भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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निर्गुण या सगुण ५८९ करणग्रामोंकी सार्थकता किसमें ? इसीलिये श्रीव्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवानोंके नेत्रादि करण-ग्रामोंकी सार्थकता और इनका चरम फल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्षपातसे युक्त वेणुचुम्बित अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका निर्निमेषनयनोंसे पान किया जाय; घ्राणसे सौगन्ध्यामृत और त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ ही है—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।७) इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्यरससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये ज्ञानीके निर्वृत्तिक मनपर अविषय रूपसे प्रकट वही वेदान्त- वेद्य सच्चिदानन्दघन भगवान् अनन्तकोटि कन्दर्पके दर्पको दूर करनेवाले दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य-जलनिधि मधुरातिमधुर स्वरूपसे प्रकट होकर अपने स्नेहद्वारा भावुकके द्रवीभूत अन्तःकरणको अपने रंगमें रँग देते हैं। यद्यपि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म निरतिशय परप्रेमास्पद और परमानन्दरूप है, उससे अधिक प्रेमास्पदता और परमानन्दरूपताकी कल्पना कहीं नहीं हो सकती; तथापि जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तबतक ज्ञानीको भी अन्तःकरणरूप उपाधिपर ही ब्रह्मका दर्शन होता है। अन्तःकरणसे ब्रह्मदर्शन वैसा ही समझना चाहिये जैसे नेत्रसे सूर्यदर्शन। परंतु जैसे दूरवीक्षण यन्त्रकी सहायतासे नेत्र द्वारा सूर्यका अति दिव्य स्पष्ट स्वरूप दिखायी देता है, वैसे ही दिव्य लीला-शक्तिसे वही भगवत्तत्त्व जब परम मनोहर सगुण-रूपमें प्रकट होता है, तब अन्तःकरणसे उसमें विलक्षण चमत्कार अनुभूत होता है। परंतु प्रारब्ध-क्षय हो जाने, सर्वोपाधियोंके मिटने तथा साक्षात् सूर्यरूप हो जानेपर जो सूर्यको आत्मरूप उपलब्ध होता है, वह तो सर्वथा ही अनुपमेय है। जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनी दर्पणमें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमाका अनुभव करती हैं। अस्वच्छ दर्पण आदिकी अपेक्षा स्वच्छ आदर्शपर किंवा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर उन्हें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमा अधिक भासित होती है, परंतु उनके मुखचन्द्रका जो मुख्य माधुर्य है, वह तो उनके अन्तरात्मभूत प्रियतम श्रीकृष्णको ही विदित हो सकता है। किंचित् भी व्यवधान रहनेपर रसास्वादनमें कमी ही रहती है, अतएव भावुकोंका कहना है कि यदि मधुर रूपमें ही चक्षु हो, तभी रूप-माधुर्यका और यदि पुष्पमें ही घ्राण हो, तब ठीक सौगन्ध्यका आस्वादन हो सकता है। यह बात तो ठीक यहीं घटती है कि परमानन्द-सारसर्वस्व श्रीकृष्ण ही अपनी मधुरिमा (माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी)-का अनुभव करते हैं। वैसे ही काल्पनिक भेदसे ज्ञानी अपने स्वरूपभूत भगवान्‌के मधुर रूपका अनुभव करते हैं। यद्यपि वस्तु वही है तथापि अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्तिके अद्भुत प्रभावसे ज्ञानियोंका भी मन प्रभुके इस मधुर स्वरूपमें बलात् आकर्षित हो जाता है। जैसे फल, वृक्ष, अंकुर, बीज यद्यपि भूमिके ही स्वरूप-विशेष हैं तथापि फलमें भूमि, बीज, अंकुर, वृक्ष इन सभीकी अपेक्षा विलक्षण सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सौरस्य होता है एवं गुलाबके बीज या नालमें जैसे शाखा-उपशाखा, कण्टक-पत्र आदिके उत्पादन करनेकी शक्ति है, वैसे ही पुष्पके उत्पादन करनेकी शक्ति है, परंतु कण्टकादि-उत्पादिनी शक्तिकी अपेक्षा सौगन्ध्य-माधुर्य-सौन्दर्य-सम्पन्न पुष्प उत्पादन करनेकी शक्ति विलक्षण है, वैसे ही भगवान्‌की महाशक्तिमें भी प्रपंचोत्पादिनी शक्ति है और उससे परम विलक्षण परात्पर पूर्णतम भगवान्‌की स्वरूपभूत मधुर मनोहर मंगलमयी मूर्तिको प्रादुर्भाव करनेवाली शक्ति भी है। उसी अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्तिके योगसे निराकार भगवान् उसी तरह साकार होते हैं, जैसे शैत्यके योगसे निर्मल जल बर्फरूपमें अथवा संघर्ष- विशेषसे अव्यक्त अग्नि या विद्युत् दाहक और प्रकाशक- रूपमें व्यक्त होता है। निराकार ब्रह्मकी अपेक्षा भी भगवान्‌की मधुर मूर्तिमें वैसे ही चमत्कार भासित होता है।