भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४६ भक्तिसुधा संसारी सभीका कर्तव्य है। निवृत्तेच्छ, निरीह मुक्तोंके परप्रेमास्पद स्वात्मा होनेसे प्रभु भजनीय होते हैं, इसीलिये भजन-भक्तिके लिये मुक्त, पुरुषोंका भी शरीरधारण उपनिषदने बतलाया है, 'मुक्त अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भजन्ते।' (नृसिंहपूर्वता० शांकरभाष्य) भवसागरको पार होनेमें एकमात्र साधन होनेसे मुमुक्षुओंके भी वे परमाश्रयणीय हैं और श्रोत्र, मनके आकर्षक होनेसे संसारियोंके भी श्रोतव्य हैं। ऐसे सर्वश्रेयस्कर प्रभुके चरित्र, कथाका जो श्रवण नहीं करते, वे या तो आत्मघाती हैं या निरे जड़ काष्ठ हैं— निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१।४) श्रवण, संकीर्तनसे श्रोत्रद्वारा श्रोताके मानसपंकजमें प्रविष्ट होकर भगवान् उसके अशेष दोषोंका वैसे ही शमन कर देते हैं, जैसे अन्धकारको सूर्य और तीव्र वायु घनावलिको। जिस कथामें भगवान् अधोक्षजका गुणानुवाद नहीं, वह असती, असत्कथा है, अतः व्यर्थ ही वाणीका उपयोग है। जिस कथामें भगवान्के गुणोंका वर्णन होता है, वही सत्य, मंगल, पुण्य, रम्य, रुचिर, नित्य नवनवायमान मनका महोत्सवस्वरूप और शोकार्णवशोषक है। कोई वाक्यप्रयोग चाहे कितना ही विचित्र शब्दावलि एवं अलंकारोंसे युक्त क्यों न हो, यदि जगत्को पवित्र करनेवाले भगवान्के मंगलमय यशसे निबद्ध नहीं है तो वह हंसतीर्थ नहीं, अपितु वायसतीर्थ है। अतः विवेकियोंका परम कर्तव्य है कि व्यक्तिगत रूपसे प्रतिदिन नियमपूर्वक नियत समयमें भगवान्की परम पवित्र कथाओंका आदर, श्रद्धापूर्वक श्रवण करे और अधिकारानुसार स्वयं भी दूसरोंको सुनाये। प्रत्येक ग्रामों, मुहल्लोंमें किसी देवमन्दिरादिमें कम-से-कम महीनेमें दो-चार दिन भगवत्कथाका आयोजन होना परम आवश्यक है। इस मर्त्यलोकमें भगवान्की कथा साक्षात् अमृत है, अनेक शोक-दुःखसे सन्तप्त प्राणियोंके तापको अपहरण करनेमें समर्थ है, शुक-सनकादि परम विवेकी सत्पुरुषोंसे स्तुत है, सकल पाप-पंकका शोषण करनेवाली है, श्रवणमात्र मंगलप्रद है और व्यासादि महर्षियों द्वारा जगतीतलपर विस्तृत है, अतः सर्वार्थसाधक है। इसको श्रवण करानेवालेसे बढ़कर अधिक दानकर्ता संसारमें और कौन हो सकता है ? तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।९) प्रभुकृपा भगवत्कृपाके बिना मायासे पार होना असम्भव है प्रभुकृपाके बिना प्रभुकी दुस्तरा मायाको तरना अत्यन्त असम्भव है। यह स्पष्ट है कि सम्पूर्ण प्राणी सर्वान्तरात्मा, सर्वाधिष्ठान भगवान्के अंश ही हैं। जैसे जलसे तरंग, अग्निसे विस्फुलिंग (चिनगारियाँ), महाकाशसे घटाकाश, उदंचनाकाश आदि उद्गत (उत्पन्न) होते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण चेतन वर्गकी उत्पत्ति भगवान्से होती है। वस्तुतः अत्यन्त निरुपाधिक तत्त्वमें वास्तविक अंशांशिभाव भी नहीं बन सकता; क्योंकि निरवयव, निरंशमें अवयव एवं अंशकी भावना सर्वथा असम्भव है तथापि जैसे अविकृत कौन्तेय (कर्ण)-में भ्रमसे ही राधासुत होनेकी भ्रान्ति हो गयी, वैसे ही प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, स्वप्रकाश चिद्रूपमें ही भ्रमसे जीवभाव भासित होता है। जैसे मायावी अपनी चमत्कारपूर्ण मायाद्वारा निर्विकार रूपसे स्थिर रहकर ही आकाशमें कच्चे सूत्रकी कुखरी (बण्डल) फेंककर शस्त्रास्त्रसुसज्जित वीरवेशमें सूत्रके सहारे ऊपर चढ़ता है, चढ़ते-चढ़ते अदृश्य हो जाता है और फिर दैत्योंसे युद्ध करता है, युद्ध करते-करते