भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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विभीषण-शरणागति ६२१ यों ही मन मेरो मेरे कामकौ रह्यो न माई, स्याम रँग ह्वै करि समानो स्याम रंगमें ॥ अभिप्राय यह है कि गुण-दोषका पर्यवेक्षण छोड़कर परमानन्दरससार सिन्धुसर्वस्वमें डूबा हुआ प्रेमानन्दमय प्रेमी सर्वत्र अपने परमप्रियतम प्रेमास्पद प्राणधनको ही देखता है। उसे समस्त नामरूपक्रियात्मक प्रपंचका भान ही नहीं रहता। ऐसी ही स्थितिमें एक व्रजांगना कहती है— जित देखौं तित स्याममई है। स्याम कुंज बन, जमुना स्यामा, स्याम गगन घनघटा छई है॥ सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है। मैं बौरी, की लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है॥ चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद स्याम काम बिजई है। नीलकंठको कंठ स्याम है, मनो स्यामता बेल बई है॥ श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीपसिखापर स्यामतई है। नर-देवनकी कौन कथा है, अलख-ब्रह्म-छबि स्याममई है॥ इसी प्रकार भूतभावन सदाशिव शंकर विश्वनाथजीकी परमान्तरंगा अनन्योपासिका पार्वतीजीको सप्तर्षियोंने शंकरजीके अनेकानेक दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसद्गुणसम्पन्न भगवान् विष्णुमें मन लगानेको कहा, तब आद्याशक्ति, महाचिति, अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननी शिवजीकी परमान्तरंगा भगवतीने उत्तर दिया— जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥ महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८१।५; दो० ८०) अहा ! प्रेमकी बात ही निराली है। प्रेमी प्रेमपाशमें बँधकर अपने जीवनको भी खतरेमें डाल देता है, पर अपनी टेक नहीं छोड़ता। चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई ॥ (रा०च०मा० २।२०५।४) प्रेमियोंमें चातक अग्रगण्य समझा जाता है। वह स्वातिबूँदको छोड़कर गंगाजलको भी जो कि साक्षात् ब्रह्मद्रव है, पान करना पसन्द नहीं करता, भले ही पिपासाके कारण प्राणपखेरू उड़ जायँ। पवित्रसलिला, पतितपावनी श्रीजाह्नवीके पावन तटके ऊपर किसी वृक्षपर एक पपीहा रहता था। अचानक वह एक दिन घायल होकर गंगाजीमें गिर पड़ा। गिरते समय अपने बच्चोंको पुकारकर उसने कहा—'देखना, कहीं मेरा पिण्डदान गंगाजलसे न करना।' वह स्वयं जलमें तो गिर पड़ा, किंतु मुखमें गंगाजल न चला जाय, इसलिये अपनी चोंच बन्द कर ली। यह है चातककी टेक। यदि मरणकालमें प्राणीके मुखमें गंगाजल पड़ जाय तो वह मुक्त हो जाय, किंतु मुक्तिको ठुकराकर पपीहेने अपने प्रेमकी रक्षा की। भ्रमरका भी प्रेम विचित्र है। पाषाणसदृश काष्ठमें भी छिद्र बनाकर निकल जानेका सामर्थ्य रखनेवाला भ्रमर कमलकोशमें बँध जाता है। एक भ्रमर था, वह कमलके भीतर बैठा मकरन्दरसका पान कर रहा था और उसके सौगन्ध्यसे मस्त हो रहा था। इतनेमें सन्ध्या हो आयी। सूर्यास्त होते ही कमल बन्द हो गया और मोटे-मोटे शाल और शीशमके पेड़ोंको भी छेद डालनेकी ताकत रखनेवाला भ्रमर उसके अन्दर ही रह गया और विचार करने लगा—'रात बीत जायगी, प्रातःकाल होगा, भगवान् भास्करकी किरणरश्मियोंसे कमल फिर खिल जायगा, तब मैं इसमेंसे निकल जाऊँगा। तबतक आनन्दसे मकरन्दका आस्वादन करता रहूँ।' वह यों विचार कर ही रहा था, इतनेमें एक मत्त गयन्दने आकर कमलको उखाड़कर मुँहमें डाल लिया और कमलके साथ भौंरा भी हाथीके दाँतोंसे पिस गया— रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजश्रीः। इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार॥ यदि वह चाहता तो बड़ी सुगमतासे कमलकोशके बाहर आ जाता, परंतु प्रेमबन्धन बड़ा ही मजबूत होता है। इसी प्रकार प्रेमके ही कारण पतंग दीपकपर बैठकर जल जाता है। मृगयु (बहेलिये)-के