भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 629

इस तरह प्राणिमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित हैं। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा ? परंतु स्वतन्त्रताके वास्तविक रूपका विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी भगवान्‌का स्वरूप है, क्योंकि बिना असंग सच्चिदानन्दको प्राप्त किये बन्धनमुक्ति एवं स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निरालम्बन है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण देहका सम्बन्ध विद्यमान है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी ? भले ही कोई माता, पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, विपत्ति, दरिद्रता, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ेगा; क्योंकि जबतक कुछ स्वतन्त्रताका त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना एवं ज्ञानद्वारा मल, विक्षेप, आवरणको दूरकर शरीरत्रयबन्धन किंवा जीवभावसे मुक्त होकर निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर ले, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल नहीं सकता। इस विवेचनसे यह स्पष्ट होता है कि यह बन्धन, मुक्ति और स्वातन्त्र्य भी सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, प्रत्यगभिन्न, सच्चिदानन्द भगवान्‌का ही स्वरूप है। इसी तरह प्राणिमात्रको यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ। यहाँतक कि माता-पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। यह सभी भाव जीवभावके रहते पूर्ण नहीं हो सकते। समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्‌के ही परतन्त्र हो सकते हैं। जब आस्तिक-नास्तिक सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यता या सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक भी जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, वह तत्त्व भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, परब्रह्म भगवान् नहीं हैं; क्योंकि प्राणिमात्रके अन्तरात्मा भगवान् ही हैं, फिर उनसे विमुख होकर निःसत्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा ? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिजीकी उक्ति है कि 'लोके न हि स विद्यते यो न राममनुव्रतः।' लोकमें कोई ऐसा हुआ नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। भगवान्‌के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है निजी सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणिमात्रकी भगवदनुगामिता है। भेद यह है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे नहीं जानते। अस्तु, स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञानपूर्वक प्रभुको ही 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्' (गीता ९।१८) जानकर उनसे प्रेम करना चाहिये। भगवान्‌के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है। भक्तिसे ही पूर्णानुरागरससारसिन्धु मर्यादापुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके प्रत्यक्ष दर्शन हो सकते हैं। 'रसो वै सः। रसꣳ ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।' भक्तिसे ही अरविन्दनयन भगवान्‌के श्रीचरणार- विन्द-मकरन्दरसका समास्वादन प्राप्त होता है। प्रेमी भक्त श्रीआनन्दकन्द कोसलचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्ष- पातसे युक्त अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका पान करनेमें ही अपनेको कृतकृत्य समझते हैं और निर्निमेष नयनोंसे उसी दिव्य रूपमाधुरीका पान करते हुए आनन्दोन्मत्त हो जाते हैं। इनका भगवान्‌में स्वाभाविक सहज, अकृत्रिम प्रेम होता है। विशुद्ध प्रेममें कुछ भी कामना नहीं होती। इसी विशुद्ध प्रेमका वर्णन देवर्षि नारदने अपने भक्तिसूत्र (५४)- में किया है—'गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण- वर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम् ॥' प्रेमीको अपने निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद प्राणधन भगवान्‌में गुण-दोष देखनेका अवकाश ही नहीं मिलता। वे इसलिये भगवान्‌में प्रेम नहीं करते कि हमारे भगवान् अचिन्त्य, अनन्तकल्याणगुणगणनिलय हैं, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक हैं, सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश