैं इन प्रेमी भक्तोंको अचिन्त्य, अनन्तपरमानन्दसिन्धुसारसर्वस्व अपने-आपको ही दे डालूँगा, तब तो इनसे मुक्त होऊँगा?' ब्रह्माने फिर कहा-'भगवन् ! अपने-आपको तो आपने लोकबालघ्नी, रुधिराशना राक्षसी पूतनाको भी दे डाला, दुर्वृत्त राक्षसेश्वर रावण-जैसे अत्याचारियोंको भी दे दिया। जो महद् वस्तु उन विरोधियोंको दी गयी, वही इन अनन्य, अन्तरंग प्रेमी भक्तोंको दी जाय, यह न्याय नहीं। इसलिये अपने-आपको देकर भी आप इनसे उऋण नहीं हो सकते।' भगवान्‌ने कहा-'अच्छा, इनके कुटुम्बभरको अपनेको दे डालूँगा।' फिर ब्रह्माने कहा-'हे देव ! पूतनाका क्या कोई बचा था? अघासुर, बकासुर सब तो आपको पा गये। रावण भी तो सकुदुम्ब आपको पा गया।' अन्तमें भगवान्‌को कहना पड़ा-'अच्छा ब्रह्मन् ! मैं इनका ऋणी ही रहूँगा।' सारांश यह कि भगवान्‌का मधुर, मनोहर, मंगलमय स्वरूप स्वतः फलस्वरूप है। भगवान्‌के श्रीपादारविन्द-नखमणिचन्द्रिकाकी दिव्य द्युतिका ध्यान करना ही परम फलस्वरूप है। कुछ लोग भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दको साधन मानते हैं, पर उच्चकोटिके भक्तगण प्रभुके सौगन्ध्यामृतसिन्धु श्रीचरणारविन्दमें अनन्य भक्तिको ही परप्रेमरूपा, स्वतःसिद्धा, भगवान्‌की परमान्तरंगा शक्तिरूपा मानते हैं—'साधन सिद्धि राम पग नेहू।' (रा०च०मा २।२८९।८) भक्ति साधन और साध्यरूपसे दो प्रकारकी होती है। जैसे-अपक्व आम्र पक्व आम्रका हेतु होता है, वैसे ही साधनरूपा भक्तिका साध्यरूपा भक्तिके साथ साध्यसाधनभाव होता है। सर्वाभिलाषवर्जित, ज्ञान और कर्मोंसे असंस्पृष्ट, अनुकूलतापूर्वक श्रीकृष्णका अनुस्मरण ही 'भक्ति' है— अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ इन सिद्धान्तोंमें भक्ति ही सब कुछ है, उसके लिये ही समस्त साधन हैं, ज्ञान और मोक्ष आदि उसमें विघ्न हैं। भक्तजन भुक्ति, मुक्ति और विरक्ति सबको तिलांजलि देकर भक्तिको ही चाहते हैं। इसीलिये बड़े-बड़े अमलात्मा परमहंस, महामुनीन्द्रगण भी अद्वैत, अनन्त, अखण्ड ब्रह्मसे मन हटाकर सगुण, साकार भगवान्में मन लगाते हैं। प्रभुके श्रीचरणारविन्द- सौगन्ध्यामृतसिन्धुके एक बिन्दुके भी समास्वादन करनेसे सनकादिक, शुकादिक-जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं। अरविन्दनयन भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दमकरन्दमिश्रित तुलसीके मकरन्दरेणु जिस समय स्वविवर (नासिका) -द्वारा सनकादिकोंके हृदयान्तर्गत हुए, बस उसी समय उन अक्षरब्रह्मनिष्ठ सनकादिकोंके शरीर और मनमें भी क्षोभ हो गया अर्थात् शरीरमें पुलकावली, नयनोंमें अश्रु और मनमें द्रवता उत्पन्न हो उठी— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) श्रीशुकाचार्य, जिनका चित्त स्वरूपभूत परमानन्द- सुधासिन्धुसे ही परिपूर्ण हो गया था, स्वसुखनिभृतचेता होनेसे ही अन्यपदार्थविषयक अस्तित्वबुद्धि जिनकी मिट गयी थी, जो केवल सर्वत्र एक परमतत्त्वका दर्शन करते थे, भगवान्‌की लीलारुचिरसे उनका भी धैर्य च्युत हो गया— स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽ- प्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८)

(‘स्वसुखेनैव निभृतं परिपूर्णं चेतो यस्य स तथोक्तः। तेनैव निरस्तः अन्यस्मिन् पदार्थे भावो भावना अस्तित्वबुद्धिर्यस्य स तथोक्तः’) उन्होंने स्वयं कहा है कि मेरा मन निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित था, फिर भी उत्तमश्लोक भगवान्‌की लीलाने मेरे चित्तको खींच लिया। श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्तमति होकर मैंने श्रीमद्भागवतरूप महाख्यानका अध्ययन किया है— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९; १।७।११) लखी जिन लालकी मुसकान। तिनहिं बिसरी वेदविधि सब योग संयम ज्ञान ॥ × × × आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, तत्त्वनिष्ठोंकी ये अनुभूतियाँ हैं कि भगवान्‌की सौन्दर्यछटा, आकर्षक माधुरी एवं रूपराशिको देखते ही उनका ज्ञान मानो मूर्च्छित हो गया, देहकी सुधि जाती रही, रोमांच हो आया, वाणी गद्गद हो गयी और आनन्दाश्रुसे आँखें डबडबा आयीं— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा। सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५; १।२१६।३) भगवान्‌के अवतरणका हेतु—अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान ठीक ही है, तभी तो यह कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंके लिये ही भक्तियोगका विधान करनेके लिये अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य- सुधाजलनिधि दिव्य मूर्ति धारण करते हैं। अन्यथा असुरनाश-जैसे छोटे कार्योंके लिये प्रभुका अवतार वैसे ही अनुचित होगा, जैसे मशकनिवारणार्थ भुशुण्डीका प्रयोग (मच्छर मारनेके लिये तोप चलाना)। परंतु समस्त नाम-रूप-क्रियात्मक प्रपंचसे व्यावृत्तमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्यस्वरूपधारण परमावश्यक है। अद्वैतब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना—यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्यसिद्धान्तके अनुसार प्रकृति-प्राकृत प्रपंचसे पृथक्, असंग, अनन्त चेतनतत्त्वका विवेचन कर लेनेवाले ‘हंस’ कहे जा सकते हैं। परंतु वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार तो दृग्दृश्य, आत्मा-अनात्मा, परात्पर पूर्णतम, सर्वभासक भगवान् और प्रकृति-प्राकृत प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे दिव्य मणिमाला और उसमें कल्पित सर्पका अर्थात् सत्य एवं अनृतका आध्यात्मिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्‌का आध्यात्मिक सम्बन्ध है। अतः सत्यानृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, वैसे ही दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृतस्वरूप दृश्यका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान् ही अवशिष्ट रहते हैं। इस तरह वेदान्त-सिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप नीर-क्षीरका विवेचन है और नीरस्थानीय दृश्यको मिटाकर परमसत्य भगवान्‌में ही स्थित होनेवाले ‘परमहंस’ कहे जा सकते हैं। परंतु बिना भगवान्‌के मधुर, मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता— ‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।’, ‘सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।’ (रा०च०मा० २।२७७।५) अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना— बस, यही मुख्य प्रयोजन प्रभुके मधुर, मंगलमय स्वरूप धारण करनेका है। भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्‌के और कौन हो सकता है? रहा भगवान्‌का अचिन्त्य, अनन्त,

६२८ भक्तिसुधा अव्यपदेश्य, निराकार स्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं। महावाक्यजन्य परब्रह्माकारा वृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन, बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम-रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपनी हिंसा किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूः।' महर्षि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने स्नेहभरी दृष्टिसे श्रीरामचन्द्रको नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा—धिक्कार करती है— यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति॥ जैसे कमलनयन पुरुषके अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, यदि प्रभुके रूपदर्शनमें उनका उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्धभोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि व्यर्थ और नीरस ही रहे, यदि उन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ। इसीलिये श्रीब्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवालोंके नेत्रादि करणग्रामोंकी सार्थकता और इनका चरम फल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्षपातसे युक्त, वेणुचुम्बित, अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका निर्निमेष नयनोंसे पान किया जाय और घ्राणसे सौगन्ध्यामृतका, त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ है—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्य रससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये भगवान्का प्रादुर्भाव होता है। चतुर्विधा भजन्ते ज्ञानी भक्त भगवद्भक्त चार प्रकारके होते हैं। एक तो आप्तकाम, आत्माराम, परमनिष्काम, तत्त्वविद्, ब्रह्मनिष्ठ, परमात्मरहस्यज्ञ ज्ञानी, जिसको ऐन्द्र तथा ब्राह्मपद-पर्यन्तके सम्पूर्ण वैभवोंकी रंचमात्र भी चाह नहीं होती। वे योगीन्द्र, मुनीन्द्र, अमलात्मा, परमहंस बिना किसी प्रयोजनके सर्वैश्वर्यपूर्ण, मधुरतम लीलाबिहारी भगवान्के अव्यावृत्त भजनमें लगे रहते हैं। यद्यपि वे पूर्णकाम, आत्माराम, परब्रह्ममें परिनिष्ठित हैं, भजन करनेकी उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है तथापि वे ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले मुनिजन दिव्य, शुद्ध, नित्य, चिन्मय भगवत्स्वरूपके सामने आते ही क्षुब्ध हो उठते हैं और उनके मरे हुए मन भी जीवित होकर इस स्वरूपकी एक-एक वस्तुपर मुग्ध हो जाते हैं। इन्द्रियोंके विषय रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्शसे मुमुक्षु-अवस्थामें ही चित्त उपरत हो जाता है और भजन करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। कमलनयन, घनश्यामके विधुविनिन्दक वदनारविन्दपर अतिमृदुल मन्द मुसकान एवं उनके अतिमनोहर नयनयुगलके कमनीय कृपाकटाक्ष एवं इसी प्रकार प्रभुके अन्यान्य श्रीअंगोंका अवलोकनकर नामरूपात्मक दृश्य-प्रपंचसे उपरत चित्तवाले योगीन्द्र, मुनीन्द्र भी लट्टू हो जाते हैं। एक बार दिव्य वैकुण्ठलोकमें श्रीमहाविष्णुके समीप नित्य आत्मनिष्ठ सनकादि ऋषि पधारे। ज्यों ही वे भगवान्के सामने पहुँचे और उनके स्वरूपको देखा कि मुग्ध हो गये। भगवान्की सुन्दरता देखते-देखते उनके नेत्र किसी प्रकार तृप्त ही न होते थे। भगवान्के सौन्दर्यने ही उन्हें मुग्ध किया हो सो नहीं, प्रणाम करते समय कमलनयन श्रीहरिके पादपद्मपरागसे मिली हुई तुलसीमंजरीकी सुगन्ध वायुके द्वारा नासिकामार्गसे ज्यों ही मुनियोंके अन्तरमें पहुँची

