भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमालूम पड़ता है कि प्रेमके लिये भेदभावकी ही अपेक्षा है। बिना दोके प्रेम नहीं होता, अतएव प्रेम और भगवान् भी दो वस्तु होनी चाहिये। परंतु गम्भीरतासे विवेचन करें तो मालूम होगा कि आरम्भकालमें औपाधिक प्रेमके लिये अवश्य ही दोकी अपेक्षा किंवा अभिव्यक्तिके लिये साधनकी अपेक्षा है, परंतु स्वभावतः प्रेम अभेदमें या अत्यन्त सन्निहित प्रत्यगात्मामें ही होता है और वह स्वतःसिद्ध भी है। जैसे स्वप्रकाश ब्रह्मके प्राकट्यार्थ भी महावाक्यजन्य परब्रह्माकाराकारित वृत्तिकी अपेक्षा होती है, वैसे ही भगवत्स्वरूप, स्वतःसिद्ध प्रेमके भी प्राकट्यके लिये भगवदाकाराकारित स्निग्ध मानसी वृत्ति अपेक्षित है। उस प्राकट्यके लिये ही सद्धर्म, सत्कर्म आदि साधनोंकी अपेक्षा है। प्राकट्य-भेदसे ही उसके अणु, मध्यम, महत् एवं परममहत्परिमाण- भेदसे अनेक भेद भी होते हैं। साधनकालमें ही भेदभावकी अपेक्षा होती है। अज्ञानके कारण ही भगवान्में प्रेम न होकर विश्वमें होता है। या यों समझिये कि नीरस, निःसार संसारमें रसस्वरूप भगवान्के सम्बन्धसे ही सरसताकी प्रतीति होती है, अतः सरसत्वेन प्रतीयमान विश्वमें प्रेम होता है। जैसे प्रकाशकी अन्यत्र सातिशयता और व्यभिचारिता होनेपर भी सूर्यमें उसका व्यभिचार या सातिशयता सम्भव नहीं है, वैसे ही अन्यत्र प्रेमका व्यभिचार और सातिशयता देखी जाती है, परंतु भगवान्में व्यभिचार और सातिशयता नहीं है। पुत्र, कलत्रादिकोंसे कभी प्रेम, कभी बैर भी हो जाता है, कभी प्रेमकी कमी, कभी अधिकता हो जाती है, परंतु भगवान्में वह सदा होता है और सर्वदा निरतिशय होता है; क्योंकि जैसे सूर्य प्रकाशके उद्गम-स्थान या प्रकाशस्वरूप ही हैं, वैसे ही भगवान् भी प्रेमके उद्गम-स्थान किंवा प्रेमस्वरूप ही हैं। कहा जाता है कि भगवान् और उनमें प्रेम प्रत्यक्ष नहीं है, फिर भगवान्में अव्यभिचारी और निरतिशय प्रेम या उन्हें प्रेमस्वरूप कैसे माना जाय? परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि भगवान् सर्वप्रकाशक, अखण्ड बोधरूपसे, प्रत्यगात्मारूपसे प्रसिद्ध हैं। अतएव उनमें प्रेम भी प्रसिद्ध है। केवल अनिर्वचनीय आवरण मिटानेके लिये ही कुछ प्रयत्नोंकी अपेक्षा है। विज्ञानसे सारी वस्तुओंका व्यवहार होता है। सम्पूर्ण वस्तु, सम्पूर्ण व्यवहार बोधसे ही प्रकाशित होता है। फिर बोधमें क्या सन्देह? 'जगत प्रकास्य प्रकासक रामू' (रा०च०मा० १।११७।७)। जैसे दर्पणदर्शनके पश्चात् तदन्तर्गत प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, वैसे ही बोधमानके पश्चात् ही विश्व या उसकी वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं—'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।' (कठ० २।२।१५; मुण्डक० २।२।१०; श्वेताश्वतर० ६।१४) जैसे तरंग व्यामोहसे ही कह सकती है कि 'जल कहाँ है? जो कुछ है, मैं ही हूँ' वैसे ही जीव व्यामोहसे ही कह सकता है कि 'भगवान् कहाँ? जो कुछ है मैं ही हूँ।' जैसे तरंगके भीतर, बाहर, मध्यमें, किं बहुना तरंगका अस्तित्व ही जलपर निर्भर है, वैसे ही सम्पूर्ण जगत्में, विशेषतः जीवमें, उसके भीतर, बाहर, मध्यमें सर्वत्र भगवान् ही हैं। वस्तुतः सम्पूर्ण विश्व या जीव भगवान्की सत्तासे ही सत्तावाले हैं, उनका पृथक् अस्तित्व ही नहीं है। प्राणीको अपने प्राणोंमें, सुखमें, अपनी आत्मामें स्वाभाविक प्रेम होता है, भगवान् तो प्राणोंके प्राण, सुखके सुख और जीवोंके भी जीवन हैं। फिर उनमें प्रेम स्वाभाविक क्यों न हो? इसीलिये तो महर्षि वाल्मीकि कहते हैं—'लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः॥' (वाल्मीकीय० २।३७।३२) अर्थात् लोकमें कोई भी जन्तु या कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो रामका भक्त न हो। वसिष्ठजी कहते हैं—'प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह