भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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ऐसे ही भक्त भगवान्‌को यदि अपने हृदयसे पृथक् करना चाहे तो भी नहीं कर सकता। इसीलिये तो व्रजांगना श्रीकृष्णसे अपना मन हटानेके लिये उनमें दोषानुसन्धान करती हैं—‘हे सखि! असितों (कालों)- से सख्य नहीं ही करना चाहिये, परंतु क्या करें; श्यामसुन्दर श्रीव्रजेन्द्रनन्दनकी कथा और कथार्थ तो हमलोगोंके लिये दुस्त्यज ही है।' एक सखी श्रीकृष्ण- प्रेममें मूर्च्छित अपनी प्रियतमा सखीके उपचारमें लगी हुई थी। इतनेमें ही दूसरी सखी आकर कृष्णकी कुछ चर्चा चलाने लगी। उपचारमें लगी हुई सखी वारण करती हुई कहती है— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः। स्मारय किमपि तदितरद्विस्मारय हन्त मोहनं मनसः॥ हे सखि! यदि अपनी प्रिय सखीको विश्रान्ति लेने देना चाहती है तो यहाँ उन (श्रीव्रजराजकुमार)- की चर्चा न चला, परंतु किसी और बातकी याद दिलाकर किसी तरह मनमोहनको इसके मनसे भुला दे। महामुनीन्द्रगण बाह्य विषयोंसे मनको हटाकर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दमें मन लगाना चाहते हैं, किंतु ये व्रजदेवियाँ अपने मनमोहन श्रीकृष्णसे मन हटाकर अन्य विषयोंमें लगाना चाहती हैं। योगीन्द्रगण अपने हृदयमें जिसके स्मृति-लेशके लिये लालायित हैं, उन्हीं सर्वप्राणि-परप्रेमास्पद जीवनधन प्रभुको वे हृदयसे निकालना चाहती हैं। ठीक ही है, पूर्ण द्रवीभूत लाक्षा और उसमें स्थायिभावापन्न रंग, इन दोनोंका इतना अद्भुत घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है कि दोनोंका ही परस्पर पृथक् होना असम्भव है। उसी तरह भगवद्भावनासे द्रवीभूत अन्तःकरणपर भगवान्‌की स्थायिभावापत्ति होनेसे फिर परस्परका पार्थक्य असम्भव हो जाता है। यद्यपि जीवका भगवान्‌के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध इससे भी बहुत अधिक घनिष्ठ है, जैसे तरंगोंकी समुद्रके बिना स्थिति ही नहीं, वैसे भगवान्‌के बिना जीवकी सत्ता ही नहीं। सो तें ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ (रा०च०मा० ७।१११।६) भगवान्‌का स्वरूप ही प्रेम है तथापि स्वरूप-साक्षात्कारके पहले यह स्वाभाविकी निरतिशय निरुपाधिक प्रीति असम्भव है, अतः भगवान् और उनमें स्वाभाविकी प्रीति ये सभी उस द्रवावस्थारूप प्रणयके ही पराधीन हैं। इसीलिये किसी महानुभावने कहा है कि— अहो चित्रमहो चित्रं वन्दे तत्प्रेमबन्धनम्। यदबद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्म क्रीडामृगीकृतम्॥ अहो आश्चर्य! मैं तो उस प्रेमबन्धनका वन्दन करता हूँ, जिससे बँधकर सबको मुक्ति देनेवाला और स्वयं नित्यमुक्त ब्रह्म भी भक्तोंका खिलौना बन जाता है। वस्तुतः निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पद पूर्णतम पुरुषोत्तमका स्वरूप ही प्रेम है। लोकमें यद्यपि प्रेम और उसका आश्रय एवं विषय ये तीनों पृथक् होते हैं तथापि अलौकिक दिव्य- प्रेममें तीनों ही एक हैं। अतएव ‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) इत्यादि वचनोंसे निरुपाधिक प्रेम और प्रेमास्पदका अभेद कहा गया है—‘प्रेमी प्रेम-पात्रनमें बतायी है अभेद वेद।' इसीलिये ‘जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद' (रा०च०मा० १।१८) इत्यादि वाक्योंसे महानुभावोंने मुख्य प्रेमी और प्रेमास्पद सीता और राममें अभेद कहा है। जैसे अमृत और उसकी मधुरिमाका अतिघनिष्ठ तादात्म्य-सम्बन्ध होता है, वैसे ही परमानन्दसुधासिन्धुसार-सर्वस्व श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र और उनकी माधुर्याधिष्ठात्री परमाह्लादिनी हृदयेश्वरी श्रीजनकनन्दिनीका भी अत्यन्त घनिष्ठ स्वरूपभूत ही सम्बन्ध है अर्थात् सर्वान्तरंग एवं सर्वसे सन्निहितमें ही सर्वोत्कृष्ट सम्बन्ध होता है। अन्तरंगता और सान्निध्यकी समाप्ति या पर्यवसान-निरतिशयता प्रत्यगात्मामें ही होती है। अतः प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्‌में ही प्राणियोंका मुख्य प्रेम होता है।