चतुर्विधा भजन्ते ६२१ कि उनका मन क्षुब्ध हो गया, उस सुगन्धकी ओर खिंच गया, उसपर मोहित हो गया और आनन्दसे उनको रोमांच हो आया— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसी मकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) यही दशा श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रका स्वरूप देखकर श्रीजनकजीकी हुई थी— मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥ (रा०च०मा० १।२१५।८) किसी प्रकार अपनेको विवेक, धैर्यसे सँभाला, परंतु पूछे बिना न रहा गया। श्रीविश्वामित्रके चरणोंमें प्रणाम किया और फिर गद्गद वाणीसे पूछने लगे— कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा ॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ (रा०च०मा० १।२१६।१-५) और भी देखिये, विवाहके समय जो दशा हुई— क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं। करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं ॥ (रा०च०मा० १।३२४। छंद ४) इत्यादि। सारांश यह है कि भजन करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। वे चाहते हैं कि कुछ समय भजन न करें, किन्तु उनके रोकनेपर भी उनका मन प्रभुकी नखमणि-चन्द्रिकाका चिन्तन करने लगता है, प्रभुके त्रिभुवनपावन, मंगलमय नामका उच्चारण करने लगता है। एक गोपांगना लीलाबिहारी, त्रिभुवन-कमनीय, योगीजनदुर्लभ, देवदेवप्रत्याशित, ऋषि-महर्षि-महापुरुष- चित्ताकर्षक, निखिल सौन्दर्य-माधुर्य-रसामृतसारभूत, आनन्दकन्द, व्रजेन्द्रनन्दन, मदनमोहन कृष्णचन्द्रके विरहजन्य तीव्रतापसे तापित होकर जमीनपर बेहोश पड़ी थी और एक दूसरी सखी उसके मुखपर गुलाबजलके छींटे दे-देकर धीरे-धीरे पंखा झल रही थी। इतनेमें ही एक तीसरी सखी आयी और जनमनहारी, बाँकेबिहारी, राधारमण, बाधाहरण नन्दनन्दनकी चर्चा करने लगी। त्यों ही दूसरी बोली—'हे सखी! उनकी चर्चा इस समय न छेड़। यदि अपनी प्रियसखीको इस समय विश्राम लेने देना चाहती है तो उनकी चर्चा भूलकर भी मत चला। कोई और चर्चा चलाकर माधवको इस समय भुला दे।' कैसी विचित्र दशा है? कोई तो इस आधि- व्याधिपूर्ण, शोकतापसंकुल, जन्ममृत्यु-संकीर्ण, आर्तनादके उद्भवस्थान, मृत्युके लीलाक्षेत्र, पापविद्ध संसारका विस्मरणकर भगवद्रसका आस्वादन करना अथवा प्रभुका स्मरण करना चाहते हैं, पर ऐसा होता नहीं और ये महाभागा गोपांगनाएँ नन्दनन्दनका किसी तरह विस्मरण करना चाहती हैं, पर ऐसा होता नहीं। इसी तरह ज्ञानी भी कई तरहके होते हैं। एक तो जड़भरतके समान जंगलोंमें उन्मत्त, प्रेमविभोर होकर इधर-उधर फिरनेवाले। लोकसंग्रही भी आत्माराम, आप्तकाम होते हैं, परंतु भगवान्की प्रेरणासे धर्मसंस्थापनमें लगे रहते हैं। व्यास परमज्ञानी होते हुए भी पुराणोंके निर्माणमें, शंकराचार्य परमज्ञानी होते हुए भी बौद्धोंके खण्डनमें लगे रहते थे। लोकसंग्रहीके सामने कठिनाइयाँ भी आती हैं; क्योंकि संसार कुत्तेकी पूँछके समान है। कुत्तेकी पूँछको कितना ही घी, तेल लगाकर बाँसकी नलीमें डालकर सीधा रखो, किंतु ज्यों ही बाँसकी नलीसे निकली, त्यों ही फिर टेढ़ी-की-टेढ़ी। इसलिये ऐसे ज्ञानियोंको पदे-पदे भगवान्का सहारा लेना पड़ता है। जिज्ञासु भक्त दूसरे प्रकारके भक्त होते हैं-जिज्ञासु-पूर्णविरक्त- 'रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥' (रा०च०मा० २।३२४।८) जैसे उत्तमोत्तम पदार्थोंको खाकर वमन कर दें तो उस ओर

६३० भक्तिसुधा

देखनेतकको जी नहीं चाहता, ठीक वैसे ही इन जिज्ञासुओंको ऐन्द्र, माहेन्द्र एवं ब्राह्मपदपर्यन्तके समस्त वैभव विषवत्, वमनवत् प्रतीत होते हैं। वे वेदाध्ययन आदि करते हैं, किंतु भगवान्‌का भजन करते हुए। जो लोग ऐसा नहीं करते, वे उसी चीलके समान हैं, जो उड़ती तो आकाशमें है, पर दृष्टि रहती है उसकी नीचे। ये लोग भी उड़ते तो शास्त्रोंपर हैं, पर दृष्टि रहती है संसारपर, लक्ष्य रहता है क्षुद्र वैषयिक सुखोंकी प्राप्ति करना। अस्तु, जो लोग विवेक और ज्ञानके साथ भगवत्प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर ग्रन्थोंका अध्ययन नहीं करते, उनके लिये ग्रन्थ ग्रन्थिका ही काम करते हैं। ऐसे लोग भगवत्साक्षात्कार नहीं कर सकते। आर्त भक्त तीसरे प्रकारके भक्त हैं आर्त—गजेन्द्र, द्रौपदीकी तरह पीड़ित, सताये गये। अर्थार्थी भक्त चौथे भक्त हैं अर्थार्थी—विभीषणकी तरह। जिस समय विभीषण सर्वसौन्दर्याधार, अखण्डानन्द- भण्डार, परमसमुज्ज्वल, अतिसुन्दर, चिरमधुर रसमय भगवान्‌के पास आये, उस समय उन्होंने कहा— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥ (रा०च०मा० ५।४९।६) फिर तत्क्षण कहने लगे कि— अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी। (रा०च०मा० ५।४९।७) इनमें एक भक्त ऐसे होते हैं, जो ज्ञान भी प्राप्त करना चाहते हैं, धन भी प्राप्त करना चाहते हैं और विपत्ति-निवारण भी करना चाहते हैं। यद्यपि ज्ञान प्राप्त करने, धन प्राप्त करने और विपत्ति-निवारण करनेका साधन उनके पास है तथापि वे भगवान्‌का भजन नहीं छोड़ते। जो अस्त्रबल, बाहुबल, बुद्धिबलके घमण्डमें आकर भगवान्‌को भूल जाते हैं, उनका मनोरथ मरुभूमिकी नदियोंकी तरह बीचमें ही सूख जाता है, सिद्धिसाफल्य मिलना तो दूर रहा। इसलिये अर्जुन जिस समय कृष्णचन्द्रकी पटरानियोंको लेकर लौट रहे थे, उस समय आभीरोंने उनको बाँसके खण्डोंसे पीट-पीटकर पटरानियोंको छीन लिया। वही शक्तिमान् अर्जुन और वही गाण्डीव धनुष, किंतु एक श्रीकृष्णके बिना उनके सारे साधन बेकार हो गये। अस्तु, कोई कितना ही शक्तिसम्पन्न क्यों न हो, भगवच्चरणोंका सहारा लेते हुए ही उसे चलना चाहिये। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो चाहते तो सब कुछ हैं, पर साधन एक भी नहीं। ऐसे लोगोंको भी निराश न होना चाहिये। शास्त्रोंने उनको भी आश्वासन दे रखा है—'सुने री मैंने निरबलके बल राम।' निष्काम अनन्यभक्त नरसीकी तरह जो साधनविहीन हैं, दीन-दुनियाका जिन्हें कुछ भी भरोसा नहीं, केवल भगवान्‌का सहारा है, ऐसे भक्तोंको भगवान् ऐसा प्रसन्न करते हैं कि वे निहाल हो जाते हैं। ऐसे भी भक्त होते हैं, जो चाहते सब कुछ हैं, पर साधन कुछ नहीं है और साथ ही भगवान्‌पर विश्वास भी नहीं है। ऐसे लोगोंके लिये भी शास्त्रोंमें निराशाका शब्द नहीं। उनके लिये शास्त्र कहते हैं कि भगवान्‌को पुकारो—'हे अशरण-शरण, हे अनाथनाथ, हे अकारण-करुण, हे करुणावरुणालय, हे प्रभो ! मैं आपको नहीं जानता। अपनेको नहीं जानता, आपके और अपने सम्बन्धको नहीं जानता। माया ठगिनीने मुझे खूब ठगा। मैं उन्मादी बन बैठा। तरंग, कटक, मुकुट, कुण्डल, घटाकाश जैसे घमण्ड करे कि मेरे अतिरिक्त जल नामकी कोई वस्तु नहीं, स्वर्ण नामकी कोई वस्तु नहीं और महाकाश नामकी कोई वस्तु ही नहीं है। ठीक इसी प्रकार भगवन्! मैं इतना उन्मादी बन बैठा कि कहने लगा, ईश्वर नामकी कोई वस्तु नहीं। हे नाथ ! अब आप ही कृपा करें कि मैं भाव- कुभाव जिस किसी तरहसे भी आपको पुकारूँ।'

