भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥' (रा०च०मा० २।२९०) अर्थात् हे तात! राघवेन्द्र रामभद्र! तुम्हीं तो प्राणोंके प्राण, आत्माके आत्मा और सुखके भी सुख हो। प्राणसे या अपानसे प्राणी नहीं जीता, किन्तु प्राणीमें प्राणन शक्ति देनेवाला प्राणका भी प्राण भगवान् ही सबको जिलाता है। फिर तुमको छोड़कर जगत् किसे अच्छा लगे? इस दृष्टिसे रावणादि भी रामके भक्त ही हैं। भला, अपनी सत्ताका कौन विरोधी होगा? नास्तिक भी अपनी और अपने सिद्धान्तकी सत्ताका बाध या अपलाप नहीं चाहता या करता। हर एक व्यक्तिका निश्चय है कि और कुछ हो या नहीं, रहे या न रहे, मैं तो हूँ ही, मैं तो रहूँ ही। जैसे जलके बिना तरंग क्षणभर भी टिक ही नहीं सकती, वैसे ही सत्ताके बिना सम्पूर्ण पदार्थ असत् हो जाते हैं। सत्, चित्, आनन्द रसस्वरूप भगवान्के बिना सब निःस्फूर्ति, नीरस, निरानन्द, किं बहुना असत् हो जाते हैं। उनके योगसे ही—आध्यात्मिक सम्बन्धसे ही— स्फूर्तिमत्ता, सरसता, सानन्दता और अस्तित्व सिद्ध होता है। अतः उनका अमंगलमय वियोग किसे सह्य होगा? जैसे गुड़के सम्बन्धसे नीरस बेसनमें मिठास आती है, वैसे ही 'स्व' के सम्बन्धसे—अपनेपनके सम्बन्धसे वस्तुओंमें प्रीति होती है। अपनेपनके बिना कट्टर वैष्णवोंको भगवान् शिवमें और शैवोंको विष्णुमें भी प्रेम नहीं होता। अनन्तब्रह्माण्डनायक भगवान्के ही जिस रूपमें अपनापन, अपना उपास्यभाव होता है, उसीमें प्रेम होता है। जिसमें उपास्यबुद्धि, इष्टबुद्धि नहीं, जिसमें अपनापन नहीं, उसमें प्रेम भी नहीं। अपनापन होनेसे अपने क्षेत्र, वृक्ष, बागके काँटोंमें भी प्रेम होता है, उनके नष्ट होनेमें कष्ट होता है। जिस अपनेपनके बिना ब्रह्म भी नीरस, जिस अपनेपनके सम्बन्धसे कण्टकादिमें भी प्रेम, साक्षात् उस अपनेमें, 'स्व' में प्राणीका कितना प्रेम हो सकता है? इसीलिये भगवान् प्राणके प्राण, आत्माके आत्मा, सुखके सुख, प्रत्यक्ष स्वात्मा हैं, अतएव प्रेम या रसस्वरूप ही हैं। जो वस्तु जितनी अप्रत्यक्ष, दूर और अपनेसे भिन्न है, उसमें उतनी ही प्रेमकी कमी होती है। क्षेत्र, मित्र, पुत्र, कलत्र आदिमें दूरस्थ, अप्रत्यक्ष तत्त्वोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम होता है। क्षेत्रादिकी अपेक्षा देहादिमें अधिक प्रेम होता है। देहविरुद्ध होनेसे उन सबका ही त्याग किया जाता है; क्योंकि उनकी अपेक्षा देह सन्निहित एवं प्रत्यक्ष है। देहसे भी इन्द्रियाँ, प्राण अन्तरंग हैं, अतः उनमें प्रेम अधिक होता है। मन उनमें भी समीप है, अतः उसके प्रतिकूल या उसे दुःखदायी मालूम पड़नेपर देहादिका भी त्याग किया जाता है। बुद्धि, अहमर्थका भी निरोध आत्महितके लिये किया जाता है। 'यदा पञ्चाव- तिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति' (कठ० २।३।१०) इत्यादिसे मनोनाश, वासना-क्षयके लिये प्रयत्न प्रसिद्ध ही है। इस दृष्टिसे सर्वान्तरंग, सर्वसन्निहित, परम प्रत्यक्ष, प्रत्यगात्मस्वरूप ही भगवान् हैं। उन्हींमें मुख्य प्रेम और वही प्रेमस्वरूप भी हैं, उनसे भिन्नमें प्रेमकी कमी स्पष्ट है। आत्माके लिये ही सब कुछ होता है, देवतामें प्रीति भी आत्मकल्याणके लिये ही होती है, आत्मप्रतिकूल देवताकी उपेक्षा ही होती है। यदि भगवान् प्रत्यगात्मस्वरूप नहीं, तब तो भगवान् 'शेष' (अंग) हो जायँगे, भगवान्के लिये आत्मा नहीं, किंतु भगवान् आत्माके लिये समझे जायँगे, अतः भगवान् परोक्ष होनेसे अस्वप्रकाश समझे जायँगे, भगवान् अनात्मा होनेसे बहिरंग और शेष या अंग समझे जायँगे, यह सब अनर्थ है; क्योंकि सिद्धान्ततः वस्तुगत्या भगवान् ही सर्वान्तरंग, सर्वान्तरात्मा हैं, वे ही सर्वशेषी हैं, सब कुछ उनके लिये, वे किसीके लिये नहीं। भगवान् ही प्रत्यगात्मा होनेसे स्वप्रकाश हैं और वे ही शेषी हैं, वे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद हैं। इसीलिये तो जैसे सैन्धवखिल्य (सेंधानमकका