भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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५८६ भक्तिसुधा कुछ लोग कहते हैं कि भक्तकी भावना ही भगवान् है। भक्तकी भावना बहुत प्रधान है, भक्त- भावनाके अनुसार भगवान् अपना रूप बनाते हैं, केवल भावना ही भगवान् नहीं है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भक्त लोग भक्तियुक्त प्रज्ञासे आपके जैसे-जैसे रूपकी भावना करते हैं, आप वैसा-ही- वैसा स्वरूप धारण कर लेते हैं। विशुद्ध सत्त्व एवं लीलाशक्तिके योगसे निर्विकार, निराकार परमात्मा ही साकार होकर प्रकट होते हैं। जैसे जलके बर्फ बननेमें शैत्य निमित्त होता है, वैसे ही निराकार, निर्विकार परमात्माके साकार होनेमें विशुद्ध सत्त्व निमित्त होता है। दूसरे पक्षका सिद्धान्त यह है कि कूटस्थ, निर्विकार शुद्ध परमात्मा ही देहवान्-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः देहदेहिभाव है ही नहीं। कृष्णचन्द्रका जन्म, कर्म सब कुछ दिव्य है अर्थात् सब कुछ विशुद्ध ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे अतिरिक्त और कोई भी वस्तु नहीं है। भगवान्की अचिन्त्य शक्ति अन्यान्य प्रापंचिक शक्तिसे विलक्षण परम शुद्ध होनेपर भी अनिर्वचनीयता- अंशमें समान ही है। इस तरह अद्वैत-सिद्धान्तकी सुरक्षाके साथ-साथ ही भगवान्का सगुण, साकार स्वरूप भी सिद्ध हो जाता है। सर्वथापि भगवान्के अवतारमें अवान्तर मतभेद होनेपर भी किसी सनातनधर्मीको विवाद नहीं है। भगवान् भाष्यकार शंकराचार्य तो अपने 'प्रबोधसुधाकर' नामक ग्रन्थमें बड़े समारोहसे सगुण-निर्गुणका ऐक्य कहते हैं। उन्हीं आचार्यचरणोंने बदरीनारायण, हृषीकेश (भरतजी) आदि अनेक मूर्तियोंकी स्थापना की है। अद्वैत- सम्प्रदायके अनेक आचार्योंने सगुण, साकार भगवान्के स्वरूपका समर्थन किया है। अतः यह कथन कथमपि संगत नहीं है कि निराकार ब्रह्म साकार नहीं हो सकता। निर्गुण या सगुण ध्याता, ध्यान और ध्येय श्रीभगवान्के स्वरूपमें अन्तरात्मा और अन्तःकरणके आकर्षित हो जानेपर सहजमें ही प्रत्यक् चैतन्याभिन्न अखण्डानन्द स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है। श्रीकपिलदेवजीने अपनी माँ श्रीदेवहूतिजीको प्रथम असंग, अनन्त, निराकार, निर्गुण परतत्त्वका सम्यक् उपदेश करनेके अनन्तर उसमें स्थितिके लिये सगुण स्वरूपका वर्णन करके उसके ध्यानकी परमावश्यकता बतलायी है। अति मधुर सुन्दर भगवान्के स्वरूपमें चित्त जैसे-जैसे अधिक आकर्षित होता है, वैसे-ही- वैसे उसकी निर्मलता और स्वच्छता बढ़ती है एवं चित्तके अधिकाधिक स्वच्छ होनेपर प्रभुस्वरूपमें चित्तकी और अधिक आसक्ति होती है। जैसे अयस्कान्त मणि (चुम्बक)-में स्वच्छ लौहका अत्यधिक आकर्षण होता है, वैसे ही अमलान्तरात्माका भगवत्स्वरूपमें अत्यधिक आकर्षण होता है। प्रेमानन्दके उद्रेकमें मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सर्वांगका शैथिल्य तथा नैश्चल्य हो जाता है। लौकिक प्रेममें भी वाङ्निरोध, कण्ठावरोध आदि देखा ही जाता है। फिर अलौकिक भगवान्के प्रेमानन्दमें सर्वकरण-शैथिल्य तथा नैश्चल्य होना भी श्रीभरत और रामके सम्मिलनमें प्रसिद्ध ही है— परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अह्मिति बिसराई ॥ कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूॅंछा ॥ (रा०च०मा० २।२४१।२; २४२।७) इस तरह भगवान्के मधुर मुखचन्द्र तथा श्रीचरणारविन्दकी दिव्य नखमणि-चन्द्रिकाओंमें मनको एकाग्र करनेसे मन भी प्रेमोन्मादमें विह्वल हो उठता है। प्रथम बाह्य विषयोंसे मनको हटाकर अनन्त-कोटि सूर्यके दिव्य-प्रकाशको तिरोहित करनेवाले श्रीभगवान्के परम प्रकाशमय मनोहर श्रीअंग और दिव्यातिदिव्य