भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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६२२ भक्तिसुधा वीणावादनपर मुग्ध होकर हरिणियाँ अपना प्राण दे देती हैं। ये सब विशुद्धप्रेमके ज्वलन्त उदाहरण हैं। सूरके शब्दोंमें— ऊधौ! मन मानेकी बात। दाख छोहारा छोड़ि अमृतफल बिषकौरा बिष खात॥ जो चकोरको दै कपूर कोड तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें बँधत कमलके पात॥ ज्यों पतंग हित जानि आपनो, दीपकसों लपटात। 'सूरदास' जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥ इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने निरतिशय, निरूपाधिक, परप्रेमास्पद, प्राणधन भगवान्‌को ही अपना सर्वस्व समझते हैं और प्रभुका ही समाश्रयण लेते हैं। श्रीविभीषणजी रावणसे तिरस्कृत एवं अपमानित होकर अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक महाराजाधिराज, परात्पर, पूर्णतम, पुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्रजीको ही अपना 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।' (गीता ९।१८) जानकर आनन्दमें विभोर होकर और मनमें अनेकानेक मनोरथ संकल्प-विकल्प करते हुए चले— चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥ (रा०च०मा० ५।४२।४) त्संकल्पकी महिमा वह मनोरथ मनोराज्य नहीं। सांसारिक अभीष्टोंके लिये जो संकल्प-विकल्प होता है, उसीको 'मनोराज्य' और भगवान्‌के प्रति जो संकल्प-विकल्प होता है, उसे 'मनोरथ' कहते हैं। भगवद्दर्शनके लिये, प्रभुके मंगलमय श्रीचरणारविन्दमकरन्दरससमास्वादनके लिये जो संकल्प-विकल्प होते हैं, वे बड़े पुण्योंके फल हैं और उनसे बड़ा पुण्य होता है। भारतीय शास्त्रों एवं वर्तमान कालके पाश्चात्य वैज्ञानिकोंके भी मतसे संकल्पमें एक अद्भुत शक्ति होती है। उसके द्वारा बड़े-से-बड़े अनर्थोंको मिटाकर बड़े-से-बड़ा अभीष्ट सिद्ध किया जा सकता है। भगवान्‌के संकल्पसे ही अनन्त ब्रह्माण्डकी रचना होती है, अतः भगवान्‌के ही अंशभूत जीवोंके भी संकल्पमें विचित्र शक्तियाँ हैं। जो दाहकत्व शक्ति अग्निमें है, वही उसके अंशभूत विस्फुलिंगमें भी होती है। अतः संकल्पोंका प्रभाव अत्यन्त स्पष्ट है। फिर भी दुःसंकल्पों एवं दुराचारोंसे संकल्पकी दिव्य शक्तियाँ तिरोहित हो जाती हैं। सत्संकल्प, सदाचारसे दिव्य शक्तियोंका प्रादुर्भाव होता है। संकल्पबलसे यदि हम चाहें तो घटको पट एवं पटको घट बना सकते हैं। आवश्यकता है सत्संकल्पकी। निराशारूपी पिशाचिनीको दूरकर संकल्पबलसे सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। सत्संकल्पके द्वारा साम्राज्य, स्वाराज्य, वैराज्यादि सुख-सामग्री एवं स्वर्ग-अपवर्ग-सब कुछ मिल सकता है। परंतु संकल्पसिद्धिमें एक बड़ा भारी विघ्न है—निराशा अथवा असम्भावना। एक वृद्ध पुरुषको जिसने कि अपना सारा जीवन अत्याचार, अनाचार, दुराचार, व्यभिचारादिमें ही बिताया है, उसे यह विश्वास नहीं होता कि हमें भी भगवान् मिल सकते हैं। पर बात ऐसी नहीं है। किसीको भी निराश होनेका कारण नहीं। हमारे शास्त्रोंने सबके लिये आश्वासन दे रखा है। लोगोंको प्रायः इस प्रकारकी असम्भावना हुआ करती है कि 'मुझ दीन, हीन, मलिनके पास भगवान् कैसे आयेंगे, कैसे कृपा करेंगे, मैं बड़ा पापी हूँ, मुझे कैसे शरणमें रख सकते हैं।' पर यह बात भी नहीं। चिद्रूप जीवात्माके साथ परमात्माका अभेद सम्बन्ध रहता है। परमक spy मय भगवान् गाढ़-से-गाढ़, विषम-से-विषम स्थानोंमें भी जीवात्माका साथ नहीं छोड़ते। माँके पेटमें, विभिन्न योनियोंमें, नरकमें, किं बहुना जहाँ भी जीवात्माको जाना होता है, भगवान् वहीं जाते हैं। जीवात्मा कभी भी अनन्त आनन्दसिन्धु, परमानन्दकन्द भगवान्‌से वियुक्त नहीं होता। फेन, तरंग, बुद्बुदके भीतर-बाहर जैसे जल ही ओत-प्रोत है, वैसे ही स्वांशभूत जीवोंके बाहर-भीतर, चारों ओर भगवान् ही व्याप्त हैं। 'अमृतस्य पुत्राः' आस्तिक-नास्तिक सभी जीव अमृत भगवान्‌के पुत्र हैं। जैसे सिंहका पुत्र सिंह ही होता है, वैसे ही अमृतका पुत्र अमृत ही होता है। भगवान्‌का सच्चिदानन्दस्वरूप जीवमें भी है। जो