भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 649, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 649

प्रेमतत्त्व ६३९ टुकड़ा) अपने-आपको अपने उद्गम-स्थान समुद्रमें समर्पणकर समुद्ररूप हो जाता है, वैसे ही औपाधिक चैतन्यरूप जीवात्मा अपने उद्गम-स्थान परप्रेमास्पद भगवान्‌में आत्मसमर्पण करके भगवत्स्वरूप हो जाता है। जैसे घटाकाश घट और घटाकाश सबको ही महाकाशमें समर्पण कर देता है। जब आकाशसे ही वायु आदि-क्रमसे घट बना, उसीसे घटाकाशकी प्रतीति हुई, घट पृथिव्यादिमें लयक्रमेण आकाश हो गया, तब घटाकाश सुतरां आकाश हो गया, यही सच्चा आत्मसमर्पण है। वैसे ही जीवात्मा भगवान्‌से प्रादुर्भूत अपना सर्वस्व और अपने-आपको भगवान्‌में समर्पण करके सर्वदाके लिये सर्वशेषी, सर्वान्तरंग सर्वप्रेमास्पद, सर्वान्तरात्मस्वरूप हो जाता है। अपने मिथ्या, काल्पनिक भावका सर्वदाके लिये बाधकर पारमार्थिक रूपको प्राप्त कर लेता है— 'त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।' प्रेम

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 649, कुल 778 में से · BharatKosha