भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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उसके अंग-प्रत्यंग—सिर आदि अवयव पृथ्‍वीपर गिर पड़ते हैं, उसकी पत्नी उन्हें लेकर चितारोहण करके पतिकी सहगामिनी हो जाती है, यह सब घटना प्रत्यक्ष दिखायी देनेके पश्चात् वह उसी तागेके सहारे फिर आकाशसे उतरता हुआ दिखायी देता है, फिर भी वास्तविक मायावी अपनी मायासे लोगोंकी दृष्टिसे ओझल होकर जहाँ-का-तहाँ ही विराजमान रहता है, वैसे ही प्रत्यक् चिदात्मा भगवान् निर्विकार, कूटस्थ, एकरस रूपसे सर्वदा स्वरूपस्थ होनेपर भी समष्टि- व्यष्टि, स्थूल-सूक्ष्म-कारण जगत्, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति-अवस्था आदि प्रपंच फैलाकर उनपर विश्व- तैजस्-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ-अव्याकृतरूपमें अनुभूय- मान होता है, अनेक व्यवहारोंमें तल्लीन, तज्जन्य शोक-मोहादि उपद्रवोंमें फँसा हुआ दिखायी देता है, परंतु फिर भी उसके स्वरूपमें किंचित् भी विकार या हलचल नहीं होती। प्रपंच एवं प्रपंचरूप स्वरूपसे पृथक्, असंग, कूटस्थ स्वरूप सर्वदा एकरस ही रहता है। इसी देहमें अन्तर्मुख होकर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहमर्थ आदि अतत् (अनात्मा)-का अपोहन करते हुए, यदि ढूँढ़े तो उसके उपलब्ध होनेमें कठिनाई नहीं, परंतु जैसे कोई घरमें खोयी हुई वस्तुको वनमें ढूँढ़े, वैसे ही बहिर्मुख प्राणी आन्तर वस्तुको—भीतरकी खोयी वस्तुको बाहर ढूँढ़ता है। विचार करनेपर सर्वभास्य दृश्यके भासक निर्विकार दृक्स्वरूप भानात्मक भासकके उपलम्भमें कार्य- परम्पराको परम कारणमें और परम कारणको भी कार्यकारणातीत तत्त्वमें विलीन या बाधित कर देनेपर अशेष विशेषातीत वस्तुको पा लेने में कठिनाई नहीं है तथापि भगवत्कृपाके बिना मिथ्या विश्वसे अभिनिवेश नहीं छूटता— वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः। तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम्॥ (श्रीमद्भा० ५।१८।४) अर्थात् क्रान्तदर्शी लोग विश्वको विनश्वर बतलाते हैं, अध्यात्मविद् विद्वान् विश्वकी विनश्वरताका अनुभव भी करते हैं तथापि आपकी मायासे मोहित हो जाते हैं, ऐसे विस्मयजनक कृत्यवाले अज अव्यात्मा आपको नमस्कार है। इस श्वान, शृगाल, गृध्र, काकादि पिशिताशियोंके भक्ष्य, अस्थि-मांस-चर्ममय पंजर, मूत्र- पुरीष-भाण्डागार, मायामय, क्षणभंगुर, बुद्बुदोपम देहसे उन्हीं लोगोंकी अहंता-ममता छूटती है और वे ही लोग दुस्तरा, गुणमयी मायाको तर सकते हैं, जिन्होंने निष्कपटभावसे सर्वात्मना भगवान्के श्रीचरणोंका सहारा लेकर उनकी दयादृष्टिको प्राप्त कर लिया है— येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वशृगालभक्ष्ये॥ (श्रीमद्भा० २।७।४२) अन्यथा अविवेक, अज्ञानसे प्रत्यक्ष सिद्ध करतलस्थित आमलकके समान अत्यन्त अपरोक्ष- सर्वात्मभाव भी परोक्ष या असत्कल्प हो जाता है और फिर प्राणी आध्यात्मिकता, आधिदैविकताको भूलकर केवल आधिभौतिक वैषयिक भोग-विलासोंके किंकर बनकर आसक्ति, असन्तोष, विद्वेष आदि आसुर भावोंसे ग्रस्त होकर परस्पर एक-दूसरेके संहारक बन जाते हैं। इसीलिये सन्तोंने सर्वदा ही भगवत्कृपाकी प्रतीक्षाको मुख्य माना है, अपने और विश्वके कल्याणके लिये प्रभुमें चित्तको—निष्काम मतिको जोड़ना ही मुख्य पुरुषार्थ माना है। सम्पूर्ण प्राप्तव्य तत्त्वोंकी प्राप्ति इतनेहीसे सम्पन्न हो जाती है। भगवान्के श्रीचरणोंमें अहैतुकी मतिवाले नैष्ठिक भक्त सम्पूर्ण विश्वको—सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मवत् भगवत्स्वरूप ही देखते हैं। वे खलोंका भी अहित न चाहकर हित ही चाहते हैं। उनके स्वार्थ-परमार्थमें अन्तर नहीं रह जाता। जब प्राणी आत्मसम्बन्धी पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, कलत्र, मित्र, क्षेत्र, वित्त आदि अत्यन्त अनात्माको भी प्रेमास्पद बनाकर उनका हित चाहता है; देह, इन्द्रिय,