भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 637, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें(‘स्वसुखेनैव निभृतं परिपूर्णं चेतो यस्य स तथोक्तः। तेनैव निरस्तः अन्यस्मिन् पदार्थे भावो भावना अस्तित्वबुद्धिर्यस्य स तथोक्तः’) उन्होंने स्वयं कहा है कि मेरा मन निर्गुण परब्रह्ममें परिनिष्ठित था, फिर भी उत्तमश्लोक भगवान्की लीलाने मेरे चित्तको खींच लिया। श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्तमति होकर मैंने श्रीमद्भागवतरूप महाख्यानका अध्ययन किया है— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९; १।७।११) लखी जिन लालकी मुसकान। तिनहिं बिसरी वेदविधि सब योग संयम ज्ञान ॥ × × × आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, तत्त्वनिष्ठोंकी ये अनुभूतियाँ हैं कि भगवान्की सौन्दर्यछटा, आकर्षक माधुरी एवं रूपराशिको देखते ही उनका ज्ञान मानो मूर्च्छित हो गया, देहकी सुधि जाती रही, रोमांच हो आया, वाणी गद्गद हो गयी और आनन्दाश्रुसे आँखें डबडबा आयीं— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा। सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५; १।२१६।३) भगवान्के अवतरणका हेतु—अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान ठीक ही है, तभी तो यह कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंके लिये ही भक्तियोगका विधान करनेके लिये अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य- सुधाजलनिधि दिव्य मूर्ति धारण करते हैं। अन्यथा असुरनाश-जैसे छोटे कार्योंके लिये प्रभुका अवतार वैसे ही अनुचित होगा, जैसे मशकनिवारणार्थ भुशुण्डीका प्रयोग (मच्छर मारनेके लिये तोप चलाना)। परंतु समस्त नाम-रूप-क्रियात्मक प्रपंचसे व्यावृत्तमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्यस्वरूपधारण परमावश्यक है। अद्वैतब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना—यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्यसिद्धान्तके अनुसार प्रकृति-प्राकृत प्रपंचसे पृथक्, असंग, अनन्त चेतनतत्त्वका विवेचन कर लेनेवाले ‘हंस’ कहे जा सकते हैं। परंतु वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार तो दृग्दृश्य, आत्मा-अनात्मा, परात्पर पूर्णतम, सर्वभासक भगवान् और प्रकृति-प्राकृत प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे दिव्य मणिमाला और उसमें कल्पित सर्पका अर्थात् सत्य एवं अनृतका आध्यात्मिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्का आध्यात्मिक सम्बन्ध है। अतः सत्यानृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, वैसे ही दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृतस्वरूप दृश्यका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान् ही अवशिष्ट रहते हैं। इस तरह वेदान्त-सिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप नीर-क्षीरका विवेचन है और नीरस्थानीय दृश्यको मिटाकर परमसत्य भगवान्में ही स्थित होनेवाले ‘परमहंस’ कहे जा सकते हैं। परंतु बिना भगवान्के मधुर, मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता— ‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।’, ‘सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।’ (रा०च०मा० २।२७७।५) अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना— बस, यही मुख्य प्रयोजन प्रभुके मधुर, मंगलमय स्वरूप धारण करनेका है। भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्के और कौन हो सकता है? रहा भगवान्का अचिन्त्य, अनन्त,