भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेमतत्त्व ६३५ प्रेमतत्त्व अन्तःकरणकी सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है प्रेमतत्त्वको रसिक लोग 'मूकरसास्वादनवत्' कहते हैं। कोई तो आन्तर मधुर वेदनाको ही 'प्रेम' कहते हैं। कोई स्नेहात्मक अन्तःकरणकी वृत्तिको ही प्रेम कहते हैं। यद्यपि वधू आदिमें 'राग', यागादिमें 'श्रद्धा', गुरु आदिमें 'भक्ति' तथा सुखादिकी इच्छा— ये सभी प्रेमके ही रूप हैं तथापि सुखमात्रका अनुवर्तन करनेवाली अन्तःकरणकी सात्त्विकी वृत्ति ही प्रेम है। यह प्राप्त, अप्राप्त और नष्टमें भी रहती है। इच्छा नष्ट और प्राप्तमें नहीं होती। प्रेमरसज्ञ लोग रसस्वरूप परमात्माको ही प्रेम कहते हैं। इसीलिये द्रवीभूत अन्तःकरणपर अभिव्यक्त रसस्वरूप परमात्मा ही प्रेमके रूपमें प्रकट होता है। अतएव आचार्योंने कहा है— भगवान् परमानन्दस्वरूपः स्वयमेव हि। मनोगतस्तदाकाररसतामेति पुष्कलम् ॥