भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 644

६३४ भक्तिसुधा सद्रूप, बोधस्वरूप, कूटस्थ, असंग, निरवयव, निर्विकार, एकरस परमतत्त्वका साक्षात्कार कर लेते हैं। दूसरी यह कि धन-जन-शक्तिसम्पन्न उत्तम कुलमें उनका जन्म तो होता है, परंतु इस मायामय संसारमें, माया-मोहके सूचीभेद्य तिमिर-किरणमें पड़कर पुत्र, परिजन एवं अगणित धन-सम्पत्तिकी आसक्तिमें फँसकर, प्रभुत्व और प्रतिष्ठाके घमण्डमें चकनाचूर होकर, संगमरमरके सुधाधवलित, गगनभेदी, सुरम्य सौधोंकी बाह्य चमचमाहटमें अन्धा होकर एवं मायाकी मूलभूता ममताकी मूर्ति जायाकी छायामें शीतलताका अनुभव करता है और इस प्रकार श्रवणमात्ररमणीय, मृगतृष्णिकोदक सांसारिक क्षुद्र वासनाओंके चंगुलमें पड़कर वैषयिक क्षुद्र आनन्द- बिन्दुओंसे प्रचण्ड कामानलके प्रशमनमें व्यग्र होकर अतृप्ति और असफलताका बोध करते हुए अपने लाखों मित्रोंके सहित मरकर नरकका असह्य दुःख झेलता है। स्वधर्मानुष्ठानसे कल्याणकी प्राप्ति शास्त्रपर विश्वास करके यदि हम स्वधर्मानुष्ठान करें तो ऐसा कोई भी दुर्घट पदार्थ नहीं, जिसे हम प्राप्त न कर सकें। इस समय राष्ट्रोद्धारका मुख्य प्रश्न सामने उपस्थित है। उसके लिये यदि हम कुछ नहीं कर सकते तो भी ईश्वराराधन कर ही सकते हैं। जबकि इस समय हमारे पास अस्त्रबल नहीं, शस्त्रबल नहीं, बाहुबल नहीं, संगठनबल नहीं, बुद्धिबल नहीं, ऐसी परिस्थितिमें तर्क-वितर्कोंको दूर फेंककर दत्तचित होकर सबको ईश्वराराधन करना चाहिये। हम यह नहीं कह सकते कि अन्य साधनोंका उपयोग न किया जाय, किंतु जब अन्य साधन पासमें नहीं, तब आखिर किया ही क्या जाय ? साथ ही बात यह है कि यह सबसे हो भी नहीं सकता, घरमें आग लगी हो और हम मन्दिरमें बैठकर माला फेरें, दुर्गापाठ करें, यह सबसे नहीं हो सकता। हो भी सकता है, पर इसके लिये अटल विश्वासकी आवश्यकता है। पुरुषोत्तम, परब्रह्म, सर्वान्तरात्मा भगवान्‌में पूर्ण विश्वासवाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। भगवान् उसकी सहायता अवश्य करते हैं, पर साधारण स्थितिवालोंके लिये तो 'मामनुस्मर युध्य च' (गीता ८।७)-का ही मार्ग सर्वोत्तम जान पड़ता है। हाँ, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्‌को ही अनन्यगति समझते हैं। भगवत्पादपंकजमें उनका मनोमिलिन्द अहर्निश आसक्त रहता है। वे ही प्रभुके भरोसे अनन्य निश्चिन्त रहते हैं। जो दशा पुत्रवत्सला माँकि उत्संगलालित शिशुकी है, वही दशा भगवत्पादारविन्दानुरागियोंकी भी है और वे ही घरमें आग लगनेपर भी निश्चिन्त होकर माला लेकर बैठ सकते हैं। भक्तवत्सल भगवान् अपने ऐसे विश्वासी भक्तोंका योग-क्षेम स्वयं वहन करते हैं। तभी तो भगवान् किसीके घर पानी भरते और किसीका छप्पर छवाते देखे गये हैं। करें ही क्या ? ठहरे तो भक्तभावनापराधीन ही न, भक्तवांछाकल्पतरु ही न। यदि हम साधनसम्पन्न हों तो भी भगवान्‌से विमुख न होकर ही हमें प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि 'राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥' (रा०च०मा० ५।२३।५) जिस सरिताका कोई उद्गमस्थान नहीं, वह शीघ्र ही सूख जाती है। इसलिये यदि चाहते हों कि हमारी स्थायी उन्नति हो, साम्राज्य, स्वराज्य आदि मिले, लौकिक अभ्युदय हो और साथ ही अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायक भगवान् भी मिलें तो हमें भगवच्चरणोंका सहारा लेना पड़ेगा, भगवद्भक्त बनना ही होगा।