भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४२ भक्तिसुधा और प्रेम दोनों एक ही वस्तु हैं। परंतु देहादि उपाधियोंकी विद्यमानतामें इतना प्रेम उधर व्यक्त नहीं होता, इसीलिये अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्र भी लौकिक रूपसे भगवान्में प्रेम करते हैं—'अस तब रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥' (रा०च०मा० ३।१३।१३) यहाँतक कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य भगवान् सगुण होते हैं। परमहंसोंको श्रीपरमहंस बनाना भगवान्का उद्देश्य है; क्योंकि उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना सुशोभित नहीं होता— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ (श्रीमद्भा० १।५।१२) अच्युत प्रेम बिना नैष्कर्म्य-विज्ञान भी सुशोभित नहीं होता, फिर भगवच्चरणोंमें समर्पण किये बिना निष्काम कर्म भी कैसे शोभित होगा ? सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥ (रा०च०मा० २।२७७।५) जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू ॥ (रा०च०मा० २।२९१।२) इन दृष्टियोंसे ही ज्ञानी भी भगवान्में प्रेम चाहते हैं। कहीं-कहीं तो न चाहनेपर भी भगवत्स्वरूप सौन्दर्य आदिसे भगवान्में ज्ञानियोंका मन मोहित हो जाता है। यही तो रागानुगा-प्रीति है, जिसके सम्पादनके लिये प्रयत्न अपेक्षित नहीं है, वह हठात् उत्पन्न होती है। सर्वथापि व्यावृत्त बाह्यौत्सुक्य, वीतराग ज्ञानी श्रीभगवान्की ओर आकर्षित होकर आश्चर्यमें कहते हैं— क्लेशे क्रमात् पञ्चविधे क्षयंगते यद् ब्रह्मसौख्यं स्वयमस्फुरत् परम्। तद् व्यर्थयन् कः पुरतो नराकृतिः श्यामोऽयमामोदभरः प्रकाशते॥ अर्थात् अभ्याससे क्रमेण पंचक्लेशोंके क्षीण होनेपर प्रत्यक्चैतन्याभिन्न विशुद्ध ब्रह्मसुखकी स्फूर्ति हुई थी, परंतु मेरे उस अद्भुत सुखको व्यर्थ-सा बनाता हुआ यह आमोदभर नराकार श्यामल तत्त्व कौन है ? रागानुगा प्रीतिके सम्पादनके लिये भगवान्का प्राकट्य इसी रागानुगा प्रीतिका सम्पादन करनेके लिये भगवान् अलौकिक होते हुए भी लौकिकवत्, अप्राकृत होते हुए भी प्राकृतवत्, अग्राह्य होते हुए भी ग्राह्यवत्, अदृश्य होते हुए भी दृश्यवत्, विश्वके जननी-जनक होकर भी पुत्रवत् होकर प्रकट होते हैं। किं बहुना पति, उपपतितक बनकर भी भगवान् भिन्न-भिन्न प्रीतिको, विषयकी ओर उन्मुख मनको विषयोंसे प्रत्यावर्तित करके अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। यद्यपि वे पतियोंके भी पति, सबके परमपति हैं तथापि निरतिशय परप्रेमके आस्पद बननेके लिये वे ब्रह्म व्रजांगनाओंके उपपति होकर भी प्रकट होते हैं। इसीलिये प्राणियोंका चित्त अलौकिक एवं वैध वस्तुमें उतना नहीं खिंचता, जितना लौकिक एवं अवैधमें। पर वे अवैध होते हुए भी परम वैध हैं, उपपति होते हुए भी परमपति हैं। लौकिक जार लोक-परलोक, धर्म-कर्मको जलानेवाला होता है, पर भगवान् औपपत्य बुद्धिसे भी—जाररूपसे भी भावुकके चित्तपर अभिव्यक्त होकर उसके पंचकोश, स्थूल, सूक्ष्म, कारण—तीनों शरीरोंको, कर्म-बन्धनोंको, किं बहुना अविद्या, तत्कार्यात्मक जगत्को जलाकर भस्मसात् कर देते हैं, इसीलिये वे जार हैं। 'अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥' (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) अर्थात् निष्काम रागानुगा भक्ति एवं ज्ञान कोशों और कर्मोंको जला देते हैं, जीवात्मा संसारसे छूटकर भगवद्भावको प्राप्त हो जाता है। किसीने भगवान्से परिहास किया था कि हे व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ! जो प्राणी आपका नवनीतचौर्य और व्रजयुवतीजनोंमें औपपत्यका प्रख्यापन करते हैं, आप उन्हें शीघ्रतिशीघ्र ही अपना रूप इसलिये प्रदान करते हैं कि वे हमारे रूप हो जायँगे, तब हमारे इन कर्तव्योंका वर्णन न कर सकेंगे। अतः अपने कर्तव्योंको छिपानेके लिये ही नवनीत-चौरता और व्रजयुवतीजन-