भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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रसकी अभिव्यक्ति अन्तःकरण प्राण तथा रोम-रोममें सर्वत्र फैल जाती है और आन्तर तथा बाह्य रूपसे सर्वथा ही भगवान्‌का अनुभव होने लगता है। अपने प्रियतम भगवान्‌के स्वरूपमें होनेवाले तीव्र राग और उनके विरह-व्यथामय तीव्र तापसे भावुकके गुणमय सर्व कोशोंका भस्मीभाव हो जाने और भावनामय भगवत्-सम्मिलनसौख्य रससे मन, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमके आप्यायन होनेपर बाह्य-आभ्यन्तर-सर्वरूपसे भगवत्तत्त्वका अवगाहन होता है। इस तरह जब अनिमित्ता भागवती भक्ति गुणमय कोशोंको जला देती है, तभी निरुपाधिक एवं निरावरण होकर भावुक अपने भगवान्‌से मिल सकता है। भगवद्विरह-व्यथा-तापमयी भक्तिसे जिसके अन्नमयादि पंचकोशरूप त्रिविध तनु नहीं तप्त हुए, वे परमतत्त्वामृतके समास्वादनके अधिकारी नहीं हो सकते। यही 'अतप्ततनूर्न तदामोऽश्नुते' इस श्रुतिका आशय है। 'तपसा कृच्छ्रा-दिना भगवद्विरहजन्यतीव्रतापेन शक्तिपरिणामभूतेन ज्ञानाग्निना वा न तप्ता तनूर्यस्य स तत् परमात्म-तत्त्वामृतं नाश्नुते।' कृच्छ्रादि तप, भगवद्विरह-जन्य तीव्र ताप और भक्तिके परिणामभूत ज्ञानाग्निसे जिनके स्थूल, सूक्ष्म, कारण-ये तीनों तनु नहीं संतप्त हुए, वे परमतत्त्वका आस्वादन कैसे कर सकते हैं? इसीलिये अनिमित्ता भागवती भक्तिको सिद्धिसे भी श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे निगीर्ण अन्नको जाठराग्नि पचा डालती है, वैसे ही अनिमित्ता भक्ति पंचकोशोंको जीर्ण कर देती है— अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) भक्ति ही ज्ञानरूपमें परिणत होकर मूल अविद्याका भी विध्वंस करती है। भट्टोजिदीक्षित 'क्लृपि संपद्यमाने च' इस वार्तिकके उदाहरणरूपमें कहते हैं—'भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, ज्ञानाकारेण परिणमते।' भक्त और भगवान्‌का अभिन्न सम्बन्ध श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान, वैराग्य—ये श्रीभक्तिके ही पुत्र बतलाये गये हैं। ज्ञान, भगवत्प्राप्ति, मुक्ति आदि यद्यपि भक्तिके फल हैं तथापि फलकी अपेक्षा साधनमें ही अधिक प्रीति युक्त होती है। यद्यपि धनका फल भोग, धर्म, मोक्ष ही है तथापि लोभी धनके संग्रह और रक्षाके सामने भोग, धर्म, मोक्ष इन सभी पुरुषार्थोंको तिलांजलि दे देते हैं; क्योंकि उनकी यही दृढ़ धारणा है कि यदि साधन है, तब सब साध्य सहजमें ही सिद्ध हो सकते हैं। माता योग्य पुत्रकी उत्पत्तिसे ही सौभाग्यवती समझी जाती है और पुत्र माताकी भक्तिसे ही सौभाग्यवान् होता है। अतः जहाँ ज्ञान, भक्तिका फल है, वहाँ भक्ति, ज्ञान तथा ज्ञानियोंकी भी परम पूज्य एवं भजनीय देवता है। द्रवीभूत लाक्षामें एकमेक हुए रंगकी तरह भक्तके प्रेमार्द्र हृदयमें एकमेक हुए भगवान् यदि चाहें तो भी पृथक् नहीं हो सकते— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) बरबस भी जिनके मंगलमय नामसे बड़ी-से- बड़ी पापराशि नष्ट हो जाती है, ऐसे परम-स्वतन्त्र सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् जिसके अन्तःकरणमें स्नेहार्द्रतारूप प्रणयपाशमें बँधकर निकल न सकें, वही प्रधान भागवत होते हैं। तभी तो किसी प्रेमीने रागसे पिघले हुए अपने अन्तःकरणमें उसी द्रवावस्थारूप प्रणयपाशसे प्रभुको बाँधकर उनकी सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्ता-महाशक्तिको भी कुण्ठित करके निःशंक होकर कहा है—'अच्छा, यदि आप मेरे हृदयसे निकल सको तो मैं आपके पौरुषको समझूँ'— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि चेद्यासि पौरुषं गणयामि ते॥