भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 643

भगवान्‌का अवलम्बन अनिवार्य ६३३ स्थितिमें प्राणी भगवान्‌के चरणोंमें जाकर सदाचारी बनकर भगवान्‌को प्राप्त कर लेता है, अतः प्राणीको चाहिये कि वह हर तरहसे प्रभुके शरण हो। अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। (गीता ९।३०-३१) कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥ (रा०च०मा० ५।४४।१) सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥ (रा०च०मा० ५।३९।७) तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥ (रा०च०मा० २।२९९।३) इत्यादि वचन उपर्युक्त भावोंका ही पोषण करते हैं। भगवान्‌का अवलम्बन अनिवार्य ईश्वरका अभिव्यंजक शास्त्र है। शास्त्रोंपर विश्वास करके एवं समुचित ढंगसे उनका अध्ययन करके उनके अनुसार अनुष्ठान करना और परात्पर, पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्मकी उपासना करना यही कल्याणका मार्ग है। 'गीता' भी यही कहती है कि प्राणी स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ही अभ्युदय, निःश्रेयस, परमगति प्राप्त कर सकता है। इसीलिये हमें अपनी समस्त चेष्टाओं एवं हलचलोंको शास्त्रोक्त बनानेकी कोशिश करनी चाहिये। हमारा राजनैतिक, सामाजिक, राष्ट्रीय जो भी कार्य हो, वह शास्त्रोक्त ढंगसे होना चाहिये। लोग कहते हैं कि आप तो सब जगह धर्मका अड़ंगा लगाते हैं, पर किया क्या जाय? जो हलचलें शास्त्रविरुद्ध मालूम पड़ें, वे पाप एवं सर्वथा त्याज्य हैं। शास्त्रोक्त धर्मके समाश्रयणसे ही आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक सब प्रकारकी उन्नति एवं सुख-शान्ति प्राप्त हो सकती है। आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक सभी प्रकारके सामूहिक- वैयक्तिक लाभ उसी धर्मसे सम्भव हैं। प्राचीन, अर्वाचीन किसी भी कालमें जो शक्तिशाली, प्रभावशाली, मेधावी, स्मृतिसम्पन्न, नीतिशील, कवि और ज्ञानी हुए हैं, उनका मूल कारण तपस्या, स्वधर्मानुष्ठान और ईश्वराराधन ही है। बिना इसके विशेषता नहीं आ सकती। ऐसा भी देखा जाता है कि पहले तो तपस्या, स्वधर्मानुष्ठान और वर्तमानमें वैषयिक आसक्ति एवं अधर्माचरण। प्राणी जब पददलित, अपमानित एवं दुःखी होता है, तब उसको ईश्वर, धर्म और न्यायकी याद आती है। इसीलिये शास्त्रोंमें अपमानकी, विपत्तिकी बड़ी महिमा बतलायी गयी है। विविध सुख-सम्पत्ति और ऐश्वर्यमें फँसकर प्राणी अपने प्रियतम प्रेमास्पद भगवान्‌को भूल जाता है। यदि सावधान रहे, ईश्वर, धर्म, न्यायको न भूले तो फिर वह बड़ी ऊँची स्थितिको प्राप्त कर सकता है। 'गीता' में बतलाया गया है कि कुछ लोग भगवत्प्राप्तिके लिये; भगवान्‌की दिव्यातिदिव्य, देदीप्यमान, स्निग्ध, सुन्दर, कमनीय, कान्तिमयी मनोहारिणी मूर्तिको अवलोकन करनेके लिये; प्रभुके सुमधुर अधरसुधा-रसका पान करनेके लिये; उनकी अमृतमयी, मृतकजियावनी गिराका श्रवण करनेके लिये एवं प्रभुके अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य, सौगन्ध्य, सौरस्यपरिपूर्ण मंगलमय श्रीपादारविन्द-मकरन्द-रसका समास्वादन करनेके लिये शम, दम, नियम, जप, तप, यज्ञ, योगादिका अनुष्ठान करते हैं, किंतु बिना सिद्धि प्राप्त किये ही मृत्युके शिकार बन जाते हैं, उनकी क्या दशा होती है? इस सम्बन्धमें भगवान् उनकी दो प्रकारकी गति बतलाते हैं—एक तो यह कि विरक्त, तपस्वी, ब्रह्मनिष्ठ श्रीमान्‌के घर उनका जन्म होता है और पूर्वसाधनानुसार श्रवण, मनन, निदिध्यासनद्वारा भगवान्‌के अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश,