भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विधा भजन्ते ६२१ कि उनका मन क्षुब्ध हो गया, उस सुगन्धकी ओर खिंच गया, उसपर मोहित हो गया और आनन्दसे उनको रोमांच हो आया— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसी मकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) यही दशा श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रका स्वरूप देखकर श्रीजनकजीकी हुई थी— मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥ (रा०च०मा० १।२१५।८) किसी प्रकार अपनेको विवेक, धैर्यसे सँभाला, परंतु पूछे बिना न रहा गया। श्रीविश्वामित्रके चरणोंमें प्रणाम किया और फिर गद्गद वाणीसे पूछने लगे— कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा ॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ (रा०च०मा० १।२१६।१-५) और भी देखिये, विवाहके समय जो दशा हुई— क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं। करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं ॥ (रा०च०मा० १।३२४। छंद ४) इत्यादि। सारांश यह है कि भजन करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। वे चाहते हैं कि कुछ समय भजन न करें, किन्तु उनके रोकनेपर भी उनका मन प्रभुकी नखमणि-चन्द्रिकाका चिन्तन करने लगता है, प्रभुके त्रिभुवनपावन, मंगलमय नामका उच्चारण करने लगता है। एक गोपांगना लीलाबिहारी, त्रिभुवन-कमनीय, योगीजनदुर्लभ, देवदेवप्रत्याशित, ऋषि-महर्षि-महापुरुष- चित्ताकर्षक, निखिल सौन्दर्य-माधुर्य-रसामृतसारभूत, आनन्दकन्द, व्रजेन्द्रनन्दन, मदनमोहन कृष्णचन्द्रके विरहजन्य तीव्रतापसे तापित होकर जमीनपर बेहोश पड़ी थी और एक दूसरी सखी उसके मुखपर गुलाबजलके छींटे दे-देकर धीरे-धीरे पंखा झल रही थी। इतनेमें ही एक तीसरी सखी आयी और जनमनहारी, बाँकेबिहारी, राधारमण, बाधाहरण नन्दनन्दनकी चर्चा करने लगी। त्यों ही दूसरी बोली—'हे सखी! उनकी चर्चा इस समय न छेड़। यदि अपनी प्रियसखीको इस समय विश्राम लेने देना चाहती है तो उनकी चर्चा भूलकर भी मत चला। कोई और चर्चा चलाकर माधवको इस समय भुला दे।' कैसी विचित्र दशा है? कोई तो इस आधि- व्याधिपूर्ण, शोकतापसंकुल, जन्ममृत्यु-संकीर्ण, आर्तनादके उद्भवस्थान, मृत्युके लीलाक्षेत्र, पापविद्ध संसारका विस्मरणकर भगवद्रसका आस्वादन करना अथवा प्रभुका स्मरण करना चाहते हैं, पर ऐसा होता नहीं और ये महाभागा गोपांगनाएँ नन्दनन्दनका किसी तरह विस्मरण करना चाहती हैं, पर ऐसा होता नहीं। इसी तरह ज्ञानी भी कई तरहके होते हैं। एक तो जड़भरतके समान जंगलोंमें उन्मत्त, प्रेमविभोर होकर इधर-उधर फिरनेवाले। लोकसंग्रही भी आत्माराम, आप्तकाम होते हैं, परंतु भगवान्की प्रेरणासे धर्मसंस्थापनमें लगे रहते हैं। व्यास परमज्ञानी होते हुए भी पुराणोंके निर्माणमें, शंकराचार्य परमज्ञानी होते हुए भी बौद्धोंके खण्डनमें लगे रहते थे। लोकसंग्रहीके सामने कठिनाइयाँ भी आती हैं; क्योंकि संसार कुत्तेकी पूँछके समान है। कुत्तेकी पूँछको कितना ही घी, तेल लगाकर बाँसकी नलीमें डालकर सीधा रखो, किंतु ज्यों ही बाँसकी नलीसे निकली, त्यों ही फिर टेढ़ी-की-टेढ़ी। इसलिये ऐसे ज्ञानियोंको पदे-पदे भगवान्का सहारा लेना पड़ता है। जिज्ञासु भक्त दूसरे प्रकारके भक्त होते हैं-जिज्ञासु-पूर्णविरक्त- 'रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥' (रा०च०मा० २।३२४।८) जैसे उत्तमोत्तम पदार्थोंको खाकर वमन कर दें तो उस ओर