भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 646

६३६ भक्तिसुधा अर्थात् जिसके हृदयकी प्रणय-रशनासे बँधे हुए भगवान् अपनेको न छुड़ा सकें, वही प्रधान भक्त है। कितने स्थलोंमें भक्त भगवान्‌से कहते हैं कि यदि आप हमारे हृदयसे निकल जायँ तो हम देखें आपकी सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकता। कहीं-कहीं भक्त भी हृदयसे भगवान्‌को निकालना चाहते हैं, भगवान्‌में दोषानुसन्धान करते हैं, परंतु असफल होते हैं— प्रत्याहृत्य मुनिः क्षणं विषयतो यस्मिन् मनो धित्सते बालासौ विषयेषु धित्सति ततः प्रत्याहरन्ती मनः। यस्य स्फूर्तिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं किल पश्य तस्य हृदयान्निष्क्रान्तिमाकाङ्क्षति॥ (विदग्धमाधव २।१७) अतएव कुछ लोग द्रवताको ही प्रेम कहते हैं। यद्यपि द्रवताकी अपेक्षा अवश्य है तथापि प्रेमका स्वयंस्वरूप द्रवता नहीं है, प्रेमका निजी रूप तो रसस्वरूप परमात्मा ही है। अतएव आचार्योंने उसे निरुपम सुखसंविद्रूप बतलाया है। जिस तरह सच्चिदानन्द ब्रह्म विश्वका कारण है, अतएव उसके सदंश, चिदंशकी सर्वत्र अनुवृत्ति दिखायी देती है। 'घटः सन्', 'पटः सन्' इत्यादि रूपसे सद्विशेष घटादि प्रपंचमें सत्‌की व्याप्ति है। वैसे ही 'आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि' (तैत्तिरीय० ३।६)-के अनुसार आनन्दरससे ही सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है, अतएव सर्वत्र उसकी अनुवृत्ति या व्याप्ति होनी चाहिये। इसीलिये हर एक जन्तुमें, हर एक परमाणुमें आनन्द, रस या रसस्वरूपभूत प्रेमकी भी व्याप्ति है। बिना प्रेम या रसके एक-दूसरेसे मिलना नहीं हो सकता। पुत्र, कलत्र, मित्र आदिका मिलन भी रस या स्नेहसे है। पशु-पक्षियोंमें, पिता-माता, पुत्र, पुत्रवधूमें प्रीति, स्नेह होता है। किं बहुना एक परमाणुका दूसरे परमाणुसे मिलना भी बिना स्नेहके नहीं हो सकता। इस तरह प्रेमतत्त्व आनन्द या रसस्वरूप होनेसे विश्वका कारण है, इसलिये उसकी व्याप्ति है। वह सर्वत्र और सबके पास है। उसका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् केवल सांसारिक वस्तुओंमें ही प्रेम करनेसे दुःख होता है। भगवान्‌में उसका सम्बन्ध जोड़ते ही सारा विश्व आनन्दमय, मंगलमय हो जाता है। इसीलिये प्रेमियोंने चाहा है कि संसारसे प्रेम हटकर भगवान्‌में ही हो जाय—'यह बिनती रघुबीर गुसाईं।' 'ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों होहिं सिमिटि इक ठाईं॥' (विनय-पत्रिका १०३) जैसे किसीके पास कोई दिव्यशक्तिसम्पन्न क्षेत्र हो, परंतु वह उसमें दौर्गन्ध्य-विष-कण्टकादिपूर्ण विष-वृक्षको लगाकर दौर्गन्ध्य-विष-कण्टकादिसे दुःख पाता है, यदि हिम्मत बाँधकर सावधानीसे उस विष-वृक्षको काटकर सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य, सौगन्ध्यपूर्ण आम्रवृक्ष या कल्पवृक्षको लगाये तो अवश्य सुखी हो जाय। ठीक वैसे ही प्रेमको संसारके साथ जोड़कर प्रेममें लौकिक भावोंको जोड़कर प्राणी दुःखी होता है, प्रेमके साथ भगवान्‌का सम्बन्ध जोड़ते ही सर्वत्र आनन्द-ही-आनन्द हो जाता है। जैसे कोई कल्याणमयी, करुणामयी पुत्रवत्सला अम्बा अपने शिशुको कहीं भेजती हुई उसे ऐसा पाथेय अवश्य प्रदान करती है, जिसके सहारे वह पुनः अपनी अम्बाके पास आ जाय, यदि ऐसा न ध्यान रखे तो उसे 'करुणामयी' नहीं कहा जा सकेगा। वैसे ही अनन्तब्रह्माण्डजननी कृष्णाभिधाना माँने भी जीवोंको प्रेमतत्त्व साथमें ही दे रखा है। उसे भूल जानेसे या उसका दुरुपयोग करनेसे जीव दुःख पाता है। परंतु उसको यादकर, उसका सदुपयोग करते ही अर्थात् गुरुजनों, शास्त्रों एवं भगवान्‌में प्रेमका उपयोग करनेसे जीव कृतकृत्य होकर अपनी कृष्णाभिधाना माँके अंक (गोद)-में जा पहुँचता है, सर्वदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है। भगवान् ही प्रेमके उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप हैं कहा जा सकता है कि यदि रस, प्रेम और भगवान् एक हैं और नित्य सिद्ध ही हैं तो भगवान्‌में प्रेमको 'प्रेम' और अन्य प्रेमास्पदमें विषय- विषयीभाव-कल्पनाकी क्या अपेक्षा है? इससे तो