भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

इष्टदेवकी उपासना ६०३ उपासनाके लिये अपनी कुल- परम्पराका समादर योगवासिष्ठके विपश्चिदाख्यानमें मृगरूपसे समागत विपश्चित्को देखकर श्रीवसिष्ठजीने यही विचार किया था कि जिस व्यक्तिका जो स्वरूप कभी भी उपास्य हो, उसका कल्याण उसके ही द्वारा सुगम होता है। यह समझकर करोड़ों जन्मके पहले अग्निकी उपासना करनेवाले मृगरूप विपश्चित्के सामने अपने योगबलसे उन्होंने अग्निका प्राकट्य किया। अग्निका दर्शन होते ही वह मृग ऐसी स्नेहभरी दृष्टिसे अग्निको देखने लगा, जैसे अग्निके साथ उसका कोई बहुत पुराना सम्बन्ध हो। अनन्तर वसिष्ठजीकी कृपासे उसका कल्याण हुआ। अस्तु, प्रकृतमें कहना यही है कि स्वप्नदर्शन तथा माहात्म्यश्रवण आदिसे चित्तका आकर्षण देखकर अपने इष्टदेवका निर्णय करना चाहिये। यह स्पष्ट है कि अनेक जन्मके साधनोंसे प्राणीकी उपासनामें उन्नति होती है। जन्म-जन्ममें मार्ग-परिवर्तन करनेसे यथेष्ट लाभ सम्भव नहीं है। अतः पूर्वकी उपासनाके संस्कारका ज्ञान करके उसी उपासनामें प्रवृत्त होना चाहिये। पितृपितामह-परम्पराकी उपासनाओंके अनुसार ही प्राणीको उपासना करनी चाहिये। वर्तमान जन्मकी सत्प्रवृत्ति और दुष्प्रवृत्तिमें पिछले जन्मोंके संस्कार भी अपेक्षित होते हैं। यदि किसीको दुर्देववश किसी ऐसे देश-कालमें ऐसे माता-पिता, गुरुजनों तथा ग्रन्थोंका संसर्ग हुआ कि जिनसे दुराचार-दुर्विचारको ही उत्तेजना मिली तो उस व्यक्तिके लिये दुःसंग और असद्विचारवाले शास्त्रोंको छोड़कर सत्पुरुषसंग, सच्छास्त्रके अभ्यास एवं तदनुसार सदाचार-सद्विचारके सम्पादनमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जिसे पूर्वसंस्कारके अनुसार शुद्ध विचारवाले देश-काल तथा माता-पिता एवं गुरुजनोंका संयोग प्राप्त हुआ और सच्छास्त्र ही अध्ययन करनेको मिले, उसके लिये सदाचार-सद्विचारकी वृद्धिमें बड़ी सहायता मिलती है। इसीलिये प्रायः सन्मार्गस्थ सदाचारीको उसकी भावना और उपासनाके अनुसार ही समीचीन देश-काल और माता-पिता तथा शास्त्रोंका संसर्ग मिलता है। इसी बातकी इंगना श्रीभगवान्ने 'शुचीनां श्रीमतां गेहे' 'अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।', 'पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।' (गीता ६।४१-४२,४४) इत्यादि वचनोंसे की है। इसीलिये यह बहुत सम्भव है कि हमारी उपासनाके अनुकूल ही कुलमें हमारा जन्म हुआ हो। अतः हमें माता-पिता, गुरुजनोंके अनुसार ही उपासना करनी चाहिये। यों भी इस बातके समझनेमें सुगमता होगी कि जैसे कोई पुरुष किसी अपरिचित मार्गसे किसी अभीष्ट देशमें जा रहा हो, आगे चलकर उसे तीन मार्ग दिखायी दें और तीनोंपर कुछ लोग चल रहे हों, प्रश्न करनेपर सभी अपने मार्गको ही निर्विघ्न बतलाते हों, साथ ही दूसरे मार्गोंको नाना प्रकारके सिंह- व्याघ्र-सर्प-वृश्चिक-कण्टकाकीर्ण गर्तोंसे उपद्रुत बतलाते हों, ऐसी स्थितिमें यदि जाना आवश्यक ही हो तो वह प्राणी किस मार्गका अवलम्बन करेगा? समझदार तो यही कहेंगे कि उन मार्गानुगामियोंमेंसे अधिक विश्वास उन्हींपर किया जा सकता है; जो अपने राष्ट्र, प्रान्त, नगर तथा ग्रामके हों या अपने कुटुम्बियोंमेंसे हों। यह बात दूसरी है कि जब बहुत विशिष्ट अनुभवोंसे उस मार्गके दूषित तथा मार्गान्तरके निर्विघ्न होनेकी बात निश्चित हो गयी हो, तब किसी दूसरे मार्गका अवलम्बन किया जाय। इसलिये भी अपनी पितृ-पितामह-परम्परामें जो उपासना और आचार तथा शास्त्र मान्य हों, वही उचित हैं। वेदने भी 'किंस्वित् पुत्रेभ्यः पितरावुपावतः' इस वाक्यसे परम्परागत आचारका समर्थन किया है। श्रीनीलकण्ठजीने इसका यही अभिप्राय बतलाया है कि पुत्रके हितके लिये माता, पिता या पितामह- प्रभृतिने जिस व्रतका पालन किया हो या जिस देवताकी उपासना की हो, उस पुत्रको उसी व्रत या देवताका अवलम्बन करना चाहिये। ऐसे ही