भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 653

भगवत्कथामृत ६४३ जारताको गानेवालोंको आप निजरूप प्रदान करते हैं— प्रथयति नवनीतचौरतां ते व्रजयुवतीजनजारतां जनो यः। वितरसि निजरूपमीश तस्मै स्वकृतधिया परिगोपनाय नूनम्॥ वस्तुतस्तु येन-केनापि प्रकारेण भगवान्‌में मन जोड़ते ही प्राणीको भगवद्भावकी प्राप्ति हो जाती है। जैसे चिन्तामणिको दीपक समझकर दीपकबुद्ध्या भी प्रवृत्त होनेपर चिन्तामणिकी प्राप्ति होती है, वैसे ही प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान् ब्रह्ममें औपपत्यबुद्ध्या प्रवृत्त होनेपर भी प्राप्ति भगवान्‌की ही होती है। केवल रागानुगामिनी उत्कट प्रीतिके लिये ही भावुक लोग लौकिक रूपमें भगवान्‌को भजते हैं। ज्ञानीका भी प्रारब्धवशात् प्रत्युपस्थित लौकिक पदार्थोंमें जैसा चित्त स्वाभाविक रूपसे प्रवृत्त होता है, वैसा प्रत्यगात्मामें नहीं। इसीलिये भगवान्‌की मधुर लीलाओंका प्राकट्य होता है। चापल्यपूर्ण बाल्य, पौगण्डादि अवस्थाओंकी लीलाओंमें हठात् चित्त खिंचता है। इस दृष्टिसे अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही भगवान् अचिन्त्य, सगुण, साकार, दिव्य श्रीरामकृष्णादिके रूपमें प्रकट होते हैं।

भगवत्कथामृत

हम उस आनन्दकन्द, नन्दनन्दन, गोपिका- वल्लभ, पूर्णब्रह्म, मंगलमूर्ति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके परम ऋणी हैं, जो हमें सृजनकर हमारा पालन- पोषण कर रहे हैं। उनके मधुर मुखारविन्द, मनोहारी नेत्र, नासिका, अधर और मकराकृत कुण्डल सब- के-सब हमारे हृदयस्थलको पवित्र करने एवं प्रसन्नता देनेवाले हैं, पर शोकके साथ कहना पड़ता है कि हम आज उस नटवर गोपालको—अज्ञानसागरमें अपनेको डालकर—एकदम भूल गये हैं और उसकी मधुरमय लीलासुधारसपानसे अपनेको दूर रखे हुए हैं। भावुकोंका कहना है कि यदि सहस्रों सिर प्रदान कर देनेपर भी उस महाप्रभुकी लीलाका वास्तविक ज्ञान हो जाय और उसका दर्शन हो तो यह सौदा बहुत ही सस्ता है, इसे शीघ्र-से-शीघ्र खरीद लो। ऐसे अमूल्य सौदेको, जो हजारों सिर देकर खरीदनेपर भी सस्ता पड़ता है, हम उपेक्षाकी दृष्टिसे देख रहे हैं। फिर यदि हम सुखकी अभिलाषा करें तो क्या यह हमारी निरी धृष्टता नहीं है? भगवदीय लीलासुधाका आस्वादन वास्तवमें जिन्होंने किया है, वे धन्य हैं और धन्य वे भी हैं, जो इस लीलासुधाके आस्वादनकी उत्कृष्ट अभिलाषा रखे हुए हैं और तत्प्राप्त्यर्थ सचेष्ट हैं। संसारके नाना प्रकारके कल्मषोंको दूर करनेका इससे बढ़कर दूसरा उपाय ही क्या है? इसके लिये विशेष परिश्रमकी भी आवश्यकता नहीं है। भगवल्लीला 'श्रवणेनैव मंगलम्', केवल श्रवणमात्रसे मंगल देनेवाली है, कल्याणसाधक है, तीनों प्रकारके दैहिक, दैविक और भौतिक तापोंसे मुक्तिदायक है। पर यह श्रवण श्रद्धा और भक्तिके साथ होना चाहिये। यह नहीं कि एक कानसे अमृतमय उपदेश सुना और दूसरे कानसे निकाल दिया। अज्ञानजन्य मोहका सर्वथा परित्याग करके ही प्राणी इस लीलासुधाका मधुर पान कर सकता है। अज्ञानजन्य मोहसे मन अस्थिर होता है। मनकी अस्थिरता ही भयका कारण है और मनकी अस्थिरताका कारण है सत्त्वगुणका अभाव। अतः ये दोनों लक्ष्यप्राप्तिमें बाधक हैं। सत्त्वगुणकी जिससे वृद्धि हो और रज, तम शान्त हों, वही प्रयत्न मनुष्यको करना चाहिये। फिर जहाँ, जिस दशा और जिस स्थानमें हों, श्रीमानोंद्वारा प्रसारित भगवदीय लीला-सुखका अनुभव हो सकता है। भगवान्‌के चरण निर्भयके स्थान हैं। इनकी प्राप्ति सत्कथा-श्रवण, मनन, निदिध्यासन