भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 600, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें५९० भक्तिसुधा परमानन्दघन ब्रह्म अद्भुत रसमय है इक्षु (ईख)-दण्ड और चन्दन-वृक्ष ही मधुर और सुगन्धित होते हैं। यदि कदाचित् इक्षुमें सुमधुर फल और चन्दन-वृक्षमें अति-सुन्दर और सुगन्धित पुष्प प्रकट हों तो उनकी मधुरता और सौगन्ध्यकी जितनी ही बड़ाई की जाय उतनी ही कम है। इसी तरह अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत आनन्दबिन्दुका उद्गमस्थान अचिन्त्य अनन्त परमानन्दघन ब्रह्म ही अद्भुत रसमय है। फिर उसके फलरूप मधुर मंगल स्वरूपमें कितना चमत्कार हो सकता है, यह सहृदय ही जान सकते हैं। इक्षुरससार शर्करासिता आदिका सार जैसे कन्द होता है, वैसे ही औपनिषद परब्रह्म-रससार भगवान्का मधुर मनोहर सगुण स्वरूप है। तभी किसीने श्रीकृष्णको देखकर कल्पना की थी कि क्या यह श्रीव्रजांगनाओंका प्रेमरससार-समूह है अथवा सात्वतवृन्दका मूर्तिमान् सौभाग्य है, किंवा श्रुतियोंका गुप्तवित्त ब्रह्म ही श्यामल मोहमयी मूर्तिको धारण करके प्रकट हुआ है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ इसी तरह— शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। धूलीधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ कुछ महानुभाव निगमाटवीके ब्रह्मतत्त्वान्वेषकोंके परिश्रमपर दयार्द्र होकर उनके अन्वेष्टव्य ब्रह्मको यशोदाके उलूखलमें बँधा हुआ बतला रहे हैं तो कुछ श्रीमन्नन्दरायके प्राङ्गणमें धूलिधूसरित वेदान्तसिद्धान्तके नृत्यका कौतुक बता रहे हैं। परम कौतुकी प्रभुमें ये सभी कौतुक ही तो हैं। इतनेपर भी लोगोंके प्रश्न होते हैं कि निराकार भगवान् साकार कैसे हो सकते हैं, परंतु इस ओर उनका ध्यान नहीं जाता कि जब कौतुकी कृपालुकी लीलासे निराकार जीव साकार होता है; क्योंकि सर्वमतसे जीव निराकार तथा निरवयव है और स्पर्शविहीन आकाश स्पर्शयुक्त वायुके रूपमें तथा रूपरहित वायु रूपवान् तेजके रूपमें और रसगन्धविहीन तेज जलके रूपमें और रसयुक्त जल गन्धवती पृथ्वीरूपमें अवतीर्ण होता है, तब क्या वे निराकार होकर भी साकार रूपमें प्रकट नहीं हो सकते ? द्रुतचित्तपर भगवान्का प्राकट्य ही भक्ति है भावुकके द्रुतचित्तपर निखिल-रसामृत-मूर्ति भगवान्का प्राकट्य ही 'भक्ति' पदका अर्थ होता है। आशय यह है कि अन्तःकरण लाक्षा (लाख)-के समान कठिन द्रव्य है, परंतु तापक अग्निके साथ सम्बन्ध होनेसे जैसे लाक्षा पिघलती है, वैसे ही स्नेह- रागादि तापक भावोंके साथ सम्बन्ध होनेसे अन्तःकरण भी पिघलता है। यही कारण है कि रागास्पद कामिनी तथा द्वेषास्पद सर्पादि पदार्थोंको ग्रहण करता हुआ चित्त पिघलकर अपनेमें उन पदार्थोंके स्वरूपोंको अंकित कर लेता है। इसीलिये उनका विस्मरण न होकर पुनः-पुनः स्मरण होता है। उसे तृण आदिकी स्मृति इसीलिये कम होती है कि उनमें राग-द्वेष या भय आदि नहीं हुए। अतः चित्तकी द्रुति वहाँ नहीं हुई। भावुकोंका कहना है कि लाक्षा जबतक कम पिघली होती है, तबतक उसमें कोई रंग व्यापक और स्थिर नहीं होता, अतः तापक अग्निके सम्बन्धसे लाक्षा इतनी पिघलायी जाय कि सौ पर्तके कपड़ेमें छानने- लायक हो जाय। तब गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत उस लाक्षामें जो रंग छोड़ा जाय, वह लाक्षाके अणु-अणुमें, सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिर होता है, फिर चाहे लाक्षा भी चाहे कि मैं अपनेसे रंगको पृथक् कर दूँ या रंग ही चाहे कि मैं पृथक् हो जाऊँ, परंतु दोनों ही पृथक् होनेमें असमर्थ हैं। ठीक इसी तरह भगवद्विषयक राग आदिसे गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत चित्तमें परमानन्दघन भगवान्का प्राकट्य होनेपर फिर पिघलती हुई लाक्षामें रंगकी तरह सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिर रूपसे भगवान्की स्थिति होती है। फिर तो भावनाके प्रभावसे अपरिच्छिन्न अनन्त आन्तर