भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 654

६४४ भक्तिसुधा और अहर्निश भगवद्भजनसे होती है। 'श्रीमद्भागवत' का एक श्लोक है— स वेद धातुः पदवीं परस्य दुरन्तवीर्यस्य रथाङ्गपाणेः। योऽमायया संततयानुवृत्त्या भजेत तत्पादसरोजगन्धम्॥ (श्रीमद्भा० १।३।३८) अर्थात् परमपिता, परमात्मा, अमितविक्रम, श्रीसुदर्शनचक्रधारी भगवान्‌के चरण उसीको प्राप्त होते हैं, जो निष्कपट होकर सतत भगवान्‌में अपने चित्तको लगाकर उनके चरणकमलोंका गन्ध-सेवन करता है अर्थात् उन्हें भजता है। भवभयसे पार करनेवाली नौका बस एकमात्र यही है। प्राणी द्वन्द्वधर्मसे विवर्जित होकर अर्थात् संसारके राग-द्वेष, शोक-मोह आदि जितने कल्मष हैं, सबका त्यागकर भगवदीय लीला-सुधा- समास्वादनका अधिकारी हो सकता है। बाह्य विषयोंके सुखसे मलिन मतिवालोंके लिये लीलासुख नीरस ही लगता है। स्त्रीसमुपभोगजन्य सौख्यतक इस लीलासुखके सामने कुछ नहीं है। वास्तविक सुखके स्वरूपको जिसने समझा है, उसपर जिसने विचार एवं मनन किया है, वही व्यक्ति यह बतला सकता है कि भगवदीय लीलाके माधुर्य रस-सुस्वादमें क्या आनन्द आता है। अनभिज्ञ लोगोंका तो कहना है कि ब्रह्मसुख कुछ है ही नहीं, मरकर गधे आदि भी होकर ऐहिक सुख भोगना वे पसन्द करते हैं, पर निर्विषयक मोक्ष उन्हें पसन्द नहीं। ब्रह्मसुख किसीमें नहीं है, यह एक हास्यास्पद बात है। अनभिज्ञ लोग अविद्याके कारण सौषुप्त सुखको ब्रह्मसुखसे अधिक तो मानते हैं, पर यदि उनकी वह अविद्या हट जाय, उनका हृदयपटल बाह्य सौख्य वासनासे वासित न हो तो उन्हें मालूम हो कि ब्रह्मसुखसे वास्तवमें कितना आनन्द आता है। लोमड़ीको जब अंगूर बार-बार छलांगें भरनेपर भी नहीं मिले तो उसने झट कह दिया कि 'अंगूर तो खट्टे हैं'। इसी तरह ब्रह्मसुखका सुस्वाद जिन अनभिज्ञोंको प्राप्त नहीं होता, वे ही कहते हैं कि इसमें कोई तत्त्व नहीं, कोई आनन्द नहीं। ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है वास्तवमें ब्रह्मसुख बृहत्तम सुख है। सुसौख्य और परमानन्दकी प्राप्ति ब्रह्मसुखके अनुभवसे ही होती है। चैतन्यान्दात्मकसौख्य मृत्युपरिगृहीत प्राणियोंको प्राप्त करनेका प्रयत्न सदैव करते रहना चाहिये, पर पहले कलुषित मतिको विशुद्धातिविशुद्ध बनाना होगा; क्योंकि अमृतत्वकी प्राप्तिकी आशा अपनी मतिको विमल बनाये बिना नहीं की जा सकती। भौतिक धनोंका मोह त्यागकर पारमार्थिक धनका चिन्तन होगा। अन्तःकरणको सभी विकारोंसे रहित करना होगा। इसके बाद भगवदीय लीलाकथा-श्रवणमें मन लगेगा और वही कथा-श्रवण सर्वस्व-समर्पण करायेगा, ब्रह्मप्राप्ति करा देगा और नित्य, शुद्ध, बुद्ध, पूर्ण, निर्विकार, निर्विशेष चैतन्यान्दघनके माधुर्यको हमारे समक्ष पानके लिये उपस्थित करेगा। कथा-श्रवणद्वारा कर्मरन्ध्रसे भगवान् अन्तस्तलमें प्रविष्ट होते हैं। पूर्णब्रह्म चैतन्यान्द परमात्मा सबमें हैं। स्थावर- जंगम सभी प्राणियोंमें उनकी अवस्थिति है। पर हम सब जीव अज्ञानमें पड़े हुए उनकी अवस्थितिको स्वीकार नहीं करते, इसलिये उनको समझनेके लिये भगवदीय कथा-श्रवणका महर्षियोंने आदेश किया है। कथाका श्रवण भी करना चाहिये और उसे प्रदान भी करना चाहिये। दोनों हाथमें लड्डू है। इसका फल परोक्ष नहीं, साक्षात् होता है। कथा-श्रवण एवं उसका प्रदान साक्षात् सुखका प्रभाव दिखलाता है। पर जिनका मन रजस्तमोलेशसे अव्याप्त है, अन्तःकरण शुद्ध है, उन्हींको हरि-कथा सुनने एवं सुनानेका अधिकार है, अन्योंको नहीं। विघ्नकारक तमोलेश- सुसम्पादित मूढ़ता, रजोलेश-सम्पादित धीरतासे लीलासुधासमास्वादन नहीं हो सकता। जिस पिपीलिकाके मुखमें लवणकण वर्तमान है, उसे भला मिसरीके माधुर्यका अनुभव कैसे हो सकता है? वैसे ही मनको घोर मूढ़तारूप लवणकणके रहते शुद्ध नहीं किया जा सकता और जब मन शुद्ध नहीं है, तब फिर