भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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६२० भक्तिसुधा


हैं, देवाधिदेव हैं, सर्वतन्त्रस्वतन्त्र हैं, दिव्यातिदिव्य सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण हैं एवं परमानन्दरससारसिन्धुसर्वस्व हैं इत्यादि, क्योंकि किसी गुणको देखकर जो प्रेम होता है, वह तो गुण न दीखनेपर नष्ट हो जा सकता है। परंतु विशुद्ध दिव्य प्रेममें गुण-गणोंकी अपेक्षा ही नहीं होती। प्रेमी अपने प्रेमास्पदमें प्रेम ही करता है, चाहे वह अचिन्त्य अनन्तकल्याणगुणगणनिलय हो अथवा सर्वगुणविहीन हो, चाहे सुन्दरातिसुन्दर, दिव्यवसनभूषण-अलंकारसे सुसज्जित हो, चाहे सौन्दर्यविहीन हो। चाहे दिव्यातिदिव्य ऐश्वर्यसम्पन्न हो, चाहे दीन, हीन, दरिद्र हो, चाहे सर्वतन्त्रस्वतन्त्र हो, चाहे बन्धनयुक्त हो। एक बार महात्मा तुलसीदासजी श्रीमद्वृन्दारण्य- धाममें गये, वहाँ व्रजेन्द्रनन्दन, श्यामसुन्दर, मदनमोहन, आनन्दकन्द, परमानन्द श्रीकृष्णचन्द्रके उपासकोंने उनसे कहा—'महात्मन्! आप व्रजेन्द्रनन्दन, श्यामसुन्दर, मदनमोहन, सौन्दर्यमाधुर्यरसामृतसारभूत श्रीकृष्णचन्द्रकी उपासना छोड़कर श्रीराघवेन्द्रजीकी उपासना क्यों करते हो? क्या आपको मालूम नहीं कि श्रीराघवेन्द्रजी १२ कलाके एवं श्रीकृष्णजी १६ कलाके पूर्ण अवतार हैं?' उन व्रजभक्तोंकी यह बात सुनते ही श्रीतुलसीदासजी ऐसे प्रेमविभोर हो गये कि उन्हें अपना भान ही न रहा और बेहोश होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। गोस्वामीजीकी ऐसी दशा देखकर वे व्रजवासी घबराये और बेहोशी दूर करनेके लिये तरह-तरहका उपचार करने लगे। उन्हें यह पश्चात्ताप होने लगा कि हमने इनके उपास्यकी हीनता बतलाकर इनके हृदयको क्यों कष्ट पहुँचाया। अन्ततोगत्वा कुछ समयोपरान्त उनको होश हुआ। व्रजभक्तोंके पूछनेपर उन्होंने कहा कि 'अभीतक तो मैं आनन्दकन्द कोसलचन्द्र श्रीमद्राघवेन्द्रजीको कोसल- राजकिशोर जानकर, श्रीकौसल्या अम्बाका ललन जानकर एवं रघुराजजीके मंगलमय मनोहर गुण-गणोंकी ओर आकर्षित होकर ही उनकी उपासना करता था, किंतु आज आपसे यह जानकर कि हमारे राघवजी भगवान्‌के अवतार तो हैं, चाहे १२ कलाके हों, चाहे इससे भी कम, मैं परमानन्दरससारसमुद्रमें डूब गया।' यह है विशुद्ध प्रेमका ज्वलन्त उदाहरण ! इसी प्रकार एक बार श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें रासलीलाके समय योगीन्द्रमुनीन्द्रवन्दितपादारविन्द, लीलाविहारी, वंशीधर, श्यामसुन्दर श्रीकृष्णचन्द्र, परमानन्दकन्द अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्धान हो जानेसे श्रीश्रीव्रजांगनाएँ शोक-विह्वल होकर एवं अपने निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमास्पद, प्राणधन, व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके विप्रयोगजन्य तीव्र तापसे दुःखी होकर इधर-उधर भटक रही थीं और अशोक वृक्ष एवं नागेश्वरसे पूछती थीं कि 'हे तरुओ ! आपने हमारे प्राणप्यारेको इधर कहीं जाते देखा हो तो कहो। हम आपका बड़ा अनुग्रह मानेंगी।' अभिप्राय यह कि उन्मत्त एवं शोकाकुल होकर इधर-उधर फिर रही थीं। इतनेमें भगवान् श्रीकृष्ण उनकी प्रेमपरीक्षा लेनेके लिये दिव्य, चिन्मय वसन-भूषण-अलंकारसे अलंकृत, सुसज्जित होकर सौन्दर्यनिधि विष्णुरूपमें प्रकट होकर उनके सामने आये। उनको देखते ही व्रजांगनाएँ सकुचा गयीं और घूँघटसे अपना-अपना मुख छिपा लिया। उनके व्यवहारको देखकर मायातीत, विज्ञानानन्दघन, परमात्मा, भक्तोंके प्रिय भगवान् विष्णुने कहा—'व्रजांगनाओ! क्यों सकुचाती हो ? आओ, हमारे संग रासलीलामें सम्मिलित हो, तुम्हारे श्याम- सुन्दरसे क्या हमारी शोभा कुछ कम है ?' सारांश यह कि भगवान् विष्णुके ऐसे अनेकानेक प्रलोभनोंमें वे न आयीं। तब भगवान् उनको प्रेमपरीक्षामें उत्तीर्ण समझकर मंगलमय श्रीकृष्णचन्द्र श्यामसुन्दरके रूपमें प्रकट हुए और रासलीला प्रारम्भ हुई। इन महाभागा व्रजांगनाओंकी चित्तवृत्ति ही श्याममयी बन गयी थी, जिसका वर्णन श्री देवकविने इस तरह किया है— औचक अगाध सिंधु स्याहीकौ उमड़ि आयो, तामें तीनों लोक बूड़ि गए एक संगमें। कारे-कारे आखर लिखे जु कारे कागद सु न्यारे करि बाँचे कौन जाँचे चितभंगमें॥ आँखिनमें तिमिर अमावसकी रैन जिमि, जंबूनद-बूंद जमुना-जल-तरंगमें।