भगवच्छरणागतिसे ही गति ६३१ भगवच्छरणागतिसे ही गति 'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥' (गीता ६।४१) इत्यादि शास्त्रवचनोंमें योगभ्रष्टकी चर्चा आती है। अर्जुनने प्रश्न किया कि— अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ (गीता ६।३७-३८) अर्थात् जो ब्रह्मके मार्गमें प्रतिष्ठित नहीं हो सका, योगसिद्धि बिना प्राप्त किये ही मर गया, उसकी क्या गति होती है ? यहाँ यही अभिप्राय है कि जो लोग कर्मसंन्यास करके कर्ममार्गको छोड़ चुके और ब्रह्मसाक्षात्कार-साधन श्रवणादिमें लगे हुए हैं, वे मरकर छिन्न बादलके समान नष्ट होते हैं या किसी तरह उनकी भी सद्गति होती है ? भगवान्ने कहा— 'पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।' (गीता ६।४०) पार्थ! इस लोक-परलोक कहीं भी उसका विनाश नहीं होता, 'न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥' (गीता ६।४०) हे तात! कल्याणके लिये प्रयत्न करनेवाला कोई प्राणी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता। उनमें उच्चकोटिके अधिकारी लोग तो जन्मान्तरमें पवित्र अध्यात्मनिष्ठ योगियोंके कुलमें जन्म ग्रहण करते हैं और वहाँ पूर्वाभ्यासवशात् पुनः योगाभ्यासमें लगकर शीघ्र ही सिद्धिको प्राप्त कर लेते हैं। कोई-कोई पवित्र श्रीमानोंके यहाँ जन्म ग्रहणकर धर्मानुष्ठान तथा सत्संगादि करके पुनः उच्चगतिको प्राप्त होते हैं। सारांश यही है कि जो कर्मादिका सहारा छोड़कर योग या ज्ञानके अभ्यासमें तल्लीन हो गये और पूर्ण सिद्धि या तत्त्वसाक्षात्कारसे पहले ही मृत हो गये, वे भी नष्ट नहीं होते, किंतु वे भी अच्छी ही गतिको प्राप्त होते हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि इतना ही नहीं, किंतु 'योगभ्रष्ट' का यह भी अर्थ है कि जो योगमार्गसे भ्रष्ट हो गया अर्थात् कामादि दोषोंसे अभिभूत होकर मायिक प्रपंचोंमें फँस गया, उसीकी छिन्नाभ्रवत् नष्ट होनेकी सम्भावना हो सकती है। जो सदाचारी एवं नियतमानस होकर श्रवणादिमें लगा रहता है, वह तो एक प्रकारके बड़े दिव्य पुण्यमें ही लगा रहता है। श्रद्धापूर्वक वेदान्तश्रवणसे प्रतिदिन अशीति (८०) कृच्छ्रचान्द्रायणका पुण्य शास्त्रोंमें कहा गया है। अनेक जन्मोंके अभ्याससे ही संसिद्धि प्राप्त होती है, यही गीताका भी अभिप्राय है— 'अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥' (गीता ६।४५) अर्जुनके प्रश्नसे भी यही मालूम होता है कि यह विकर्म-निमित्त योगभ्रंशको लेकर ही प्रश्न उठा है। शास्त्रोंने यही कहा है कि जो प्राणी स्वधर्मको छोड़कर भगवान्‌को भजने लगा, अपक्व होनेके कारण कथंचित् यदि वह गिर जाय तो भी किसी- न-किसी तरह उसका कल्याण हो ही जाता है। परन्तु जो भगवान्‌का स्मरण न करके कर्मानुष्ठानमें ही लगा है, वह तो कोई भी परमार्थ-लाभ नहीं कर सकता— त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरे- र्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि। यत्र क्व वाभद्रमभूदमूष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥ (श्रीमद्भा० १।५।१७) इसी तरह यह भी कहा गया है कि सर्वत्यागी भगवत्परायण पुरुषसे यदि कोई विकर्म हो जाय तो भी भगवत्स्मृति-परम्परासे उसकी निवृत्ति हो जाती है— स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥ (श्रीमद्भा० ११।५।४२)

६३२ भक्तिसुधा जड़भरत आदि भगवान्‌के स्मरणमें संलग्न थे, दुर्देववश उन्हें मृगशावकमें राग हो गया, इसी कारण वे जन्मान्तरमें मृग हो गये तथापि भगवत्स्मरणके प्रभावसे तत्त्व-साक्षात्कारसम्पन्न होकर अन्तमें सद्गतिके ही भागी हुए। अनन्य भगवत्परायणताका एक दृष्टान्त इसी तरह 'पद्मपुराण' में एक भद्रतनु नामक व्यक्तिकी कथा आती है। वह यद्यपि जन्मान्तरका परम तपस्वी और भगवत्परायण था तथापि किसी दुर्देवके योगसे वेश्यागामी हो गया। एक दिन उसके पिताका श्राद्ध था। उसकी साध्वी धर्मपत्नीने कहा कि 'आज आप अवश्य नियमसे रहें; क्योंकि पिताका श्राद्ध है।' परंतु उससे न रहा गया और वह रात्रिके समय वेश्याके पास जा पहुँचा और अपने उत्कट प्रेमकी कथा कह सुनायी। वेश्याने खिन्न होकर उसे बहुत ही तिरस्कृत किया और कहा कि 'जब आप इतनी नीच प्रकृतिके हैं कि अपने पिताके लिये भी साधारण-सा नियम-पालन नहीं कर सकते तो हमारे लिये आप क्या कर सकते हैं? आप चले जाइये।' वेश्याके इन वचनोंको सुनकर भद्रतनुको ग्लानि हुई और वह उसे गुरु मानकर वहाँसे चल पड़ा। महात्मा मार्कण्डेय वहीं तप कर रहे थे, उनसे जाकर उसने अपनी सारी सत्य स्थिति कही। महात्माने कहा—'अब घबड़ाओ नहीं, तुम्हारा कल्याण होनेहीवाला है। मुझे तो समय नहीं है, तुम यहाँसे समीप ही महात्मा दान्त रहते हैं, उनके पास चले जाओ।' वह गया और महात्मासे अपनी स्थिति बतलायी। महात्माने उसे भगवान्‌की उपासना बतलायी। वह बड़ी तत्परतासे भगवान्‌की उपासनामें लग गया। बहुत ही थोड़े दिनोंमें भगवान् प्रत्यक्ष हुए और प्रसन्न होकर उन्होंने उसके सब पापोंको नष्ट कर दिया और उसे अपना मित्र बना लिया। फिर भी उसे दिनोंदिन दुर्बल होते देखकर भगवान्ने कहा—'मित्र! तुम दिनोंदिन दुर्बल क्यों हो रहे हो? देखो, तुम हमारे मित्र होकर फिर चिन्तित क्यों हो?' उसने कहा— 'भगवन्! मुझे हर समय डर लगा रहता है कि मुझसे कहीं कोई ऐसा अपराध न बन जाय कि प्रभुकी मैत्रीसे मैं वंचित हो जाऊँ।' भगवान्ने कहा—'मित्र! मेरी मैत्री ऐसी चंचल नहीं होती। मैं जिससे मैत्री जोड़ता हूँ, उससे अटल मैत्री रखता हूँ, अतः तुम निश्चिन्त रहो और खूब निश्चिन्तताके साथ भूषण-वसन-अलंकारसे विभूषित, सुसज्जित एवं अलंकृत होकर रहो। यहाँतक कि तुम्हें मैं अपने समान ही पीताम्बर, कटक, मुकुट, कुण्डलादि प्रदान करता हूँ, तुम सर्वथा निश्चिन्त होकर मेरे समान ही रहा करो।' उसने प्रभुकी आज्ञा शिरोधार्य की और प्रसन्नताके साथ रहने लगा। अधिक साजबाजके साथ रहते देखकर गुरुने एक दिन कहा कि 'भाई! तुम कैसे हो गये? क्या फिर अपने पूर्वरूपपर ही आ गये?' उसने कहा— 'गुरुदेव! आपने जिसका भजन बतलाया है, यह सब उसीके आदेशानुसार हो रहा है।' गुरुदेवको आश्चर्य हुआ कि मैं तो सहस्रों वर्षोंसे तप कर रहा हूँ, मुझे भगवान्‌के दर्शनतक न हुए, इसे इतनी शीघ्रतासे भगवान् कैसे मिल गये? दान्तने कहा— 'अच्छा, हमें भी मिलाओ।' भद्रतनुने कहा—'बहुत अच्छा।' भगवान्‌से मिलते ही उसने कहा—'भगवन्! अब तो हमारे गुरुदेवसे भी आपको मिलना पड़ेगा।' भगवान्ने कहा—'मित्र! तुमने जन्मान्तरोंमें मेरी प्राप्तिके लिये बड़ी तपस्या की थी, केवल इतना कामप्रतिबन्ध ही अवशिष्ट था, उसके मिटते ही मैं शीघ्र ही तुम्हें मिल गया, परंतु तुम्हारे गुरुदेवको तो अभी बहुत जन्मोंतक तपस्या करनी पड़ेगी।' भद्रतनुने कहा—'भगवन्! आपको मेरी प्रसन्नताके लिये यह कार्य तो करना ही पड़ेगा।' भगवान्ने कहा— 'अच्छा, तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मैं तुम्हारे गुरुदेवसे मिलूँगा, तुम उन्हें ले आओ।' बस इस तरह प्रभुकी विशेष कृपासे दान्तको भी भगवान्‌का दर्शन मिला। कथानकका आशय यही है कि किसी भी

