भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१८ भक्तिसुधा शरावादि मृत्तिकासे वियुक्त नहीं होते, कटक-मुकुटादि सुवर्णसे पृथक् नहीं होते, वैसे ही जीवात्मा कभी भी भगवान्से विमुख नहीं होता। इस तरह अपने असली सम्बन्धी भगवान्को भूल जानेसे ही प्राणी अनेकानर्थपरिप्लुत भवाटवीमें ही भटकता है और दुःख पाता है। जब कभी भी सावधान होकर वह भगवान्की ओर दृष्टि करता है, प्रभु उसपर पूर्ण कृपा करके अपना लेते हैं। विभीषण-शरणागति भगवान्के चरणपंकजमें पहुँचे बिना, इस अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनाट्यके सूत्रधार प्रभुके शरण गये बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती। पृथ्वी, जल, तेज, सूर्य, अग्नि, चन्द्रमण्डल, नक्षत्रमण्डल जिसके संकेतपर नाचते हैं, उसकी शरणागतिके बिना अखण्ड शान्ति कहाँ ? पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण शान्ति एवं पूर्ण नियामकत्व भगवान्में ही होता है। सब लोग चाहते हैं कि 'आनन्दस्वरूप बन जाऊँ, पूर्ण स्वतन्त्र हो जाऊँ, सबका नियमन- शासन करूँ।' इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द अत्यन्त प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही आनन्द होता है। स्पष्ट ही है कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री-पुत्रादिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही वे द्वेष्य हो जाते हैं। परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहते हैं। कभी किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह नास्तिकसे भी नास्तिक आनन्दको चाहता है, उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील और उसके लिये लालायित होता है। परंतु उसमें पहचाननेकी ही कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे वह पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन स्त्री-पुत्रादि, शब्द, स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। विवेचन करनेसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम-द्वेष होता है, वह सुख नहीं है। सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। सांसारिक सम्भोग-साधन- पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं हैं। किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णा-प्रशमनके अनन्तर शान्त, अन्तर्मुख मनपर जिस सुखका आभास पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो शुद्ध अन्तरात्मा है, वही आनन्द है; क्योंकि जो लक्षण आनन्दका है, वही अन्तरात्माका भी है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं होता, ठीक वैसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता। अतः अन्तरात्मा ही आनन्द और निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमका आस्पद है। उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे 'अहं सुखी' इत्यादि व्यवहार होता है। वही सुख किंवा अन्तरात्मा है। इसीके लिये समस्त कार्य- करणसंघातकी प्रवृत्ति होती है। यही सुख-दुःख- मोहात्मक, नानात्मक संघातसे विलक्षण, सुख-दुःख- मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही सच्चिदानन्दका आनन्दरूप है। जीवभावसे मुक्त हुए बिना पूर्ण स्वातन्त्र्य सम्भव नहीं इसी तरह प्राणिमात्र स्वतन्त्रता चाहता है। एक चींटीको भी पकड़नेपर वह व्याकुलताके साथ हाथ- पैर चलाती है। शुक-सारिकादि विहंगम सुवर्णके भी पंजरमें रहकर सुन्दर, मधुर, भक्ष्य-पेयको नहीं पसन्द करते, किंतु बन्धनमुक्त होकर स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलोंको भी खाकर जीवन बिताना अच्छा समझते हैं।