भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३२ भक्तिसुधा जड़भरत आदि भगवान्के स्मरणमें संलग्न थे, दुर्देववश उन्हें मृगशावकमें राग हो गया, इसी कारण वे जन्मान्तरमें मृग हो गये तथापि भगवत्स्मरणके प्रभावसे तत्त्व-साक्षात्कारसम्पन्न होकर अन्तमें सद्गतिके ही भागी हुए। अनन्य भगवत्परायणताका एक दृष्टान्त इसी तरह 'पद्मपुराण' में एक भद्रतनु नामक व्यक्तिकी कथा आती है। वह यद्यपि जन्मान्तरका परम तपस्वी और भगवत्परायण था तथापि किसी दुर्देवके योगसे वेश्यागामी हो गया। एक दिन उसके पिताका श्राद्ध था। उसकी साध्वी धर्मपत्नीने कहा कि 'आज आप अवश्य नियमसे रहें; क्योंकि पिताका श्राद्ध है।' परंतु उससे न रहा गया और वह रात्रिके समय वेश्याके पास जा पहुँचा और अपने उत्कट प्रेमकी कथा कह सुनायी। वेश्याने खिन्न होकर उसे बहुत ही तिरस्कृत किया और कहा कि 'जब आप इतनी नीच प्रकृतिके हैं कि अपने पिताके लिये भी साधारण-सा नियम-पालन नहीं कर सकते तो हमारे लिये आप क्या कर सकते हैं? आप चले जाइये।' वेश्याके इन वचनोंको सुनकर भद्रतनुको ग्लानि हुई और वह उसे गुरु मानकर वहाँसे चल पड़ा। महात्मा मार्कण्डेय वहीं तप कर रहे थे, उनसे जाकर उसने अपनी सारी सत्य स्थिति कही। महात्माने कहा—'अब घबड़ाओ नहीं, तुम्हारा कल्याण होनेहीवाला है। मुझे तो समय नहीं है, तुम यहाँसे समीप ही महात्मा दान्त रहते हैं, उनके पास चले जाओ।' वह गया और महात्मासे अपनी स्थिति बतलायी। महात्माने उसे भगवान्की उपासना बतलायी। वह बड़ी तत्परतासे भगवान्की उपासनामें लग गया। बहुत ही थोड़े दिनोंमें भगवान् प्रत्यक्ष हुए और प्रसन्न होकर उन्होंने उसके सब पापोंको नष्ट कर दिया और उसे अपना मित्र बना लिया। फिर भी उसे दिनोंदिन दुर्बल होते देखकर भगवान्ने कहा—'मित्र! तुम दिनोंदिन दुर्बल क्यों हो रहे हो? देखो, तुम हमारे मित्र होकर फिर चिन्तित क्यों हो?' उसने कहा— 'भगवन्! मुझे हर समय डर लगा रहता है कि मुझसे कहीं कोई ऐसा अपराध न बन जाय कि प्रभुकी मैत्रीसे मैं वंचित हो जाऊँ।' भगवान्ने कहा—'मित्र! मेरी मैत्री ऐसी चंचल नहीं होती। मैं जिससे मैत्री जोड़ता हूँ, उससे अटल मैत्री रखता हूँ, अतः तुम निश्चिन्त रहो और खूब निश्चिन्तताके साथ भूषण-वसन-अलंकारसे विभूषित, सुसज्जित एवं अलंकृत होकर रहो। यहाँतक कि तुम्हें मैं अपने समान ही पीताम्बर, कटक, मुकुट, कुण्डलादि प्रदान करता हूँ, तुम सर्वथा निश्चिन्त होकर मेरे समान ही रहा करो।' उसने प्रभुकी आज्ञा शिरोधार्य की और प्रसन्नताके साथ रहने लगा। अधिक साजबाजके साथ रहते देखकर गुरुने एक दिन कहा कि 'भाई! तुम कैसे हो गये? क्या फिर अपने पूर्वरूपपर ही आ गये?' उसने कहा— 'गुरुदेव! आपने जिसका भजन बतलाया है, यह सब उसीके आदेशानुसार हो रहा है।' गुरुदेवको आश्चर्य हुआ कि मैं तो सहस्रों वर्षोंसे तप कर रहा हूँ, मुझे भगवान्के दर्शनतक न हुए, इसे इतनी शीघ्रतासे भगवान् कैसे मिल गये? दान्तने कहा— 'अच्छा, हमें भी मिलाओ।' भद्रतनुने कहा—'बहुत अच्छा।' भगवान्से मिलते ही उसने कहा—'भगवन्! अब तो हमारे गुरुदेवसे भी आपको मिलना पड़ेगा।' भगवान्ने कहा—'मित्र! तुमने जन्मान्तरोंमें मेरी प्राप्तिके लिये बड़ी तपस्या की थी, केवल इतना कामप्रतिबन्ध ही अवशिष्ट था, उसके मिटते ही मैं शीघ्र ही तुम्हें मिल गया, परंतु तुम्हारे गुरुदेवको तो अभी बहुत जन्मोंतक तपस्या करनी पड़ेगी।' भद्रतनुने कहा—'भगवन्! आपको मेरी प्रसन्नताके लिये यह कार्य तो करना ही पड़ेगा।' भगवान्ने कहा— 'अच्छा, तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मैं तुम्हारे गुरुदेवसे मिलूँगा, तुम उन्हें ले आओ।' बस इस तरह प्रभुकी विशेष कृपासे दान्तको भी भगवान्का दर्शन मिला। कथानकका आशय यही है कि किसी भी