भगवान्‌का अवलम्बन अनिवार्य ६३३ स्थितिमें प्राणी भगवान्‌के चरणोंमें जाकर सदाचारी बनकर भगवान्‌को प्राप्त कर लेता है, अतः प्राणीको चाहिये कि वह हर तरहसे प्रभुके शरण हो। अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। (गीता ९।३०-३१) कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥ (रा०च०मा० ५।४४।१) सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ (रा०च०मा० ५।३९।७) तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥ (रा०च०मा० २।२९९।३) इत्यादि वचन उपर्युक्त भावोंका ही पोषण करते हैं। भगवान्‌का अवलम्बन अनिवार्य ईश्वरका अभिव्यंजक शास्त्र है। शास्त्रोंपर विश्वास करके एवं समुचित ढंगसे उनका अध्ययन करके उनके अनुसार अनुष्ठान करना और परात्पर, पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्मकी उपासना करना यही कल्याणका मार्ग है। 'गीता' भी यही कहती है कि प्राणी स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ही अभ्युदय, निःश्रेयस, परमगति प्राप्त कर सकता है। इसीलिये हमें अपनी समस्त चेष्टाओं एवं हलचलोंको शास्त्रोक्त बनानेकी कोशिश करनी चाहिये। हमारा राजनैतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय जो भी कार्य हो, वह शास्त्रोक्त ढंगसे होना चाहिये। लोग कहते हैं कि आप तो सब जगह धर्मका अड़ंगा लगाते हैं, पर किया क्या जाय? जो हलचलें शास्त्रविरुद्ध मालूम पड़ें, वे पाप एवं सर्वथा त्याज्य हैं। शास्त्रोक्त धर्मके समाश्रयणसे ही आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक सब प्रकारकी उन्नति एवं सुख-शान्ति प्राप्त हो सकती है। आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक सभी प्रकारके सामूहिक- वैयक्तिक लाभ उसी धर्मसे सम्भव हैं। प्राचीन, अर्वाचीन किसी भी कालमें जो शक्तिशाली, प्रभावशाली, मेधावी, स्मृतिसम्पन्न, नीतिशील, कवि और ज्ञानी हुए हैं, उनका मूल कारण तपस्या, स्वधर्मानुष्ठान और ईश्वराराधन ही है। बिना इसके विशेषता नहीं आ सकती। ऐसा भी देखा जाता है कि पहले तो तपस्या, स्वधर्मानुष्ठान और वर्तमानमें वैषयिक आसक्ति एवं अधर्माचरण। प्राणी जब पददलित, अपमानित एवं दुःखी होता है, तब उसको ईश्वर, धर्म और न्यायकी याद आती है। इसीलिये शास्त्रोंमें अपमानकी, विपत्तिकी बड़ी महिमा बतलायी गयी है। विविध सुख-सम्पत्ति और ऐश्वर्यमें फँसकर प्राणी अपने प्रियतम प्रेमास्पद भगवान्‌को भूल जाता है। यदि सावधान रहे, ईश्वर, धर्म, न्यायको न भूले तो फिर वह बड़ी ऊँची स्थितिको प्राप्त कर सकता है। 'गीता' में बतलाया गया है कि कुछ लोग भगवत्प्राप्तिके लिये; भगवान्‌की दिव्यातिदिव्य, देदीप्यमान, स्निग्ध, सुन्दर, कमनीय, कान्तिमयी मनोहारिणी मूर्तिको अवलोकन करनेके लिये; प्रभुके सुमधुर अधरसुधा-रसका पान करनेके लिये; उनकी अमृतमयी, मृतकजियावनी गिराका श्रवण करनेके लिये एवं प्रभुके अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य, सौगन्ध्य, सौरस्यपरिपूर्ण मंगलमय श्रीपादारविन्द-मकरन्द-रसका समास्वादन करनेके लिये शम, दम, नियम, जप, तप, यज्ञ, योगादिका अनुष्ठान करते हैं, किंतु बिना सिद्धि प्राप्त किये ही मृत्युके शिकार बन जाते हैं, उनकी क्या दशा होती है? इस सम्बन्धमें भगवान् उनकी दो प्रकारकी गति बतलाते हैं—एक तो यह कि विरक्त, तपस्वी, ब्रह्मनिष्ठ श्रीमान्‌के घर उनका जन्म होता है और पूर्वसाधनानुसार श्रवण, मनन, निदिध्यासनद्वारा भगवान्‌के अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश,

६३४ भक्तिसुधा सद्रूप, बोधस्वरूप, कूटस्थ, असंग, निरवयव, निर्विकार, एकरस परमतत्त्वका साक्षात्कार कर लेते हैं। दूसरी यह कि धन-जन-शक्तिसम्पन्न उत्तम कुलमें उनका जन्म तो होता है, परंतु इस मायामय संसारमें, माया-मोहके सूचीभेद्य तिमिर-किरणमें पड़कर पुत्र, परिजन एवं अगणित धन-सम्पत्तिकी आसक्तिमें फँसकर, प्रभुत्व और प्रतिष्ठाके घमण्डमें चकनाचूर होकर, संगमरमरके सुधाधवलित, गगनभेदी, सुरम्य सौधोंकी बाह्य चमचमाहटमें अन्धा होकर एवं मायाकी मूलभूता ममताकी मूर्ति जायाकी छायामें शीतलताका अनुभव करता है और इस प्रकार श्रवणमात्ररमणीय, मृगतृष्णिकोदक सांसारिक क्षुद्र वासनाओंके चंगुलमें पड़कर वैषयिक क्षुद्र आनन्द- बिन्दुओंसे प्रचण्ड कामानलके प्रशमनमें व्यग्र होकर अतृप्ति और असफलताका बोध करते हुए अपने लाखों मित्रोंके सहित मरकर नरकका असह्य दुःख झेलता है। स्वधर्मानुष्ठानसे कल्याणकी प्राप्ति शास्त्रपर विश्वास करके यदि हम स्वधर्मानुष्ठान करें तो ऐसा कोई भी दुर्घट पदार्थ नहीं, जिसे हम प्राप्त न कर सकें। इस समय राष्ट्रोद्धारका मुख्य प्रश्न सामने उपस्थित है। उसके लिये यदि हम कुछ नहीं कर सकते तो भी ईश्वराराधन कर ही सकते हैं। जबकि इस समय हमारे पास अस्त्रबल नहीं, शस्त्रबल नहीं, बाहुबल नहीं, संगठनबल नहीं, बुद्धिबल नहीं, ऐसी परिस्थितिमें तर्क-वितर्कोंको दूर फेंककर दत्तचित होकर सबको ईश्वराराधन करना चाहिये। हम यह नहीं कह सकते कि अन्य साधनोंका उपयोग न किया जाय, किंतु जब अन्य साधन पासमें नहीं, तब आखिर किया ही क्या जाय ? साथ ही बात यह है कि यह सबसे हो भी नहीं सकता, घरमें आग लगी हो और हम मन्दिरमें बैठकर माला फेरें, दुर्गापाठ करें, यह सबसे नहीं हो सकता। हो भी सकता है, पर इसके लिये अटल विश्वासकी आवश्यकता है। पुरुषोत्तम, परब्रह्म, सर्वान्तरात्मा भगवान्‌में पूर्ण विश्वासवाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। भगवान् उसकी सहायता अवश्य करते हैं, पर साधारण स्थितिवालोंके लिये तो 'मामनुस्मर युध्य च' (गीता ८।७)-का ही मार्ग सर्वोत्तम जान पड़ता है। हाँ, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्‌को ही अनन्यगति समझते हैं। भगवत्पादपंकजमें उनका मनोमिलिन्द अहर्निश आसक्त रहता है। वे ही प्रभुके भरोसे अनन्य निश्चिन्त रहते हैं। जो दशा पुत्रवत्सला माँकि उत्संगलालित शिशुकी है, वही दशा भगवत्पादारविन्दानुरागियोंकी भी है और वे ही घरमें आग लगनेपर भी निश्चिन्त होकर माला लेकर बैठ सकते हैं। भक्तवत्सल भगवान् अपने ऐसे विश्वासी भक्तोंका योग-क्षेम स्वयं वहन करते हैं। तभी तो भगवान् किसीके घर पानी भरते और किसीका छप्पर छवाते देखे गये हैं। करें ही क्या ? ठहरे तो भक्तभावनापराधीन ही न, भक्तवांछाकल्पतरु ही न। यदि हम साधनसम्पन्न हों तो भी भगवान्‌से विमुख न होकर ही हमें प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि 'राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥' (रा०च०मा० ५।२३।५) जिस सरिताका कोई उद्गमस्थान नहीं, वह शीघ्र ही सूख जाती है। इसलिये यदि चाहते हों कि हमारी स्थायी उन्नति हो, साम्राज्य, स्वराज्य आदि मिले, लौकिक अभ्युदय हो और साथ ही अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक भगवान् भी मिलें तो हमें भगवच्चरणोंका सहारा लेना पड़ेगा, भगवद्भक्त बनना ही होगा।

प्रेमतत्त्व ६३५ प्रेमतत्त्व अन्तःकरणकी सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है प्रेमतत्त्वको रसिक लोग 'मूकरसास्वादनवत्' कहते हैं। कोई तो आन्तर मधुर वेदनाको ही 'प्रेम' कहते हैं। कोई स्नेहात्मक अन्तःकरणकी वृत्तिको ही प्रेम कहते हैं। यद्यपि वधू आदिमें 'राग', यागादिमें 'श्रद्धा', गुरु आदिमें 'भक्ति' तथा सुखादिकी इच्छा— ये सभी प्रेमके ही रूप हैं तथापि सुखमात्रका अनुवर्तन करनेवाली अन्तःकरणकी सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है। यह प्राप्त, अप्राप्त और नष्टमें भी रहती है। इच्छा नष्ट और प्राप्तमें नहीं होती। प्रेमरसज्ञ लोग रसस्वरूप परमात्माको ही प्रेम कहते हैं। इसीलिये द्रवीभूत अन्तःकरणपर अभिव्यक्त रसस्वरूप परमात्मा ही प्रेमके रूपमें प्रकट होता है। अतएव आचार्योंने कहा है— भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकाररसतामेति पुष्कलम् ॥

