भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवच्छरणागतिसे ही गति ६३१ भगवच्छरणागतिसे ही गति 'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥' (गीता ६।४१) इत्यादि शास्त्रवचनोंमें योगभ्रष्टकी चर्चा आती है। अर्जुनने प्रश्न किया कि— अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ (गीता ६।३७-३८) अर्थात् जो ब्रह्मके मार्गमें प्रतिष्ठित नहीं हो सका, योगसिद्धि बिना प्राप्त किये ही मर गया, उसकी क्या गति होती है ? यहाँ यही अभिप्राय है कि जो लोग कर्मसंन्यास करके कर्ममार्गको छोड़ चुके और ब्रह्मसाक्षात्कार-साधन श्रवणादिमें लगे हुए हैं, वे मरकर छिन्न बादलके समान नष्ट होते हैं या किसी तरह उनकी भी सद्गति होती है ? भगवान्ने कहा— 'पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।' (गीता ६।४०) पार्थ! इस लोक-परलोक कहीं भी उसका विनाश नहीं होता, 'न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥' (गीता ६।४०) हे तात! कल्याणके लिये प्रयत्न करनेवाला कोई प्राणी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता। उनमें उच्चकोटिके अधिकारी लोग तो जन्मान्तरमें पवित्र अध्यात्मनिष्ठ योगियोंके कुलमें जन्म ग्रहण करते हैं और वहाँ पूर्वाभ्यासवशात् पुनः योगाभ्यासमें लगकर शीघ्र ही सिद्धिको प्राप्त कर लेते हैं। कोई-कोई पवित्र श्रीमानोंके यहाँ जन्म ग्रहणकर धर्मानुष्ठान तथा सत्संगादि करके पुनः उच्चगतिको प्राप्त होते हैं। सारांश यही है कि जो कर्मादिका सहारा छोड़कर योग या ज्ञानके अभ्यासमें तल्लीन हो गये और पूर्ण सिद्धि या तत्त्वसाक्षात्कारसे पहले ही मृत हो गये, वे भी नष्ट नहीं होते, किंतु वे भी अच्छी ही गतिको प्राप्त होते हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि इतना ही नहीं, किंतु 'योगभ्रष्ट' का यह भी अर्थ है कि जो योगमार्गसे भ्रष्ट हो गया अर्थात् कामादि दोषोंसे अभिभूत होकर मायिक प्रपंचोंमें फँस गया, उसीकी छिन्नाभ्रवत् नष्ट होनेकी सम्भावना हो सकती है। जो सदाचारी एवं नियतमानस होकर श्रवणादिमें लगा रहता है, वह तो एक प्रकारके बड़े दिव्य पुण्यमें ही लगा रहता है। श्रद्धापूर्वक वेदान्तश्रवणसे प्रतिदिन अशीति (८०) कृच्छ्रचान्द्रायणका पुण्य शास्त्रोंमें कहा गया है। अनेक जन्मोंके अभ्याससे ही संसिद्धि प्राप्त होती है, यही गीताका भी अभिप्राय है— 'अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥' (गीता ६।४५) अर्जुनके प्रश्नसे भी यही मालूम होता है कि यह विकर्म-निमित्त योगभ्रंशको लेकर ही प्रश्न उठा है। शास्त्रोंने यही कहा है कि जो प्राणी स्वधर्मको छोड़कर भगवान्को भजने लगा, अपक्व होनेके कारण कथंचित् यदि वह गिर जाय तो भी किसी- न-किसी तरह उसका कल्याण हो ही जाता है। परन्तु जो भगवान्का स्मरण न करके कर्मानुष्ठानमें ही लगा है, वह तो कोई भी परमार्थ-लाभ नहीं कर सकता— त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरे- र्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि। यत्र क्व वाभद्रमभूदमूष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥ (श्रीमद्भा० १।५।१७) इसी तरह यह भी कहा गया है कि सर्वत्यागी भगवत्परायण पुरुषसे यदि कोई विकर्म हो जाय तो भी भगवत्स्मृति-परम्परासे उसकी निवृत्ति हो जाती है— स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥ (श्रीमद्भा० ११।५।४२)