भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 650, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें६४० भक्तिसुधा भगवान् और प्रेम आत्मामें सर्वातिशायी प्रेम होता है प्रेमतत्त्वका प्राकट्य अधिकाधिक रूपमें वहाँ ही होता है, जहाँ जितना ही सन्निधान, जितनी ही अन्तरंगता, जितनी ही प्रत्यक्षता अधिक होती है। जहाँ सन्निधान आदिकी जितनी ही कमी, वहाँ उतनी ही प्रेममें भी कमी होती है। इसीलिये अत्यन्त सन्निहित, अत्यन्त अन्तरंग, अति प्रत्यक्ष प्रत्यगात्मामें ही प्रेम देखा जाता है। अन्तरात्मा अत्यन्त अभिन्नस्वात्मामें ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेम होता है। जब ब्रह्माने श्रीकृष्णके वत्स-वत्सपोंका अपहरण कर लिया, तब श्रीकृष्ण कौतुकवशात् स्वयं ही सब कुछ हो गये। गौओं और गोपालिकाओंको यद्यपि श्रीकृष्णदर्शन, स्पर्शनादि प्राप्त होता था तथापि नन्दरानीका सौभाग्य देखकर उन्हें लालसा होती थी कि व्रजेन्द्रगेहिनी जैसे अपने ललनको हृदयमें छिपाकर रखती हैं, बार-बार मस्तक सूँघकर मुखचन्द्रका चुम्बन करती हैं, वैसे ही हम भी करें। उनकी अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये ही श्रीकृष्ण अपने-आप ही बछड़ों और ग्वालबालोंके रूपमें हो गये। अब तो सभी गायों और वात्सल्यभाववती गोपियोंको कृष्ण ही पुत्रके रूपमें मिल गये। फिर तो उनके प्रेममें निःसीम वृद्धि हो गयी। अपराध हो जानेपर भी उन बालकोंपर पिता-माताको क्रोध नहीं होता था। उनको देखते ही क्रोध न जाने कहाँ भाग जाता था ! दूसरे नवीन सन्तानोंके उत्पन्न होनेपर भी गौओंको उनमें निःसीम प्रेम था। वे नये बछड़ोंकी परवाह न करके भी उन्हें ही दूध पिलाना चाहती थीं, प्रेममें विभोर होकर उन्हें सूँघती और चाटती थीं, मानो नेत्रों, घ्राणों और जिह्वासे सर्वदा पानकर हृदयमें रखना चाहती थीं। जो लोकोत्तर, निःसीम प्रीति उन गोपालिकाओंको कभी अपने बालकोंमें नहीं थी, वह अद्भुत प्रीति उन कृष्णात्मक वत्स-वत्सपोंमें हुई। इस विचित्र आश्चर्यमय चरित्रको श्रवणकर जब परीक्षित्ने उसका कारण पूछा, तब श्रीशुकदेवजीने यही कहा कि 'राजन् ! संसारमें प्राणिमात्रको अपने आत्मामें सर्वातिशायी प्रेम होता है; कलत्र, पुत्र, क्षेत्र, वित्त, मित्र आदिमें इतना प्रेम नहीं होता। देहात्मवादी भी जितना प्रेम देहमें करते हैं, उतना देहानुगामी वस्तुमें नहीं करते। अपत्य, वित्त, कलत्र आदिमें जो प्रेम होता है, वह केवल आत्मप्रेमका शेष ही है। वेद भी यही कहते हैं कि— 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) आत्माके लिये ही सम्पूर्ण वस्तुओंमें प्राणिमात्रको प्रेम होता है। देवताके कामके लिये प्राणीको देवतामें प्रेम नहीं होता, किंतु आत्माके लिये ही देवतामें भी प्रेम होता है। भगवान् भास्कर ब्राह्मणोंके इष्टदेव अत्यन्त प्रिय विश्वप्राण हैं, परंतु जब वे ही ग्रीष्ममें प्रतिकूल प्रतीत होते हैं, तब प्राणी उनकी आँखोंसे ओझल होना चाहता है। जिस देवतासे अपने मनोरथोंकी सिद्धि होती है, उसमें बड़ा ही स्नेह होता है। जिसकी उपासना आरम्भ करनेसे कुछ अनिष्ट होता है, उस देवतासे उपरति हो जाती है। इसीलिये मन्त्रोंमें भी अरि और मित्रादिकी कल्पना तान्त्रिकोंके यहाँ होती है। अतः आत्माके लिये ही संसारकी सारी वस्तु प्रिय है— यह लोक, वेद सर्वत्र ही प्रसिद्ध है। इस तरह आत्मा- सम्बन्धी प्रेम प्राणिमात्रमें प्रसिद्ध होनेसे ही कृष्णमें सब लोगोंको अधिक प्रेम हुआ; क्योंकि कृष्णचन्द्र प्राणिमात्रके अन्तरात्मा थे। वे ही अपनी अचिन्त्य, दिव्य लीला- शक्तिसे सगुण, साकार, अचिन्त्य, अनन्तकल्याण- गुणगण-समलंकृत, मनोहर रूपमें प्रकट हुए थे— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम् । जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) वस्तुतः स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण वस्तु श्रीकृष्णमात्र हैं, श्रीकृष्ण ही परम तत्त्व हैं, वे ही