भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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होकर परमानन्दसिन्धु ही मूर्तिमान् होकर 'थेई-थेई' करता हुआ नाच रहा है, उनको आनन्दबिन्दु की अपेक्षा ही क्या ? भगवन् ! विविध सुखसामग्री, ऐन्द्र- माहेन्द्र एवं ब्राह्मपदके समस्त वैभवोंको देकर भी इनसे उऋण नहीं हो सकते। आपको तो इनका चिरऋणी ही रहना पड़ेगा।' भगवान्‌ने कहा- 'अच्छा ब्रह्मन् ! मैं इन प्रेमी भक्तोंको अचिन्त्य, अनन्तपरमानन्दसिन्धुसारसर्वस्व अपने-आपको ही दे डालूँगा, तब तो इनसे मुक्त होऊँगा?' ब्रह्माने फिर कहा-'भगवन् ! अपने-आपको तो आपने लोकबालघ्नी, रुधिराशना राक्षसी पूतनाको भी दे डाला, दुर्वृत्त राक्षसेश्वर रावण-जैसे अत्याचारियोंको भी दे दिया। जो महद् वस्तु उन विरोधियोंको दी गयी, वही इन अनन्य, अन्तरंग प्रेमी भक्तोंको दी जाय, यह न्याय नहीं। इसलिये अपने-आपको देकर भी आप इनसे उऋण नहीं हो सकते।' भगवान्‌ने कहा-'अच्छा, इनके कुटुम्बभरको अपनेको दे डालूँगा।' फिर ब्रह्माने कहा-'हे देव ! पूतनाका क्या कोई बचा था? अघासुर, बकासुर सब तो आपको पा गये। रावण भी तो सकुदुम्ब आपको पा गया।' अन्तमें भगवान्‌को कहना पड़ा-'अच्छा ब्रह्मन् ! मैं इनका ऋणी ही रहूँगा।' सारांश यह कि भगवान्‌का मधुर, मनोहर, मंगलमय स्वरूप स्वतः फलस्वरूप है। भगवान्‌के श्रीपादारविन्द-नखमणिचन्द्रिकाकी दिव्य द्युतिका ध्यान करना ही परम फलस्वरूप है। कुछ लोग भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दको साधन मानते हैं, पर उच्चकोटिके भक्तगण प्रभुके सौगन्ध्यामृतसिन्धु श्रीचरणारविन्दमें अनन्य भक्तिको ही परप्रेमरूपा, स्वतःसिद्धा, भगवान्‌की परमान्तरंगा शक्तिरूपा मानते हैं—'साधन सिद्धि राम पग नेहू।' (रा०च०मा २।२८९।८) भक्ति साधन और साध्यरूपसे दो प्रकारकी होती है। जैसे-अपक्व आम्र पक्व आम्रका हेतु होता है, वैसे ही साधनरूपा भक्तिका साध्यरूपा भक्तिके साथ साध्यसाधनभाव होता है। सर्वाभिलाषवर्जित, ज्ञान और कर्मोंसे असंस्पृष्ट, अनुकूलतापूर्वक श्रीकृष्णका अनुस्मरण ही 'भक्ति' है— अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ इन सिद्धान्तोंमें भक्ति ही सब कुछ है, उसके लिये ही समस्त साधन हैं, ज्ञान और मोक्ष आदि उसमें विघ्न हैं। भक्तजन भुक्ति, मुक्ति और विरक्ति सबको तिलांजलि देकर भक्तिको ही चाहते हैं। इसीलिये बड़े-बड़े अमलात्मा परमहंस, महामुनीन्द्रगण भी अद्वैत, अनन्त, अखण्ड ब्रह्मसे मन हटाकर सगुण, साकार भगवान्में मन लगाते हैं। प्रभुके श्रीचरणारविन्द- सौगन्ध्यामृतसिन्धुके एक बिन्दुके भी समास्वादन करनेसे सनकादिक, शुकादिक-जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं। अरविन्दनयन भगवान्‌के श्रीचरणारविन्दमकरन्दमिश्रित तुलसीके मकरन्दरेणु जिस समय स्वविवर (नासिका) -द्वारा सनकादिकोंके हृदयान्तर्गत हुए, बस उसी समय उन अक्षरब्रह्मनिष्ठ सनकादिकोंके शरीर और मनमें भी क्षोभ हो गया अर्थात् शरीरमें पुलकावली, नयनोंमें अश्रु और मनमें द्रवता उत्पन्न हो उठी— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) श्रीशुकाचार्य, जिनका चित्त स्वरूपभूत परमानन्द- सुधासिन्धुसे ही परिपूर्ण हो गया था, स्वसुखनिभृतचेता होनेसे ही अन्यपदार्थविषयक अस्तित्वबुद्धि जिनकी मिट गयी थी, जो केवल सर्वत्र एक परमतत्त्वका दर्शन करते थे, भगवान्‌की लीलारुचिरसे उनका भी धैर्य च्युत हो गया— स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावोऽ- प्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८)