भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवत्कथामृत ६४५ भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है? मनुष्य जबतक ऐहिक-आमुष्मिक प्रपंचसे विरक्त न हो, विविध प्रकारके बाह्य सुखोंसे मनको दूर न कर ले, तबतक उसे परमध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, भगवान्की मधुरतापूर्ण लीलाका सुस्वादानुभव नहीं हो सकता। इस सुस्वादानुभवके लिये पूर्ण श्रद्धाका होना अपेक्षित है। देखा-देखी नहीं कि चलो अमुक स्थानपर कथा हो रही है, मैं भी चलकर देखूँ क्या होता है। इस तरहसे लक्ष्यकी प्राप्ति नहीं होती। पूर्ण श्रद्धाके होनेसे क्षणमात्रमें ही भगवत्प्राप्ति होती है। वर्णाश्रमधर्मानुसार वैदिक कर्मसे हृदयको शुद्ध बनाकर अन्धकारपूर्ण आवरणको हृदय-पटलसे दूरकर दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य, माधुर्यका स्वाद लेनेका प्रयत्न करना चाहिये। भगवान् सबके परम प्रकाशक भगवान् सबके परम प्रकाशक हैं। देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, जीव, अहंकार सबके वे प्रकाशक हैं। इनके प्रत्यक्षके लिये आलोककी आवश्यकता नहीं है। जैसे सूर्यके प्रकाशको देखनेके लिये दीपककी कोई जरूरत नहीं है, वैसे ही उसके प्रचण्ड प्रसरित प्रकाशको देखनेके लिये आलोक अपेक्षित नहीं, वह तो प्रत्यक्ष है। जो उस प्रकाशको जानते हैं, वे कृतार्थ हो जाते हैं; जो नहीं जानते, वे अनेकानेक अनर्थ- परिप्लुत होते हैं, दीन-दुःखी हो इतस्ततः भ्रमण करते रहते हैं। वे तो हम सबके अन्दर व्याप्त हैं, पर दुःख है कि हम जीव उसे देखनेकी चेष्टा नहीं करते और ठोकरें खाते फिरते हैं। घरमें जैसे अपार सम्पत्ति गड़ी पड़ी हो, पर उसका पता न रहनेसे मनुष्य दुःखी होता है, पैसे-पैसेके लिये मुहताज रहता है, वैसी ही गति आज संसारके जीवोंकी हो रही है। अपने अन्दर वह प्रकाश वर्तमान है, पर उसे न देखकर वे अँधेरेमें पड़े भटक रहे हैं, मायाके चक्करमें घूम रहे हैं। ज्ञानी ऐसी गलती कभी नहीं करते। पाशोंका जो हनन करना चाहे, उसके लिये परम कर्तव्य है कि वह परमतत्त्व चैतन्यान्दघनको देखे तथा जाने और इस भवसागरमें अनन्तकालतक पड़े न रहकर अपनेको इससे मुक्त करे। श्रवणकी महिमा कर्म, भक्ति, ज्ञान तीनोंका मुख्य साधन श्रवण ही बतलाया गया है। सभी कर्मकाण्डका उपदेश वेदमें है और वह वेद गुरुमुखसे अधिकारानुसार यथाविधि श्रवणसे ही प्राप्त किया जाना चाहिये। गुरुमुखद्वारा उच्चारित होनेपर श्रवण किये जानेके कारण ही वेदके अनुश्रव, श्रुति आदि नाम हैं। भक्तिमार्गके पथिकोंके लिये भी श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि नवविध भक्तिसाधनों या भक्तिमें सर्वप्रथम श्रवण ही बतलाया गया है। भगवच्चरित्रश्रवणमात्रसे सर्वान्तरनिवासी प्रभुकी ओर, समुद्रकी ओर अभिमुख होनेवाले अखण्ड, निर्मल गंगा-प्रवाहकी तरह निर्मल अन्तःकरणका भक्तिरूप अविच्छिन्न प्रवाह होता है— मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥ (श्रीमद्भा० ३।२९।११) ज्ञानमें भी 'श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' (बृहदारण्यक० २।४।५) आदि वचनोंद्वारा श्रवणकी ही प्रधानता वर्णित है। 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठोपनिषद् १।२।१५) सब वेद सर्वाश्रय भगवान्का ही प्रतिपादन करते हैं। 'वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा। आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते॥' (कल्किपुराण ३।२१।३८) वेद, रामायण, पुराण और महाभारत आदि समस्त शास्त्रोंके आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र एकमात्र पापतापहारी भगवान् हरिके ही गुण, लीला आदिका गान है। इत्यादि वचनोंसे यही विदित होता है कि सभी शास्त्रोंके एकमात्र प्रतिपाद्य भगवान् ही हैं। श्रवणमें सभीका अधिकार प्राणीमात्रके लिये सर्वविध कल्याणकारक होनेसे भगवच्चरित्र-श्रवणमें सभीका अधिकार है। भगवच्चरित्रका श्रवण एवं गान मुक्त, मुमुक्षु तथा