६३६ भक्तिसुधा अर्थात् जिसके हृदयकी प्रणय-रशनासे बँधे हुए भगवान् अपनेको न छुड़ा सकें, वही प्रधान भक्त है। कितने स्थलोंमें भक्त भगवान्‌से कहते हैं कि यदि आप हमारे हृदयसे निकल जायँ तो हम देखें आपकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकता। कहीं-कहीं भक्त भी हृदयसे भगवान्‌को निकालना चाहते हैं, भगवान्‌में दोषानुसन्धान करते हैं, परंतु असफल होते हैं— प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन् मनो धित्सते बालासौ विषयेषु धित्सति ततः प्रत्याहरन्ती मनः। यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षति॥ (विदग्धमाधव २।१७) अतएव कुछ लोग द्रवताको ही प्रेम कहते हैं। यद्यपि द्रवताकी अपेक्षा अवश्य है तथापि प्रेमका स्वयंस्वरूप द्रवता नहीं है, प्रेमका निजी रूप तो रसस्वरूप परमात्मा ही है। अतएव आचार्योंने उसे निरुपम सुखसंविद्रूप बतलाया है। जिस तरह सच्चिदानन्द ब्रह्म विश्वका कारण है, अतएव उसके सदंश, चिदंशकी सर्वत्र अनुवृत्ति दिखायी देती है। 'घटः सन्', 'पटः सन्' इत्यादि रूपसे सद्विशेष घटादि प्रपंचमें सत्‌की व्याप्ति है। वैसे ही 'आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि' (तैत्तिरीय० ३।६)-के अनुसार आनन्दरससे ही सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है, अतएव सर्वत्र उसकी अनुवृत्ति या व्याप्ति होनी चाहिये। इसीलिये हर एक जन्तुमें, हर एक परमाणुमें आनन्द, रस या रसस्वरूपभूत प्रेमकी भी व्याप्ति है। बिना प्रेम या रसके एक-दूसरेसे मिलना नहीं हो सकता। पुत्र, कलत्र, मित्र आदिका मिलन भी रस या स्नेहसे है। पशु-पक्षियोंमें, पिता-माता, पुत्र, पुत्रवधूमें प्रीति, स्नेह होता है। किं बहुना एक परमाणुका दूसरे परमाणुसे मिलना भी बिना स्नेहके नहीं हो सकता। इस तरह प्रेमतत्त्व आनन्द या रसस्वरूप होनेसे विश्वका कारण है, इसलिये उसकी व्याप्ति है। वह सर्वत्र और सबके पास है। उसका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् केवल सांसारिक वस्तुओंमें ही प्रेम करनेसे दुःख होता है। भगवान्‌में उसका सम्बन्ध जोड़ते ही सारा विश्व आनन्दमय, मंगलमय हो जाता है। इसीलिये प्रेमियोंने चाहा है कि संसारसे प्रेम हटकर भगवान्‌में ही हो जाय—'यह बिनती रघुबीर गुसाईं।' 'ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों होहिं सिमिटि इक ठाईं॥' (विनय-पत्रिका १०३) जैसे किसीके पास कोई दिव्यशक्तिसम्पन्न क्षेत्र हो, परंतु वह उसमें दौर्गन्ध्य-विष-कण्टकादिपूर्ण विष-वृक्षको लगाकर दौर्गन्ध्य-विष-कण्टकादिसे दुःख पाता है, यदि हिम्मत बाँधकर सावधानीसे उस विष-वृक्षको काटकर सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्यपूर्ण आम्रवृक्ष या कल्पवृक्षको लगाये तो अवश्य सुखी हो जाय। ठीक वैसे ही प्रेमको संसारके साथ जोड़कर प्रेममें लौकिक भावोंको जोड़कर प्राणी दुःखी होता है, प्रेमके साथ भगवान्‌का सम्बन्ध जोड़ते ही सर्वत्र आनन्द-ही-आनन्द हो जाता है। जैसे कोई कल्याणमयी, करुणामयी पुत्रवत्सला अम्बा अपने शिशुको कहीं भेजती हुई उसे ऐसा पाथेय अवश्य प्रदान करती है, जिसके सहारे वह पुनः अपनी अम्बाके पास आ जाय, यदि ऐसा न ध्यान रखे तो उसे 'करुणामयी' नहीं कहा जा सकेगा। वैसे ही अनन्तब्रह्माण्डजननी कृष्णाभिधाना माँने भी जीवोंको प्रेमतत्त्व साथमें ही दे रखा है। उसे भूल जानेसे या उसका दुरुपयोग करनेसे जीव दुःख पाता है। परंतु उसको यादकर, उसका सदुपयोग करते ही अर्थात् गुरुजनों, शास्त्रों एवं भगवान्‌में प्रेमका उपयोग करनेसे जीव कृतकृत्य होकर अपनी कृष्णाभिधाना माँके अंक (गोद)-में जा पहुँचता है, सर्वदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है। भगवान् ही प्रेमके उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप हैं कहा जा सकता है कि यदि रस, प्रेम और भगवान् एक हैं और नित्य सिद्ध ही हैं तो भगवान्‌में प्रेमको 'प्रेम' और अन्य प्रेमास्पदमें विषय- विषयीभाव-कल्पनाकी क्या अपेक्षा है? इससे तो

मालूम पड़ता है कि प्रेमके लिये भेदभावकी ही अपेक्षा है। बिना दोके प्रेम नहीं होता, अतएव प्रेम और भगवान् भी दो वस्तु होनी चाहिये। परंतु गम्भीरतासे विवेचन करें तो मालूम होगा कि आरम्भकालमें औपाधिक प्रेमके लिये अवश्य ही दोकी अपेक्षा किंवा अभिव्यक्तिके लिये साधनकी अपेक्षा है, परंतु स्वभावतः प्रेम अभेदमें या अत्यन्त सन्निहित प्रत्यगात्मामें ही होता है और वह स्वतःसिद्ध भी है। जैसे स्वप्रकाश ब्रह्मके प्राकट्यार्थ भी महावाक्यजन्य परब्रह्माकाराकारित वृत्तिकी अपेक्षा होती है, वैसे ही भगवत्स्वरूप, स्वतःसिद्ध प्रेमके भी प्राकट्यके लिये भगवदाकाराकारित स्निग्ध मानसी वृत्ति अपेक्षित है। उस प्राकट्यके लिये ही सद्धर्म, सत्कर्म आदि साधनोंकी अपेक्षा है। प्राकट्य-भेदसे ही उसके अणु, मध्यम, महत् एवं परममहत्परिमाण- भेदसे अनेक भेद भी होते हैं। साधनकालमें ही भेदभावकी अपेक्षा होती है। अज्ञानके कारण ही भगवान्में प्रेम न होकर विश्वमें होता है। या यों समझिये कि नीरस, निःसार संसारमें रसस्वरूप भगवान्के सम्बन्धसे ही सरसताकी प्रतीति होती है, अतः सरसत्वेन प्रतीयमान विश्वमें प्रेम होता है। जैसे प्रकाशकी अन्यत्र सातिशयता और व्यभिचारिता होनेपर भी सूर्यमें उसका व्यभिचार या सातिशयता सम्भव नहीं है, वैसे ही अन्यत्र प्रेमका व्यभिचार और सातिशयता देखी जाती है, परंतु भगवान्में व्यभिचार और सातिशयता नहीं है। पुत्र, कलत्रादिकोंसे कभी प्रेम, कभी बैर भी हो जाता है, कभी प्रेमकी कमी, कभी अधिकता हो जाती है, परंतु भगवान्में वह सदा होता है और सर्वदा निरतिशय होता है; क्योंकि जैसे सूर्य प्रकाशके उद्गम-स्थान या प्रकाशस्वरूप ही हैं, वैसे ही भगवान् भी प्रेमके उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप ही हैं। कहा जाता है कि भगवान् और उनमें प्रेम प्रत्यक्ष नहीं है, फिर भगवान्में अव्यभिचारी और निरतिशय प्रेम या उन्हें प्रेमस्वरूप कैसे माना जाय? परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि भगवान् सर्वप्रकाशक, अखण्ड बोधरूपसे, प्रत्यगात्मारूपसे प्रसिद्ध हैं। अतएव उनमें प्रेम भी प्रसिद्ध है। केवल अनिर्वचनीय आवरण मिटानेके लिये ही कुछ प्रयत्नोंकी अपेक्षा है। विज्ञानसे सारी वस्तुओंका व्यवहार होता है। सम्पूर्ण वस्तु, सम्पूर्ण व्यवहार बोधसे ही प्रकाशित होता है। फिर बोधमें क्या सन्देह? 'जगत प्रकास्य प्रकासक रामू' (रा०च०मा० १।११७।७)। जैसे दर्पणदर्शनके पश्चात् तदन्तर्गत प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, वैसे ही बोधमानके पश्चात् ही विश्व या उसकी वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं—'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।' (कठ० २।२।१५; मुण्डक० २।२।१०; श्वेताश्वतर० ६।१४) जैसे तरंग व्यामोहसे ही कह सकती है कि 'जल कहाँ है? जो कुछ है, मैं ही हूँ' वैसे ही जीव व्यामोहसे ही कह सकता है कि 'भगवान् कहाँ? जो कुछ है मैं ही हूँ।' जैसे तरंगके भीतर, बाहर, मध्यमें, किं बहुना तरंगका अस्तित्व ही जलपर निर्भर है, वैसे ही सम्पूर्ण जगत्में, विशेषतः जीवमें, उसके भीतर, बाहर, मध्यमें सर्वत्र भगवान् ही हैं। वस्तुतः सम्पूर्ण विश्व या जीव भगवान्की सत्तासे ही सत्तावाले हैं, उनका पृथक् अस्तित्व ही नहीं है। प्राणीको अपने प्राणोंमें, सुखमें, अपनी आत्मामें स्वाभाविक प्रेम होता है, भगवान् तो प्राणोंके प्राण, सुखके सुख और जीवोंके भी जीवन हैं। फिर उनमें प्रेम स्वाभाविक क्यों न हो? इसीलिये तो महर्षि वाल्मीकि कहते हैं—'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः॥' (वाल्मीकीय० २।३७।३२) अर्थात् लोकमें कोई भी जन्तु या कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो रामका भक्त न हो। वसिष्ठजी कहते हैं—'प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह

जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥' (रा०च०मा० २।२९०) अर्थात् हे तात! राघवेन्द्र रामभद्र! तुम्हीं तो प्राणोंके प्राण, आत्माके आत्मा और सुखके भी सुख हो। प्राणसे या अपानसे प्राणी नहीं जीता, किन्तु प्राणीमें प्राणन शक्ति देनेवाला प्राणका भी प्राण भगवान् ही सबको जिलाता है। फिर तुमको छोड़कर जगत् किसे अच्छा लगे? इस दृष्टिसे रावणादि भी रामके भक्त ही हैं। भला, अपनी सत्ताका कौन विरोधी होगा? नास्तिक भी अपनी और अपने सिद्धान्तकी सत्ताका बाध या अपलाप नहीं चाहता या करता। हर एक व्यक्तिका निश्चय है कि और कुछ हो या नहीं, रहे या न रहे, मैं तो हूँ ही, मैं तो रहूँ ही। जैसे जलके बिना तरंग क्षणभर भी टिक ही नहीं सकती, वैसे ही सत्ताके बिना सम्पूर्ण पदार्थ असत् हो जाते हैं। सत्, चित्, आनन्द रसस्वरूप भगवान्‌के बिना सब निःस्फूर्ति, नीरस, निरानन्द, किं बहुना असत् हो जाते हैं। उनके योगसे ही—आध्यात्मिक सम्बन्धसे ही— स्फूर्तिमत्ता, सरसता, सानन्दता और अस्तित्व सिद्ध होता है। अतः उनका अमंगलमय वियोग किसे सह्य होगा? जैसे गुड़के सम्बन्धसे नीरस बेसनमें मिठास आती है, वैसे ही 'स्व' के सम्बन्धसे—अपनेपनके सम्बन्धसे वस्तुओंमें प्रीति होती है। अपनेपनके बिना कट्टर वैष्णवोंको भगवान् शिवमें और शैवोंको विष्णुमें भी प्रेम नहीं होता। अनन्तब्रह्माण्डनायक भगवान्‌के ही जिस रूपमें अपनापन, अपना उपास्यभाव होता है, उसीमें प्रेम होता है। जिसमें उपास्यबुद्धि, इष्टबुद्धि नहीं, जिसमें अपनापन नहीं, उसमें प्रेम भी नहीं। अपनापन होनेसे अपने क्षेत्र, वृक्ष, बागके काँटोंमें भी प्रेम होता है, उनके नष्ट होनेमें कष्ट होता है। जिस अपनेपनके बिना ब्रह्म भी नीरस, जिस अपनेपनके सम्बन्धसे कण्टकादिमें भी प्रेम, साक्षात् उस अपनेमें, 'स्व' में प्राणीका कितना प्रेम हो सकता है? इसीलिये भगवान् प्राणके प्राण, आत्माके आत्मा, सुखके सुख, प्रत्यक्ष स्वात्मा हैं, अतएव प्रेम या रसस्वरूप ही हैं। जो वस्तु जितनी अप्रत्यक्ष, दूर और अपनेसे भिन्न है, उसमें उतनी ही प्रेमकी कमी होती है। क्षेत्र, मित्र, पुत्र, कलत्र आदिमें दूरस्थ, अप्रत्यक्ष तत्त्वोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम होता है। क्षेत्रादिकी अपेक्षा देहादिमें अधिक प्रेम होता है। देहविरुद्ध होनेसे उन सबका ही त्याग किया जाता है; क्योंकि उनकी अपेक्षा देह सन्निहित एवं प्रत्यक्ष है। देहसे भी इन्द्रियाँ, प्राण अन्तरंग हैं, अतः उनमें प्रेम अधिक होता है। मन उनमें भी समीप है, अतः उसके प्रतिकूल या उसे दुःखदायी मालूम पड़नेपर देहादिका भी त्याग किया जाता है। बुद्धि, अहमर्थका भी निरोध आत्महितके लिये किया जाता है। 'यदा पञ्चाव- तिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति' (कठ० २।३।१०) इत्यादिसे मनोनाश, वासना-क्षयके लिये प्रयत्न प्रसिद्ध ही है। इस दृष्टिसे सर्वान्तरंग, सर्वसन्निहित, परम प्रत्यक्ष, प्रत्यगात्मस्वरूप ही भगवान् हैं। उन्हींमें मुख्य प्रेम और वही प्रेमस्वरूप भी हैं, उनसे भिन्नमें प्रेमकी कमी स्पष्ट है। आत्माके लिये ही सब कुछ होता है, देवतामें प्रीति भी आत्मकल्याणके लिये ही होती है, आत्मप्रतिकूल देवताकी उपेक्षा ही होती है। यदि भगवान् प्रत्यगात्मस्वरूप नहीं, तब तो भगवान् 'शेष' (अंग) हो जायँगे, भगवान्‌के लिये आत्मा नहीं, किंतु भगवान् आत्माके लिये समझे जायँगे, अतः भगवान् परोक्ष होनेसे अस्वप्रकाश समझे जायँगे, भगवान् अनात्मा होनेसे बहिरंग और शेष या अंग समझे जायँगे, यह सब अनर्थ है; क्योंकि सिद्धान्ततः वस्तुगत्या भगवान् ही सर्वान्तरंग, सर्वान्तरात्मा हैं, वे ही सर्वशेषी हैं, सब कुछ उनके लिये, वे किसीके लिये नहीं। भगवान् ही प्रत्यगात्मा होनेसे स्वप्रकाश हैं और वे ही शेषी हैं, वे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद हैं। इसीलिये तो जैसे सैन्धवखिल्य (सेंधानमकका

प्रेमतत्त्व ६३९ टुकड़ा) अपने-आपको अपने उद्गम-स्थान समुद्रमें समर्पणकर समुद्ररूप हो जाता है, वैसे ही औपाधिक चैतन्यरूप जीवात्मा अपने उद्गम-स्थान परप्रेमास्पद भगवान्‌में आत्मसमर्पण करके भगवत्स्वरूप हो जाता है। जैसे घटाकाश घट और घटाकाश सबको ही महाकाशमें समर्पण कर देता है। जब आकाशसे ही वायु आदि-क्रमसे घट बना, उसीसे घटाकाशकी प्रतीति हुई, घट पृथिव्यादिमें लयक्रमेण आकाश हो गया, तब घटाकाश सुतरां आकाश हो गया, यही सच्चा आत्मसमर्पण है। वैसे ही जीवात्मा भगवान्‌से प्रादुर्भूत अपना सर्वस्व और अपने-आपको भगवान्‌में समर्पण करके सर्वदाके लिये सर्वशेषी, सर्वान्तरंग सर्वप्रेमास्पद, सर्वान्तरात्मस्वरूप हो जाता है। अपने मिथ्या, काल्पनिक भावका सर्वदाके लिये बाधकर पारमार्थिक रूपको प्राप्त कर लेता है— 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।' प्रेम

६४० भक्तिसुधा भगवान् और प्रेम आत्मामें सर्वातिशायी प्रेम होता है प्रेमतत्त्वका प्राकट्य अधिकाधिक रूपमें वहाँ ही होता है, जहाँ जितना ही सन्निधान, जितनी ही अन्तरंगता, जितनी ही प्रत्यक्षता अधिक होती है। जहाँ सन्निधान आदिकी जितनी ही कमी, वहाँ उतनी ही प्रेममें भी कमी होती है। इसीलिये अत्यन्त सन्निहित, अत्यन्त अन्तरंग, अति प्रत्यक्ष प्रत्यगात्मामें ही प्रेम देखा जाता है। अन्तरात्मा अत्यन्त अभिन्नस्वात्मामें ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेम होता है। जब ब्रह्माने श्रीकृष्णके वत्स-वत्सपोंका अपहरण कर लिया, तब श्रीकृष्ण कौतुकवशात् स्वयं ही सब कुछ हो गये। गौओं और गोपालिकाओंको यद्यपि श्रीकृष्णदर्शन, स्पर्शनादि प्राप्त होता था तथापि नन्दरानीका सौभाग्य देखकर उन्हें लालसा होती थी कि व्रजेन्द्रगेहिनी जैसे अपने ललनको हृदयमें छिपाकर रखती हैं, बार-बार मस्तक सूँघकर मुखचन्द्रका चुम्बन करती हैं, वैसे ही हम भी करें। उनकी अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये ही श्रीकृष्ण अपने-आप ही बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें हो गये। अब तो सभी गायों और वात्सल्यभाववती गोपियोंको कृष्ण ही पुत्रके रूपमें मिल गये। फिर तो उनके प्रेममें निःसीम वृद्धि हो गयी। अपराध हो जानेपर भी उन बालकोंपर पिता-माताको क्रोध नहीं होता था। उनको देखते ही क्रोध न जाने कहाँ भाग जाता था ! दूसरे नवीन सन्तानोंके उत्पन्न होनेपर भी गौओंको उनमें निःसीम प्रेम था। वे नये बछड़ोंकी परवाह न करके भी उन्हें ही दूध पिलाना चाहती थीं, प्रेममें विभोर होकर उन्हें सूँघती और चाटती थीं, मानो नेत्रों, घ्राणों और जिह्वासे सर्वदा पानकर हृदयमें रखना चाहती थीं। जो लोकोत्तर, निःसीम प्रीति उन गोपालिकाओंको कभी अपने बालकोंमें नहीं थी, वह अद्भुत प्रीति उन कृष्णात्मक वत्स-वत्सपोंमें हुई। इस विचित्र आश्चर्यमय चरित्रको श्रवणकर जब परीक्षित्ने उसका कारण पूछा, तब श्रीशुकदेवजीने यही कहा कि 'राजन् ! संसारमें प्राणिमात्रको अपने आत्मामें सर्वातिशायी प्रेम होता है; कलत्र, पुत्र, क्षेत्र, वित्त, मित्र आदिमें इतना प्रेम नहीं होता। देहात्मवादी भी जितना प्रेम देहमें करते हैं, उतना देहानुगामी वस्तुमें नहीं करते। अपत्य, वित्त, कलत्र आदिमें जो प्रेम होता है, वह केवल आत्मप्रेमका शेष ही है। वेद भी यही कहते हैं कि— 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) आत्माके लिये ही सम्पूर्ण वस्तुओंमें प्राणिमात्रको प्रेम होता है। देवताके कामके लिये प्राणीको देवतामें प्रेम नहीं होता, किंतु आत्माके लिये ही देवतामें भी प्रेम होता है। भगवान् भास्कर ब्राह्मणोंके इष्टदेव अत्यन्त प्रिय विश्वप्राण हैं, परंतु जब वे ही ग्रीष्ममें प्रतिकूल प्रतीत होते हैं, तब प्राणी उनकी आँखोंसे ओझल होना चाहता है। जिस देवतासे अपने मनोरथोंकी सिद्धि होती है, उसमें बड़ा ही स्नेह होता है। जिसकी उपासना आरम्भ करनेसे कुछ अनिष्ट होता है, उस देवतासे उपरति हो जाती है। इसीलिये मन्त्रोंमें भी अरि और मित्रादिकी कल्पना तान्त्रिकोंके यहाँ होती है। अतः आत्माके लिये ही संसारकी सारी वस्तु प्रिय है— यह लोक, वेद सर्वत्र ही प्रसिद्ध है। इस तरह आत्मा- सम्बन्धी प्रेम प्राणिमात्रमें प्रसिद्ध होनेसे ही कृष्णमें सब लोगोंको अधिक प्रेम हुआ; क्योंकि कृष्णचन्द्र प्राणिमात्रके अन्तरात्मा थे। वे ही अपनी अचिन्त्य, दिव्य लीला- शक्तिसे सगुण, साकार, अचिन्त्य, अनन्तकल्याण- गुणगण-समलंकृत, मनोहर रूपमें प्रकट हुए थे— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम् । जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) वस्तुतः स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण वस्तु श्रीकृष्णमात्र हैं, श्रीकृष्ण ही परम तत्त्व हैं, वे ही

