भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसबसे सगे भगवान् ६१७ एक वहम है' तब कहीं व्यापक भूकम्पोंद्वारा, कहीं महामारियोंद्वारा, कहीं प्राकृतिक विकट तूफानों या विश्वव्यापी नरसंहारोंद्वारा प्राणियोंको परमात्माका स्मरण दिलाया जाता है। फिर भी जैसे कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा अपने शिशुओंका कभी भी अहित नहीं चाहती, वैसे ही प्रभु भी कभी भी प्राणियोंका अहित नहीं चाहते। तभी तो वे निरीश्वरवादी प्राणियोंका भी कल्याण चाहते हैं। उनपर भी कुपित नहीं होते। इसी आशापर तो ब्रह्माने कहा था कि 'हे नाथ ! यद्यपि मैंने आपकी कौतुकपूर्ण क्रीड़ामें विघ्न डाला, आपके बछड़ों और ग्वालबालोंका हरण करके बड़ा ही अपराध किया तथापि प्रभो, जैसे अम्बा गर्भगत शिशुके पैर चलानेको अपराध नहीं मानती, वैसे ही आप भी हमारे ऐसे कर्मोंपर ध्यान न दें। प्रभो, सम्पूर्ण विश्व ही आपके उदरमें है फिर गर्भगत शिशुके समान ही प्राणियोंके अपराधोंको क्षमा करना क्या उचित नहीं है ?' उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध ही स्थिर है प्रभुने क्षमा भी कर दिया। उन्होंने सरल-से- सरल उपाय शास्त्रोंद्वारा बता रखा है। पत्र, पुष्प, फल, जल, नमस्कारसे ही प्रभु प्रसन्न हो सकते हैं। कुछ भी न हो तो केवल मनसे ही पूजन, स्मरण और वह भी न बने तो भाव, कुभाव जिस किसी तरह भगवान्के नाम- जपसे ही परम गति प्राप्त हो सकती है। जब एक अदृष्टकी, जो वस्तुतः सबका द्रष्टा या असली स्वरूप है, उसपर विश्वास होगा, तब सम्पूर्ण दुनियाके सम्बन्ध, नाते अपने-आप फीके लगने लगेंगे। संसारके कलत्र, मित्र, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, क्षेत्र, वित्त आदि सभी वस्तुओंका सम्बन्ध केवल स्थूल देहके साथ ही है। उसके नष्ट होते ही वे सब सम्बन्ध अपने-आप ही छूट जाते हैं। 'यदद्य पच्यते ह्यन्नं सायं तच्च विनश्यति ।' जो भात आज प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक सड़ जाता है। उसमें दुर्गन्ध आने लगती है। फिर, ऐसे विनश्वर, क्षणभंगुर शरीरका आत्माके साथ कहाँतक सम्बन्ध रह सकता है? एक जन्मकी बात कौन कहे, जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंके देहों एवं तत्सम्बन्धी पुत्र, पौत्र, कलत्रोंका स्मरण करें तो चित्तकी क्या दशा होगी? यही समझकर आचार्यचरणोंने कहा है— कति नाम सुता न लालिता कति वा नेह वधूरभुञ्जिहि। क्वनु ते क्वनु ताश्च वा वयं भवसङ्गः खलु पान्थसङ्गमः॥ जन्म-जन्मान्तरोंमें कितने पुत्रोंका लालन नहीं किया, कितनी सुन्दरी रमणियोंका संस्पर्श नहीं किया, परंतु आज कहाँ वे पुत्रादि, कहाँ वे रमणियाँ, कहाँ हम सब ? यह संसारका संगम केवल यात्रियोंके संगके समान अस्थिर है। स्थिर सम्बन्ध तो एकमात्र भगवान्का ही है, जो कि स्वर्ग, नरक, कहीं भी जीवका संग नहीं छोड़ते। जीवात्मा और परमात्मा दोनों ही एक शोभन पंखवाले सुपर्ण पक्षी हैं, दोनों सुपर्ण एक जातिके पक्षी हैं, इसलिये भी उन दोनोंका आपसमें मुख्य सम्बन्ध है। साथ ही दोनोंकी परस्पर पूर्ण मैत्री है। परमात्मा पालकसखा है, जीवात्मा बालकसखा है। दोनोंहीकी 'चेतन अमल सहज-सुख-राशिरूप' से ख्याति भी है। कहीं साजात्य सख्य होनेपर भी दुर्दैवयोगसे भिन्न देशमें रहनेके कारण सम्बन्ध कमजोर हो जाता है। परंतु यहाँ तो एक ही शरीररूप वृक्षपर जीवात्मा-परमात्मा दोनों ही पक्षी रहते हैं। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्य—तीनों तरहके सम्बन्ध दृढ़ हैं। यद्यपि भगवान् जड़वर्गसे सर्वदा असंस्पृष्ट और निर्लेप ही रहते हैं तथापि चिद्रूप जीवात्माके साथ तो भगवान्का तादात्म्य या अभेद सम्बन्ध रहता है। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्यके समान ही सायुज्य भी सर्वदा ही रहता है। जैसे कभी घटाकाश महाकाशसे वियुक्त नहीं होता, तरंग जलसे पृथक् नहीं होती, घट-