भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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६०२ भक्तिसुधा करता हूँ। तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरी जो परमशक्ति है, उसको देनेवाले सुदर्शनचक्रके दाता श्रीविश्वनाथ ही हैं। पूर्वकालमें जालन्धर नामका एक दैत्य हुआ था, जिसके पराक्रमसे मैं भी भयभीत हो गया था। किंतु भगवान् श्रीशंकरने अपने पैरके अँगूठेके अग्रभागसे चक्र बनाकर, उससे जालन्धरको मार डाला था। अपने नेत्रकमलोंसे भगवान् शंकरकी पूजा करके मैंने वही चक्र उनसे प्राप्त किया। दैत्यसमुदायको मर्दन करनेवाला वही यह सुदर्शनचक्र मेरे पास है। समस्त दुष्ट प्राणियोंको भगानेवाले उस सुदर्शनचक्रको तुम्हारी रक्षाके लिये आगे भेजकर मैं यहाँ आया हूँ। अब इस समय श्रीविश्वनाथका दर्शन करनेके लिये मैं काशीकी ओर चल रहा हूँ। उसके बाद पंचक्रोशीकी सीमाके पास पहुँचकर वे गरुड़से नीचे उतरे और उन्होंने ध्रुवका हाथ पकड़कर मणिकर्णिकामें स्नान किया। फिर श्रीविश्वनाथका पूजन करके ध्रुवके हितकी कामनासे कहा—हे ध्रुव ! तुम इस अविमुक्त वाराणसीक्षेत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्‌के लिंगकी स्थापना करो। इससे त्रैलोक्यस्थापन करनेका अक्षय पुण्य तुम्हें प्राप्त होगा' इत्यादि। ऐसे इस गम्भीर शास्त्रीय अभिप्रायको न समझकर शैव-वैष्णव-नामधारी पाखण्डसे नष्टबुद्धि मायामोहित जन ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रमें भेदभाव देखते हैं। यह नहीं जान पाते कि वे तीनों एक ही सच्चिदानन्दघन पूर्ण अद्वितीय तत्त्व हैं। ब्रह्माणं केशवं रुद्रं भेदभावेन मोहिताः। पश्यन्त्येकं न जानन्ति पाषण्डोपहता जनाः ॥ वे ऐसे सैकड़ों शास्त्रवचनोंसे उपदेश किये गये अभेदको नहीं देखते। इस बातकी उपेक्षा करते हैं कि एक ही परमकारण तत्त्व अनेक रूपमें विराजमान है। उन परमेश्वरके अनेक रूपोंमेंसे किसी एकको लेकर दूसरे रूपोंकी निन्दा करते हुए आपसमें कलह करते हैं। ऐसा करके मानो अपने उसी आराध्य भगवान्‌से ही द्रोह करके नरकमें जानेकी तैयारी करते हैं। एक-दूसरेपर अनन्य प्रीति करनेवाले दो मालिकोंके नौकर यदि एक-दूसरेके स्वामीकी निन्दा करें तो वे दोनों जैसे स्वामिद्रोही ही कहे जाते हैं, वैसे ही एक- दूसरेके आत्मा और एक-दूसरेके ध्यानमें निमग्न मा- धव श्रीविष्णु और उमा-धव श्रीशिवकी निन्दा करनेवाले स्वामिद्रोही ही हैं। जिस रूपमें प्रीति हो, उस रूपकी उपासना करनी चाहिये कोई जिज्ञासु ऐसा प्रश्न कर सकता है कि भगवान् शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि देवताओंमेंसे किसकी उपासना करनी चाहिये ? कोई किसीको निकृष्ट तो कोई किसीको बड़ा बतलाता है। ऐसी स्थितिमें बुद्धि व्याकुल हो जाती है। इसका उत्तर यही हो सकता है कि भगवान्‌के विचित्र प्रपंचमें विचित्र स्वभावके जीवोंका निवास है। इसीलिये श्रीभगवान् भिन्न स्वभाववाले जीवोंकी विभिन्न रुचियोंका अनुसरण करके विभिन्न रूपोंमें प्रकट होते हैं। किसीका चित्त भगवान्‌के किसी स्वरूपमें खिंचता है, किसीका किसीमें। वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें सर्वोत्कृष्ट रूपसे प्रतिपादित सभी रूप भगवान्‌के ही हैं। अतः जिस रूपमें प्रीति हो, उसी रूपकी उपासना करनी चाहिये। अनभिज्ञ लोग एककी निन्दा और दूसरे रूपकी प्रशंसा करते हैं, अभिज्ञ तो सभी रूपोंमें अपने प्रभुको ही देखकर सन्तुष्ट होते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अनेक विद्याओंमें निपुण होनेके कारण अपने अनेक वेष और नामोंसे अनेक कार्य करता हो, भिन्न-भिन्न कार्यार्थी पृथक् वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों और उसे ही सर्वोत्कृष्ट समझने लगें। दूसरे लोग दूसरे वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों। उनमें कुछ लोग किसी रूपके प्रशंसक हों और कुछ किसीके निन्दक हों, इसलिये परस्पर युद्ध होने लगे, वहाँ जो लोग वस्तु-स्थितिको जाननेवाले होंगे, वे तो दोनों ही विवादी दलोंकी मूर्खतापर परिहास करेंगे; क्योंकि वे दोनों ही वेषोंमें एक ही तत्त्वको देखते हैं।