भगवान् और प्रेम ६४१ सर्वान्तरात्मा हैं, वे ही सम्पूर्ण वस्तुओंके अन्तिम स्वरूप हैं। वस्तुओंका अन्तिम रूप अपना कारण अव्याकृत तत्त्व है। उस अव्याकृतकी भी अन्तिम पर्यवसान-भूमि श्रीकृष्ण हैं; क्योंकि कारणसे भिन्न कार्य और अधिष्ठानसे भिन्न कल्पित नामकी कोई वस्तु ठहरती ही नहीं है— सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) वे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद हैं, वे ही अन्तरात्मा हैं, अतः सच्चा प्रेम उन्हींमें ही होना चाहिये। हाँ, सहज, स्वाभाविक प्रेम भी बिना जाने असत्-सा हो जाता है। जैसे छात्राध्ययनके शब्दोंके बीच मिले हुए अपने पुत्रके अध्ययनके शब्दका विविक्त स्पष्ट रूपसे प्राकट्य नहीं होता, वैसे ही आत्मप्रेम प्राणिमात्रमें होनेसे आत्माकी परमानन्दरूपता प्रतीत होनेपर भी अविद्याके कारण उसका स्पष्ट प्राकट्य नहीं होता है। परंतु इस तरह प्राणी अज्ञात रूपसे तो आत्मप्रेमी है ही। अतएव प्राणिमात्र ज्ञानसे, अज्ञानसे, किसी-न-किसी तरह अपने जीवनधन भगवान्का अवश्य ही प्रेमी है। जिसे जितना बोध है, उसे उतना ही प्राकट्य है। जहाँ वह प्रेम सम्यक्रूपसे प्रकट है, वहाँ परिपूर्ण ऐश्वर्य भी नतमस्तक हो जाता है। इसीलिये कहा जाता है कि महत्परिमाण- परिमिति-प्रेमवती व्रजांगनाओंके सामने ऐश्वर्य अपना प्रभाव नहीं डाल सका। कभी श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई व्रजांगनाओंको जब अकस्मात् कृष्ण किसी निकुंजमें मिल गये, तब कृष्ण अपनेको छिपानेके लिये अनन्त ऐश्वर्यपूर्ण श्रीमन्नारायणके रूपमें प्रकट हो गये। गोपांगनाओंने उन्हें प्रणाम किया, परंतु उनसे माँगा यही कि आप कृपा करके हमारे मनमोहन कृष्णचन्द्रको मिला दो। वे उस नारायणरूपपर मोहित नहीं हुईं और श्रीवृषभानुनन्दिनीके पधारते ही वह ऐश्वर्यपूर्ण रूप टिक ही नहीं सका, सहसा कृष्णरूप प्रकट हो गया। निरुपाधिक प्रेम सर्वातिशायी प्रेम है तथापि प्रेम- प्राकट्यमें लौकिकताकी अपेक्षा अधिक होती है। इसीलिये देखते ही हैं कि प्राणियोंको जितना स्वारसिक प्रेम अपने पुत्र, कलत्र, धन-धान्यादिमें होता है, उतना स्वारसिक प्रेम देवता या भगवान्में नहीं होता। इसीलिये परिपूर्ण परमात्मा प्राणि-कल्याणार्थ अपनी अलौकिकताको छिपाकर लौकिक रूप ग्रहण करते हैं। भक्तोंने भी भक्तिके दो रूप माने हैं, एक वैधी, दूसरी रागानुगा। विधिसे प्राप्त भक्ति वैधी है। 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' के अनुसार अप्राप्तिमें ही विधि होती है। समझा जाता है कि जहाँ स्वारसिक, रागानुगामी नहीं है, वहीं विधिकी अपेक्षा होती है। किं बहुना माता-पिता, गुरुजनों एवं लौकिक विषयोंमें भी विधिक संस्पर्श है, अतः वहाँ भी स्वारसिक प्रीतिमें कुछ कमी हो जाती है। उन सबकी अपेक्षा पत्नीमें प्रीति स्वाभाविक है। पत्नीके प्रति प्रीतिमें भी 'मातृदेवो भव', 'पितृदेवो भव', 'आचार्यदेवो भव' के समान ही 'स्वदारनिरतो भव' इस विधिक संस्पर्श है, अतः वहाँपर भी स्वारसिक प्रेम नहीं है। जहाँ स्वारसिक प्रेम है, वहाँ निषेध होता है। जैसे बहते जलमें बाँध बाँधनेसे वेग उत्कट हो जाता है, वैसे ही स्वाभाविक प्रेममें निषेध या रुकावट डालनेसे वह भी उत्कट रूप धारण करता है। इसीलिये प्रेमियोंने कहा है— कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ (रा०च०मा० ७।१३० (ख)) अर्थात् हे नाथ! जैसे लोभीको धन और कामुकको कामिनीमें प्रीति होती है, आपके श्रीचरणोंमें मुझे वैसी ही प्रीति होनी चाहिये। उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता लोकमें उपाधिको लेकर होनेवाले प्रेमकी यह दशा है। सर्वोपाधिविनिर्मुक्त होनेपर स्वाभाविक स्वान्तरात्मा चैतन्याभिन्न परमात्मा भगवान्में तो स्वाभाविक प्रेम ही अनन्त है, क्योंकि वहाँ तो भगवान्

६४२ भक्तिसुधा और प्रेम दोनों एक ही वस्तु हैं। परंतु देहादि उपाधियोंकी विद्यमानतामें इतना प्रेम उधर व्यक्त नहीं होता, इसीलिये अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्र भी लौकिक रूपसे भगवान्में प्रेम करते हैं—'अस तब रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥' (रा०च०मा० ३।१३।१३) यहाँतक कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य भगवान् सगुण होते हैं। परमहंसोंको श्रीपरमहंस बनाना भगवान्‌का उद्देश्य है; क्योंकि उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ (श्रीमद्भा० १।५।१२) अच्युत प्रेम बिना नैष्कर्म्य-विज्ञान भी सुशोभित नहीं होता, फिर भगवच्चरणोंमें समर्पण किये बिना निष्काम कर्म भी कैसे शोभित होगा ? सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥ (रा०च०मा० २।२७७।५) जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू ॥ (रा०च०मा० २।२९१।२) इन दृष्टियोंसे ही ज्ञानी भी भगवान्में प्रेम चाहते हैं। कहीं-कहीं तो न चाहनेपर भी भगवत्स्वरूप सौन्दर्य आदिसे भगवान्में ज्ञानियोंका मन मोहित हो जाता है। यही तो रागानुगा-प्रीति है, जिसके सम्पादनके लिये प्रयत्न अपेक्षित नहीं है, वह हठात् उत्पन्न होती है। सर्वथापि व्यावृत्त बाह्यौत्सुक्य, वीतराग ज्ञानी श्रीभगवान्‌की ओर आकर्षित होकर आश्चर्यमें कहते हैं— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयंगते यद् ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत् परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते॥ अर्थात् अभ्याससे क्रमेण पंचक्लेशोंके क्षीण होनेपर प्रत्यक्चैतन्याभिन्न विशुद्ध ब्रह्मसुखकी स्फूर्ति हुई थी, परंतु मेरे उस अद्भुत सुखको व्यर्थ-सा बनाता हुआ यह आमोदभर नराकार श्यामल तत्त्व कौन है ? रागानुगा प्रीतिके सम्पादनके लिये भगवान्‌का प्राकट्य इसी रागानुगा प्रीतिका सम्पादन करनेके लिये भगवान् अलौकिक होते हुए भी लौकिकवत्, अप्राकृत होते हुए भी प्राकृतवत्, अग्राह्य होते हुए भी ग्राह्यवत्, अदृश्य होते हुए भी दृश्यवत्, विश्वके जननी-जनक होकर भी पुत्रवत् होकर प्रकट होते हैं। किं बहुना पति, उपपतितक बनकर भी भगवान् भिन्न-भिन्न प्रीतिको, विषयकी ओर उन्मुख मनको विषयोंसे प्रत्यावर्तित करके अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। यद्यपि वे पतियोंके भी पति, सबके परमपति हैं तथापि निरतिशय परप्रेमके आस्पद बननेके लिये वे ब्रह्म व्रजांगनाओंके उपपति होकर भी प्रकट होते हैं। इसीलिये प्राणियोंका चित्त अलौकिक एवं वैध वस्तुमें उतना नहीं खिंचता, जितना लौकिक एवं अवैधमें। पर वे अवैध होते हुए भी परम वैध हैं, उपपति होते हुए भी परमपति हैं। लौकिक जार लोक-परलोक, धर्म-कर्मको जलानेवाला होता है, पर भगवान् औपपत्य बुद्धिसे भी—जाररूपसे भी भावुकके चित्तपर अभिव्यक्त होकर उसके पंचकोश, स्थूल, सूक्ष्म, कारण—तीनों शरीरोंको, कर्म-बन्धनोंको, किं बहुना अविद्या, तत्कार्यात्मक जगत्‌को जलाकर भस्मसात् कर देते हैं, इसीलिये वे जार हैं। 'अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) अर्थात् निष्काम रागानुगा भक्ति एवं ज्ञान कोशों और कर्मोंको जला देते हैं, जीवात्मा संसारसे छूटकर भगवद्भावको प्राप्त हो जाता है। किसीने भगवान्‌से परिहास किया था कि हे व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ! जो प्राणी आपका नवनीतचौर्य और व्रजयुवतीजनोंमें औपपत्यका प्रख्यापन करते हैं, आप उन्हें शीघ्रतिशीघ्र ही अपना रूप इसलिये प्रदान करते हैं कि वे हमारे रूप हो जायँगे, तब हमारे इन कर्तव्योंका वर्णन न कर सकेंगे। अतः अपने कर्तव्योंको छिपानेके लिये ही नवनीत-चौरता और व्रजयुवतीजन-

