भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 640, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें६३० भक्तिसुधा
देखनेतकको जी नहीं चाहता, ठीक वैसे ही इन जिज्ञासुओंको ऐन्द्र, माहेन्द्र एवं ब्राह्मपदपर्यन्तके समस्त वैभव विषवत्, वमनवत् प्रतीत होते हैं। वे वेदाध्ययन आदि करते हैं, किंतु भगवान्का भजन करते हुए। जो लोग ऐसा नहीं करते, वे उसी चीलके समान हैं, जो उड़ती तो आकाशमें है, पर दृष्टि रहती है उसकी नीचे। ये लोग भी उड़ते तो शास्त्रोंपर हैं, पर दृष्टि रहती है संसारपर, लक्ष्य रहता है क्षुद्र वैषयिक सुखोंकी प्राप्ति करना। अस्तु, जो लोग विवेक और ज्ञानके साथ भगवत्प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर ग्रन्थोंका अध्ययन नहीं करते, उनके लिये ग्रन्थ ग्रन्थिका ही काम करते हैं। ऐसे लोग भगवत्साक्षात्कार नहीं कर सकते। आर्त भक्त तीसरे प्रकारके भक्त हैं आर्त—गजेन्द्र, द्रौपदीकी तरह पीड़ित, सताये गये। अर्थार्थी भक्त चौथे भक्त हैं अर्थार्थी—विभीषणकी तरह। जिस समय विभीषण सर्वसौन्दर्याधार, अखण्डानन्द- भण्डार, परमसमुज्ज्वल, अतिसुन्दर, चिरमधुर रसमय भगवान्के पास आये, उस समय उन्होंने कहा— उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥ (रा०च०मा० ५।४९।६) फिर तत्क्षण कहने लगे कि— अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी। (रा०च०मा० ५।४९।७) इनमें एक भक्त ऐसे होते हैं, जो ज्ञान भी प्राप्त करना चाहते हैं, धन भी प्राप्त करना चाहते हैं और विपत्ति-निवारण भी करना चाहते हैं। यद्यपि ज्ञान प्राप्त करने, धन प्राप्त करने और विपत्ति-निवारण करनेका साधन उनके पास है तथापि वे भगवान्का भजन नहीं छोड़ते। जो अस्त्रबल, बाहुबल, बुद्धिबलके घमण्डमें आकर भगवान्को भूल जाते हैं, उनका मनोरथ मरुभूमिकी नदियोंकी तरह बीचमें ही सूख जाता है, सिद्धिसाफल्य मिलना तो दूर रहा। इसलिये अर्जुन जिस समय कृष्णचन्द्रकी पटरानियोंको लेकर लौट रहे थे, उस समय आभीरोंने उनको बाँसके खण्डोंसे पीट-पीटकर पटरानियोंको छीन लिया। वही शक्तिमान् अर्जुन और वही गाण्डीव धनुष, किंतु एक श्रीकृष्णके बिना उनके सारे साधन बेकार हो गये। अस्तु, कोई कितना ही शक्तिसम्पन्न क्यों न हो, भगवच्चरणोंका सहारा लेते हुए ही उसे चलना चाहिये। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो चाहते तो सब कुछ हैं, पर साधन एक भी नहीं। ऐसे लोगोंको भी निराश न होना चाहिये। शास्त्रोंने उनको भी आश्वासन दे रखा है—'सुने री मैंने निरबलके बल राम।' निष्काम अनन्यभक्त नरसीकी तरह जो साधनविहीन हैं, दीन-दुनियाका जिन्हें कुछ भी भरोसा नहीं, केवल भगवान्का सहारा है, ऐसे भक्तोंको भगवान् ऐसा प्रसन्न करते हैं कि वे निहाल हो जाते हैं। ऐसे भी भक्त होते हैं, जो चाहते सब कुछ हैं, पर साधन कुछ नहीं है और साथ ही भगवान्पर विश्वास भी नहीं है। ऐसे लोगोंके लिये भी शास्त्रोंमें निराशाका शब्द नहीं। उनके लिये शास्त्र कहते हैं कि भगवान्को पुकारो—'हे अशरण-शरण, हे अनाथनाथ, हे अकारण-करुण, हे करुणावरुणालय, हे प्रभो ! मैं आपको नहीं जानता। अपनेको नहीं जानता, आपके और अपने सम्बन्धको नहीं जानता। माया ठगिनीने मुझे खूब ठगा। मैं उन्मादी बन बैठा। तरंग, कटक, मुकुट, कुण्डल, घटाकाश जैसे घमण्ड करे कि मेरे अतिरिक्त जल नामकी कोई वस्तु नहीं, स्वर्ण नामकी कोई वस्तु नहीं और महाकाश नामकी कोई वस्तु ही नहीं है। ठीक इसी प्रकार भगवन्! मैं इतना उन्मादी बन बैठा कि कहने लगा, ईश्वर नामकी कोई वस्तु नहीं। हे नाथ ! अब आप ही कृपा करें कि मैं भाव- कुभाव जिस किसी तरहसे भी आपको पुकारूँ।'