भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२८ भक्तिसुधा अव्यपदेश्य, निराकार स्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं। महावाक्यजन्य परब्रह्माकारा वृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन, बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम-रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपनी हिंसा किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूः।' महर्षि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने स्नेहभरी दृष्टिसे श्रीरामचन्द्रको नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा—धिक्कार करती है— यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति॥ जैसे कमलनयन पुरुषके अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, यदि प्रभुके रूपदर्शनमें उनका उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्धभोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि व्यर्थ और नीरस ही रहे, यदि उन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ। इसीलिये श्रीब्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवालोंके नेत्रादि करणग्रामोंकी सार्थकता और इनका चरम फल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्षपातसे युक्त, वेणुचुम्बित, अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका निर्निमेष नयनोंसे पान किया जाय और घ्राणसे सौगन्ध्यामृतका, त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ है—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्य रससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये भगवान्का प्रादुर्भाव होता है। चतुर्विधा भजन्ते ज्ञानी भक्त भगवद्भक्त चार प्रकारके होते हैं। एक तो आप्तकाम, आत्माराम, परमनिष्काम, तत्त्वविद्, ब्रह्मनिष्ठ, परमात्मरहस्यज्ञ ज्ञानी, जिसको ऐन्द्र तथा ब्राह्मपद-पर्यन्तके सम्पूर्ण वैभवोंकी रंचमात्र भी चाह नहीं होती। वे योगीन्द्र, मुनीन्द्र, अमलात्मा, परमहंस बिना किसी प्रयोजनके सर्वैश्वर्यपूर्ण, मधुरतम लीलाबिहारी भगवान्के अव्यावृत्त भजनमें लगे रहते हैं। यद्यपि वे पूर्णकाम, आत्माराम, परब्रह्ममें परिनिष्ठित हैं, भजन करनेकी उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है तथापि वे ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले मुनिजन दिव्य, शुद्ध, नित्य, चिन्मय भगवत्स्वरूपके सामने आते ही क्षुब्ध हो उठते हैं और उनके मरे हुए मन भी जीवित होकर इस स्वरूपकी एक-एक वस्तुपर मुग्ध हो जाते हैं। इन्द्रियोंके विषय रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्शसे मुमुक्षु-अवस्थामें ही चित्त उपरत हो जाता है और भजन करना उनका स्वभाव ही बन जाता है। कमलनयन, घनश्यामके विधुविनिन्दक वदनारविन्दपर अतिमृदुल मन्द मुसकान एवं उनके अतिमनोहर नयनयुगलके कमनीय कृपाकटाक्ष एवं इसी प्रकार प्रभुके अन्यान्य श्रीअंगोंका अवलोकनकर नामरूपात्मक दृश्य-प्रपंचसे उपरत चित्तवाले योगीन्द्र, मुनीन्द्र भी लट्टू हो जाते हैं। एक बार दिव्य वैकुण्ठलोकमें श्रीमहाविष्णुके समीप नित्य आत्मनिष्ठ सनकादि ऋषि पधारे। ज्यों ही वे भगवान्के सामने पहुँचे और उनके स्वरूपको देखा कि मुग्ध हो गये। भगवान्की सुन्दरता देखते-देखते उनके नेत्र किसी प्रकार तृप्त ही न होते थे। भगवान्के सौन्दर्यने ही उन्हें मुग्ध किया हो सो नहीं, प्रणाम करते समय कमलनयन श्रीहरिके पादपद्मपरागसे मिली हुई तुलसीमंजरीकी सुगन्ध वायुके द्वारा नासिकामार्गसे ज्यों ही मुनियोंके अन्तरमें पहुँची