भगवत्कथामृत ६४३ जारताको गानेवालोंको आप निजरूप प्रदान करते हैं— प्रथयति नवनीतचौरतां ते व्रजयुवतीजनजारतां जनो यः। वितरसि निजरूपमीश तस्मै स्वकृतधिया परिगोपनाय नूनम्॥ वस्तुतस्तु येन-केनापि प्रकारेण भगवान्‌में मन जोड़ते ही प्राणीको भगवद्भावकी प्राप्ति हो जाती है। जैसे चिन्तामणिको दीपक समझकर दीपकबुद्ध्या भी प्रवृत्त होनेपर चिन्तामणिकी प्राप्ति होती है, वैसे ही प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान् ब्रह्ममें औपपत्यबुद्ध्या प्रवृत्त होनेपर भी प्राप्ति भगवान्‌की ही होती है। केवल रागानुगामिनी उत्कट प्रीतिके लिये ही भावुक लोग लौकिक रूपमें भगवान्‌को भजते हैं। ज्ञानीका भी प्रारब्धवशात् प्रत्युपस्थित लौकिक पदार्थोंमें जैसा चित्त स्वाभाविक रूपसे प्रवृत्त होता है, वैसा प्रत्यगात्मामें नहीं। इसीलिये भगवान्‌की मधुर लीलाओंका प्राकट्य होता है। चापल्यपूर्ण बाल्य, पौगण्डादि अवस्थाओंकी लीलाओंमें हठात् चित्त खिंचता है। इस दृष्टिसे अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही भगवान् अचिन्त्य, सगुण, साकार, दिव्य श्रीरामकृष्णादिके रूपमें प्रकट होते हैं।

भगवत्कथामृत

हम उस आनन्दकन्द, नन्दनन्दन, गोपिका- वल्लभ, पूर्णब्रह्म, मंगलमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके परम ऋणी हैं, जो हमें सृजनकर हमारा पालन- पोषण कर रहे हैं। उनके मधुर मुखारविन्द, मनोहारी नेत्र, नासिका, अधर और मकराकृत कुण्डल सब- के-सब हमारे हृदयस्थलको पवित्र करने एवं प्रसन्नता देनेवाले हैं, पर शोकके साथ कहना पड़ता है कि हम आज उस नटवर गोपालको—अज्ञानसागरमें अपनेको डालकर—एकदम भूल गये हैं और उसकी मधुरमय लीलासुधारसपानसे अपनेको दूर रखे हुए हैं। भावुकोंका कहना है कि यदि सहस्रों सिर प्रदान कर देनेपर भी उस महाप्रभुकी लीलाका वास्तविक ज्ञान हो जाय और उसका दर्शन हो तो यह सौदा बहुत ही सस्ता है, इसे शीघ्र-से-शीघ्र खरीद लो। ऐसे अमूल्य सौदेको, जो हजारों सिर देकर खरीदनेपर भी सस्ता पड़ता है, हम उपेक्षाकी दृष्टिसे देख रहे हैं। फिर यदि हम सुखकी अभिलाषा करें तो क्या यह हमारी निरी धृष्टता नहीं है? भगवदीय लीलासुधाका आस्वादन वास्तवमें जिन्होंने किया है, वे धन्य हैं और धन्य वे भी हैं, जो इस लीलासुधाके आस्वादनकी उत्कृष्ट अभिलाषा रखे हुए हैं और तत्प्राप्त्यर्थ सचेष्ट हैं। संसारके नाना प्रकारके कल्मषोंको दूर करनेका इससे बढ़कर दूसरा उपाय ही क्या है? इसके लिये विशेष परिश्रमकी भी आवश्यकता नहीं है। भगवल्लीला 'श्रवणेनैव मंगलम्', केवल श्रवणमात्रसे मंगल देनेवाली है, कल्याणसाधक है, तीनों प्रकारके दैहिक, दैविक और भौतिक तापोंसे मुक्तिदायक है। पर यह श्रवण श्रद्धा और भक्तिके साथ होना चाहिये। यह नहीं कि एक कानसे अमृतमय उपदेश सुना और दूसरे कानसे निकाल दिया। अज्ञानजन्य मोहका सर्वथा परित्याग करके ही प्राणी इस लीलासुधाका मधुर पान कर सकता है। अज्ञानजन्य मोहसे मन अस्थिर होता है। मनकी अस्थिरता ही भयका कारण है और मनकी अस्थिरताका कारण है सत्त्वगुणका अभाव। अतः ये दोनों लक्ष्यप्राप्तिमें बाधक हैं। सत्त्वगुणकी जिससे वृद्धि हो और रज, तम शान्त हों, वही प्रयत्न मनुष्यको करना चाहिये। फिर जहाँ, जिस दशा और जिस स्थानमें हों, श्रीमानोंद्वारा प्रसारित भगवदीय लीला-सुखका अनुभव हो सकता है। भगवान्‌के चरण निर्भयके स्थान हैं। इनकी प्राप्ति सत्कथा-श्रवण, मनन, निदिध्यासन

६४४ भक्तिसुधा और अहर्निश भगवद्भजनसे होती है। 'श्रीमद्भागवत' का एक श्लोक है— स वेद धातुः पदवीं परस्य दुरन्तवीर्यस्य रथाङ्गपाणेः। योऽमायया संततयानुवृत्त्या भजेत तत्पादसरोजगन्धम्॥ (श्रीमद्भा० १।३।३८) अर्थात् परमपिता, परमात्मा, अमितविक्रम, श्रीसुदर्शनचक्रधारी भगवान्‌के चरण उसीको प्राप्त होते हैं, जो निष्कपट होकर सतत भगवान्‌में अपने चित्तको लगाकर उनके चरणकमलोंका गन्ध-सेवन करता है अर्थात् उन्हें भजता है। भवभयसे पार करनेवाली नौका बस एकमात्र यही है। प्राणी द्वन्द्वधर्मसे विवर्जित होकर अर्थात् संसारके राग-द्वेष, शोक-मोह आदि जितने कल्मष हैं, सबका त्यागकर भगवदीय लीला-सुधा- समास्वादनका अधिकारी हो सकता है। बाह्य विषयोंके सुखसे मलिन मतिवालोंके लिये लीलासुख नीरस ही लगता है। स्त्रीसमुपभोगजन्य सौख्यतक इस लीलासुखके सामने कुछ नहीं है। वास्तविक सुखके स्वरूपको जिसने समझा है, उसपर जिसने विचार एवं मनन किया है, वही व्यक्ति यह बतला सकता है कि भगवदीय लीलाके माधुर्य रस-सुस्वादमें क्या आनन्द आता है। अनभिज्ञ लोगोंका तो कहना है कि ब्रह्मसुख कुछ है ही नहीं, मरकर गधे आदि भी होकर ऐहिक सुख भोगना वे पसन्द करते हैं, पर निर्विषयक मोक्ष उन्हें पसन्द नहीं। ब्रह्मसुख किसीमें नहीं है, यह एक हास्यास्पद बात है। अनभिज्ञ लोग अविद्याके कारण सौषुप्त सुखको ब्रह्मसुखसे अधिक तो मानते हैं, पर यदि उनकी वह अविद्या हट जाय, उनका हृदयपटल बाह्य सौख्य वासनासे वासित न हो तो उन्हें मालूम हो कि ब्रह्मसुखसे वास्तवमें कितना आनन्द आता है। लोमड़ीको जब अंगूर बार-बार छलांगें भरनेपर भी नहीं मिले तो उसने झट कह दिया कि 'अंगूर तो खट्टे हैं'। इसी तरह ब्रह्मसुखका सुस्वाद जिन अनभिज्ञोंको प्राप्त नहीं होता, वे ही कहते हैं कि इसमें कोई तत्त्व नहीं, कोई आनन्द नहीं। ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है वास्तवमें ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है। सुसौख्य और परमानन्दकी प्राप्ति ब्रह्मसुखके अनुभवसे ही होती है। चैतन्यान्दात्मकसौख्य मृत्युपरिगृहीत प्राणियोंको प्राप्त करनेका प्रयत्न सदैव करते रहना चाहिये, पर पहले कलुषित मतिको विशुद्धातिविशुद्ध बनाना होगा; क्योंकि अमृतत्वकी प्राप्तिकी आशा अपनी मतिको विमल बनाये बिना नहीं की जा सकती। भौतिक धनोंका मोह त्यागकर पारमार्थिक धनका चिन्तन होगा। अन्तःकरणको सभी विकारोंसे रहित करना होगा। इसके बाद भगवदीय लीलाकथा-श्रवणमें मन लगेगा और वही कथा-श्रवण सर्वस्व-समर्पण करायेगा, ब्रह्मप्राप्ति करा देगा और नित्य, शुद्ध, बुद्ध, पूर्ण, निर्विकार, निर्विशेष चैतन्यान्दघनके माधुर्यको हमारे समक्ष पानके लिये उपस्थित करेगा। कथा-श्रवणद्वारा कर्मरन्ध्रसे भगवान् अन्तस्तलमें प्रविष्ट होते हैं। पूर्णब्रह्म चैतन्यान्द परमात्मा सबमें हैं। स्थावर- जंगम सभी प्राणियोंमें उनकी अवस्थिति है। पर हम सब जीव अज्ञानमें पड़े हुए उनकी अवस्थितिको स्वीकार नहीं करते, इसलिये उनको समझनेके लिये भगवदीय कथा-श्रवणका महर्षियोंने आदेश किया है। कथाका श्रवण भी करना चाहिये और उसे प्रदान भी करना चाहिये। दोनों हाथमें लड्डू है। इसका फल परोक्ष नहीं, साक्षात् होता है। कथा-श्रवण एवं उसका प्रदान साक्षात् सुखका प्रभाव दिखलाता है। पर जिनका मन रजस्तमोलेशसे अव्याप्त है, अन्तःकरण शुद्ध है, उन्हींको हरि-कथा सुनने एवं सुनानेका अधिकार है, अन्योंको नहीं। विघ्नकारक तमोलेश- सुसम्पादित मूढ़ता, रजोलेश-सम्पादित धीरतासे लीलासुधासमास्वादन नहीं हो सकता। जिस पिपीलिकाके मुखमें लवणकण वर्तमान है, उसे भला मिसरीके माधुर्यका अनुभव कैसे हो सकता है? वैसे ही मनको घोर मूढ़तारूप लवणकणके रहते शुद्ध नहीं किया जा सकता और जब मन शुद्ध नहीं है, तब फिर