भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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सम्प्रदायभेदसे भस्म, गोपीचन्दन आदिकी भी व्यवस्था बतायी गयी है। उसमें भी यह व्यवस्था शुद्ध शास्त्रीय है कि स्नान करके मृत्तिका और होम करके भस्म और देवपूजनके पश्चात् चन्दन आदि लगाया जाय; क्योंकि भस्म वैदिकोंके लिये किसी अवस्थामें त्याज्य नहीं हो सकता। यहाँ कोई प्रश्न कर सकता है कि 'यद्यपि इस तरहसे किसी भी देवताकी आराधना, भस्म, रुद्राक्ष, गोपीचन्दनादिका धारण संगत मालूम होता है तथापि साम्प्रदायिक लोगोंकी बातें सुनकर जी घबराता है। कोई शिवजीके तथा भस्म-रुद्राक्षके निन्दनमें सहस्रों वचन उपस्थित करते हैं तो कोई विष्णु तथा गोपीचन्दनादिके निन्दनमें सहस्रों वचन देते हैं। इसका क्या आशय है? उनको यही उत्तर दिया जा सकता है कि कुछ वचन तो निन्दामें तात्पर्य न रखकर एककी स्तुतिमें ही तात्पर्य रखते हैं। जैसे शैवोंकी शिवमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये विष्णुके निन्दासूचक और विष्णुमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये शिवके निन्दापरक वचन कहे जा सकते हैं, परंतु कुछ ऐसे भी वचन हैं, जिनका सिवा राग-द्वेषके और कोई मूल ही नहीं हो सकता। बहुत-से सद्ग्रन्थ साम्प्रदायिकोंके कलहोंमें बिगाड़े गये हैं। इसीलिये तो गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ (रा०च०मा० ४।१४) ऐसे ही यह भी प्रश्न होता है कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके आचार और व्यवहार प्रचलित हैं। उन-उन सम्प्रदायोंमें कहा यह जाता है कि बिना इन आचारोंके प्राणीका कल्याण हो ही नहीं सकता। चाहे कितना भी वैदिक शुद्ध ब्राह्मण क्यों न हो, परंतु इन आचारोंके बिना उसके हाथसे जल भी अग्राह्य है। ऐसे ही दूसरे साम्प्रदायिक अपने आचारोंके विषयमें भी उपर्युक्त बात ही कहते हैं। जिस आचारसे एक सम्प्रदाय परम कल्याण कहता है, उसी आचारसे दूसरा सम्प्रदाय सर्वथा पतन बतलाता है। एक वैसे आचारविहीनके दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं तो दूसरे उसी आचारयुक्तवालेके ही दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं। इसका यही उत्तर देना ठीक है कि जिसके सम्प्रदायमें जो आचार प्रचलित है, उसीके लिये उक्त उपदेश ठीक है और जिसके पितृ- पितामहादिमें जो आचार नहीं हैं, उन्हें नहीं ग्रहण करना चाहिये। विवादका मूल यही है कि लोग दूसरे सम्प्रदाय तथा आचार्योंकी निन्दा करके अपने सम्प्रदायके आचारों एवं सिद्धान्तोंको स्वीकार करना चाहते हैं और जब वैसा ही दूसरे लोग करते हैं, तब फिर क्षुब्ध होते हैं। वे 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥' (गीता ६।३२) भगवान्के इन भावोंको भूल जाते हैं। लोगोंको इस बातपर अवश्य ध्यान देना चाहिये कि जैसे कोई हमारे साम्प्रदायिक व्यक्तिको अपने सम्प्रदायमें मिलाता है तो हमें क्षोभ होता है, वैसे ही यदि हम भी दूसरे सम्प्रदायके व्यक्तिको अपनेमें मिलायेंगे तो अन्य लोगोंको भी वैसे ही क्षोभ होगा। परंतु प्रायः देखते-देखते कितने स्मार्त भिन्न सम्प्रदायोंमें मिला लिये जाते हैं। साथ ही कहीं-कहीं कोई साम्प्रदायिक भी स्मार्त बना लिये जाते हैं। यही राग- द्वेषका मूल इतना बद्धमूल हो गया है कि हिन्दू- मुसलमानोंसे भी कहीं अधिक घनिष्ठ संघर्ष साम्प्रदायिकोंमें दृष्टिगोचर होता है। कृपापरवश भगवान्द्वारा अनेक मंगलमय स्वरूपोंका धारण वेदान्तवेद्य, पूर्ण परब्रह्म भगवान् ही सकल सच्छास्त्रोंके महातात्पर्यके विषय हैं और यही वर्णाश्रमानुसार सर्व कर्म-धर्मसे समर्हणीय हैं। इनका अपरोक्ष साक्षात्कार ही जीवनका चरम फल है। परंतु प्रथमसे ही प्राणियोंका मन इन परम-दुरवगाह्य भगवान्के मनोवचनातीत स्वरूपमें प्रवेश नहीं कर सकता। अतः परमकरुण प्रभु भक्तानुग्रहार्थ ही अपने अनेक प्रकारके